मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य राजस्थान के इतिहास में राठौड़ राजवंश अपने अदम्य शौर्य, स्वाभिमान, सामंती व्यवस्था और समृद्ध साहित्यिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान में राठौड़ों की तीन प्रमुख रियासतें थीं—मारवाड़ (जोधपुर), बीकानेर, और किशनगढ़ (इसके अतिरिक्त मेड़ता, रतलाम व ईडर भी इनकी उपशाखाएँ थीं)। उत्पत्ति के मत: कन्नौज के गहड़वालों के […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
राजस्थान के इतिहास में राठौड़ राजवंश अपने अदम्य शौर्य, स्वाभिमान, सामंती व्यवस्था और समृद्ध साहित्यिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। राजस्थान में राठौड़ों की तीन प्रमुख रियासतें थीं—मारवाड़ (जोधपुर), बीकानेर, और किशनगढ़ (इसके अतिरिक्त मेड़ता, रतलाम व ईडर भी इनकी उपशाखाएँ थीं)।
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उत्पत्ति के मत:
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कन्नौज के गहड़वालों के वंशज: मुहणौत नैणसी, जोधपुर राज्य की ख्यात, कर्नल जेम्स टॉड तथा पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा (जी.एच. ओझा) के अनुसार राठौड़ कन्नौज के राजा जयचंद गहड़वाल के वंशज (राष्ट्रकूट) हैं।
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सूर्यवंशी मत: दयालदास री ख्यात और जोधपुर की वंशावलियों में इन्हें सूर्यवंशी माना गया है।
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बदायूँ के राष्ट्रकूट: डॉ. ए. एफ. हॉर्नले के अनुसार राठौड़ बदायूँ के राष्ट्रकूटों के वंशज हैं।
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प्रमुख शाखाएँ एवं उनके संस्थापक:
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मारवाड़ (जोधपुर) शाखा:
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आदिपुरुष / मूलपुरुष: राव सीहा (1273 ई.) — पाली के निकट खेड़/पाली को अपनी शक्ति का केंद्र बनाया। स्मारक/छतरी: बीठू गाँव (पाली)।
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सामंत प्रथा के जनक: राव चूड़ा (1394–1423 ई.) — इंदा प्रतिहारों से दहेज में मंडोर प्राप्त किया और मंडोर को राजधानी बनाया।
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जोधपुर के संस्थापक: राव जोधा — 12 मई, 1459 को चिड़ियाटूँक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव रखी।
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बीकानेर शाखा:
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संस्थापक: राव बीका (राव जोधा के पाँचवें पुत्र) — 1465 ई. में जांगल प्रदेश में राठौड़ वंश की नींव रखी और 1488 ई. (वैशाख शुक्ल तृतीया / आखा तीज) को बीकानेर नगर की स्थापना की।
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किशनगढ़ शाखा:
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संस्थापक: किशनसिंह (मोटा राजा उदयसिंह के पुत्र) — 1609 ई. में किशनगढ़ राज्य की स्थापना की।
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मेड़ता शाखा:
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संस्थापक: राव दूदा (राव जोधा के पुत्र) — भक्त शिरोमणि मीराबाई के दादा।
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कुलदेवी एवं आराध्य देवी:
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कुलदेवी: नागणेची माता (चक्रेश्वरी देवी) — मूल प्रतिमा कर्नाटक से राव धूहड़ द्वारा लाकर नागाणा गाँव (बाड़मेर) में स्थापित की गई (काष्ठ प्रतिमा)।
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इष्टदेवी / आराध्य देवी: चामुंडा माता (मेहरानगढ़ दुर्ग में मंदिर — राव जोधा द्वारा निर्मित) एवं बीकानेर शाखा की इष्टदेवी करणी माता (देशनोक)।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक रचनाएँ, साहित्य और रचनाकार
राठौड़ राजवंश के शासक न केवल महान योद्धा थे, अपितु स्वयं उच्च कोटि के विद्वान और साहित्यकारों के महान आश्रयदाता थे।
| रचना (Work) | रचनाकार (Author) | भाषा / प्रकार | मुख्य विवरण |
| वेलि क्रिसन रुकमणी री | पृथ्वीराज राठौड़ (पीथल) | डिंगल (उत्तरी मारवाड़ी) | बीकानेर के राव कल्याणमल के पुत्र। कवि दुरसा आढ़ा ने इस ग्रंथ को ‘पाँचवाँ वेद और उन्नीसवाँ पुराण’ कहा। डॉ. एल. पी. तेस्सीतोरी ने पृथ्वीराज को ‘डिंगल का हेरोस’ कहा। |
| मारवाड़ रा परगना री विगत एवं नैणसी री ख्यात | मुहणौत नैणसी | डिंगल / राजस्थानी गद्य | महाराजा जसवंत सिंह प्रथम के दीवान। ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ को ‘राजस्थान का गजेटियर’ कहा जाता है। मुंशी देवीप्रसाद ने नैणसी को ‘राजपूताने का अबुल फज़ल’ कहा। |
