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चित्तौड़गढ़ दुर्ग (चित्तौड़गढ़)

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सत्यापित: 04 October 2026
मुख्य बिंदु: चित्तौड़गढ़ दुर्ग राजस्थान के सबसे ऐतिहासिक, भव्य और महत्वपूर्ण किलों में से एक है। इसे “राजस्थान के सभी किलों का सिरमौर” और “गिदुर्गों का सिरमौर” कहा जाता है। परीक्षा की दृष्टि से (RAS, RPSC, REET, Rajasthan Police आदि) इसके बारे में सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ नीचे विस्तार से दी गई हैं: 1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक […]

चित्तौड़गढ़ दुर्ग राजस्थान के सबसे ऐतिहासिक, भव्य और महत्वपूर्ण किलों में से एक है। इसे “राजस्थान के सभी किलों का सिरमौर” और “गिदुर्गों का सिरमौर” कहा जाता है। परीक्षा की दृष्टि से (RAS, RPSC, REET, Rajasthan Police आदि) इसके बारे में सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ नीचे विस्तार से दी गई हैं:

1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक स्थिति

  • नाम: चित्तौड़गढ़ दुर्ग।

  • अवस्थिति: यह दुर्ग राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में गांभीरी और बेड़च नदियों के संगम के समीप स्थित है।

  • पहाड़ी: यह दुर्ग मेषर्वा (मूर) पठार (या 8-10 किलोमीटर लंबी पठारी पहाड़ी) पर बना हुआ है।

  • श्रेणी: वास्तुकला की दृष्टि से यह एक ‘गिरी दुर्ग’ (पहाड़ी पर बना किला) की श्रेणी में आता है।

  • उपनाम: इसे ‘राजस्थान का गौरव’, ‘किलों का सिरमौर’, और ‘चित्रकूट दुर्ग’ भी कहा जाता है।

2. निर्माण एवं वंशानुक्रम (राजवंश)

  • निर्माणकर्ता: इस दुर्ग का प्रारंभिक निर्माण चित्रांगद मौर्य (मौर्य शासक) द्वारा 7वीं शताब्दी में करवाया गया था, इसीलिए इसका प्रारंभिक नाम ‘चित्रकूट’ था।

  • गुहिल / सिसोदिया राजवंश: 8वीं शताब्दी (लगभग 734 ई.) में बप्पा रावल (गुहिल वंश के वास्तविक संस्थापक) ने अंतिम मौर्य शासक मान मौर्य (या मनराज) को हराकर इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। तब से लेकर यह मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश की राजधानी रहा।

3. चित्तौड़गढ़ दुर्ग के तीन प्रसिद्ध शाके (सांस्कृतिक इतिहास के मुख्य युद्ध)

चित्तौड़गढ़ दुर्ग अपने गौरवशाली इतिहास और तीन प्रसिद्ध शाकों (केसरिया + जोहर) के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है:

  1. प्रथम शाका (1303 ईस्वी):

    • आक्रमणकारी: दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी।

    • शासक: मेवाड़ के रावल रतन सिंह।

    • विवरण: अलाउद्दीन खिलजी ने महारानी पद्मिनी (पद्मावती) की सुंदरता से आकर्षित होकर और सामरिक महत्व के कारण चित्तौड़ पर आक्रमण किया था। गोरा और बादल वीरगति को प्राप्त हुए।

    • जोहर: महारानी पद्मिनी के नेतृत्व में 1600 से अधिक महिलाओं ने जौहर किया। यह मेवाड़ का और चित्तौड़ का पहला शाका था।

  2. द्वितीय शाका (1535 ईस्वी):

    • आक्रमणकारी: गुजरात का सुल्तान बहादुर शाह।

    • शासक / संरक्षण: इस समय महाराणा विक्रमादित्य की अल्पायु के कारण उनकी माता रानी कर्मावती (हाड़ी रानी) ने शासन संभाला था। (उन्होंने हुमायूँ को राखी भी भेजी थी, लेकिन समय पर मदद नहीं मिल पाई)।

    • जोहर: रानी कर्मावती के नेतृत्व में महिलाओं ने जौहर किया और राजपूत वीरों ने केसरिया किया।

  3. तृतीय शाका (1567–1568 ईस्वी):

    • आक्रमणकारी: मुगल सम्राट अकबर।

    • शासक: महाराणा उदय सिंह (युद्ध के समय वे किले की रक्षा का भार जयमल मेड़तिया और पत्ता सिसोदिया को सौंपकर गोगुंदा पहाड़ियों में चले गए थे)।

    • वीरगति: जयमल मेड़तिया और पत्ता सिसोदिया ने अदम्य साहस दिखाते हुए वीरतापूर्वक केसरिया किया। कल्ला राठौड़ ने अपने घायल चाचा जयमल को कंधों पर बिठाकर अद्भुत युद्ध लड़ा (जिन्हें चार हाथों वाले देवता के रूप में पूजा जाता है)।

    • जोहर: फूल कंवर के नेतृत्व में विशाल जौहर हुआ। यह चित्तौड़ का अंतिम और तीसरा शाका था।

4. प्रमुख दर्शनीय स्थल एवं स्मारक

  • विजय स्तम्भ (विजयास्तम्भ / कीर्ति स्तंभ):

    • इसका निर्माण महाराणा कुंभा ने 1440–1448 ईस्वी के बीच सारंगपुर के युद्ध (मालवा के महमूद खिलजी पर विजय) की स्मृति में करवाया था।

    • यह 9 मंजिला इमारत है, जिसे ‘भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोश’ और ‘विष्णु ध्वज स्तम्भ’ भी कहा जाता है। इसके वास्तुकार जेता और उसके पुत्र थे।

  • कीर्ति स्तम्भ:

    • यह जैन व्यापारी जीजा शाह द्वारा 12वीं शताब्दी में बनवाया गया था, जो जैन तीर्थंकर आदिनाथ (ऋषभदेव जी) को समर्पित है (यह विजय स्तम्भ से अलग है)।

  • पद्मिनी महल:

    • रानी पद्मिनी का महल, जिसके जल कुंड के पास अलाउद्दीन खिलजी को दर्पण में पद्मिनी की झलक दिखाई गई थी।

  • कुंभा महल:

    • महाराणा कुंभा का भव्य महल, जहाँ पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदय सिंह की रक्षा की थी। इसी महल में मीराबाई भगवान कृष्ण की आराधना करती थीं।

  • कालिका माता मंदिर:

    • यह मूल रूप से सूर्य मंदिर था, जिसे बाद में कालिका माता मंदिर में परिवर्तित किया गया।

  • गोमुख कुंड:

    • दुर्ग के भीतर एक पवित्र जल स्रोत, जहाँ चट्टान से गोमुख के आकार से पानी गिरता है।

  • अन्य स्थल: सतबीस देवरी (जैन मंदिर), जैमल-पत्ता की हवेली, और तुलजा भवानी का मंदिर।

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