| भाषा भूषण, आनंद विलास, प्रबोध चंद्रोदय, अपरोक्ष सिद्धांत सार | महाराजा जसवंत सिंह प्रथम (जोधपुर) | बृजभाषा (काव्यशास्त्र) | ‘भाषा भूषण’ हिंदी साहित्य में अलंकारों का सर्वमान्य एवं मानक लक्षण-ग्रंथ है (212 दोहे)। |
| बीकानेर रा राठौड़ां री ख्यात | दयालदास सिढ़ायच | राजस्थानी गद्य | राव बीका से लेकर महाराजा सरदार सिंह तक बीकानेर का प्रामाणिक इतिहास। |
| राठौड़ रूपक माहे / गुणरूपक | कवि केशवदास गाडण | डिंगल | जोधपुर के महाराजा गजसिंह प्रथम के शासनकाल और सैन्य अभियानों का वर्णन। |
| नागर समुच्चय / मनोरथ मंजरी / रसिक रत्नावली | सावंत सिंह (नागरीदास) | बृजभाषा / डिंगल | किशनगढ़ के शासक; कृष्ण भक्ति में राजपाट त्यागकर वृंदावन चले गए। बनी-ठणी (भारतीय मोनालिसा) के प्रणेता। |
| सूरज प्रकाश | कवि करणीदान | डिंगल | महाराजा अभयसिंह के शासन और अहमदाबाद विजय (1730 ई.) का प्रत्यक्ष वर्णन। |
| राज रूपक | वीरभाण रत्नू | डिंगल | महाराजा अभयसिंह और मुग़ल सूबेदार सरबुलंद खाँ के युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी काव्य। |
| राव जैतसी रो छंद | बीठू सूजा | डिंगल | 1534 ई. में बीकानेर के राव जैतसी द्वारा बाबर के पुत्र कामरान को पराजित करने का ऐतिहासिक वीर काव्य। |
| कर्मचंद वंशोत्कीर्तनकं काव्यम् | जयसोम | संस्कृत | बीकानेर के महाराजा रायसिंह को ‘राजेंद्र’ की उपाधि दी गई और जूनागढ़ दुर्ग निर्माण का उल्लेख। |
| बांकीदास री ख्यात एवं ‘आयो इंगरेज मुलक रे ऊपर’ | कविराजा बांकीदास आसिया | डिंगल | महाराजा मानसिंह (जोधपुर) के दरबारी कवि; 1857 से पूर्व ब्रिटिश सत्ता विरोधी राष्ट्रीय चेतना का काव्य। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ
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डिंगल काव्य परंपरा का चरमोत्कर्ष: चारणी साहित्य और डिंगल भाषा का विकास मुख्य रूप से राठौड़ शासकों के संरक्षण में हुआ। वीर रस, नीति, फुटकर कवित्त और ख्यात गद्य का मानक स्वरूप यहीं विकसित हुआ।
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चित्रकला शैलियों का विकास:
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जोधपुर शैली: मालदेव के समय से विकसित (चोखेलाव महल); महाराजा मानसिंह के समय नाथ संप्रदाय के प्रभाव से ‘स्वर्णकाल’।
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बीकानेर शैली: मुग़ल प्रभाव से युक्त; उस्ता कला (ऊँट की खाल पर स्वर्ण मीनाकारी) और मथेरण कला (जैन कलाकारों द्वारा भित्ति व काष्ठ चित्रण) की विशिष्टता। चित्रकार चित्रों पर अपना नाम व तिथि अंकित करते थे।
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किशनगढ़ शैली: सावंत सिंह (नागरीदास) का काल स्वर्णयुग। चित्रकार निहालचंद द्वारा निर्मित ‘बनी-ठणी’ (एरिक डिक्सन ने इसे ‘भारत की मोनालिसा’ कहा)।
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धार्मिक व दार्शनिक प्रवृत्तियाँ:
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मारवाड़ में नाथ संप्रदाय का केंद्र (महाराजा मानसिंह द्वारा ‘महामंदिर’ निर्माण)।
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किशनगढ़ में वल्लभ संप्रदाय (पुष्टिमार्ग) और राधा-कृष्ण भक्ति का प्रसार।
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सामंतवादी संगठन: राठौड़ों की शासन व्यवस्था रक्त-संबंधों पर आधारित ‘भाई-बंट’ (भ्रातृ-प्रथा) की सामंती व्यवस्था थी, जिसमें ‘पट्टा-रेक’ और ‘छतरबंध’ सामंत प्रमुख थे।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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राठौड़ वंश के आदिपुरुष: राव सीहा (स्मारक: बीठू गाँव, पाली)।
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मंडोर को राजधानी बनाया: राव चूड़ा (सामंत प्रथा के जनक)।
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जोधपुर की स्थापना: राव जोधा (12 मई, 1459)।
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बीकानेर की स्थापना: राव बीका (1488 ई., आखा तीज)।
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किशनगढ़ की स्थापना: किशनसिंह (1609 ई.)।
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डिंगल का हेरोस: पृथ्वीराज राठौड़ (एल. पी. तेस्सीतोरी द्वारा प्रदत्त)।
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पाँचवाँ वेद / उन्नीसवाँ पुराण: वेलि क्रिसन रुकमणी री (दुरसा आढ़ा द्वारा कहा गया)।
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राजपूताने का अबुल फज़ल: मुहणौत नैणसी।
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राजपूताने का कर्ण: राव लूणकरण (बीकानेर) — बिठू सूजा कृत ‘राव जैतसी रो छंद’ में उल्लेख।
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राजपूताने का राजेंद्र: महाराजा रायसिंह (बीकानेर) — जयसोम कृत ‘कर्मचंद वंशोत्कीर्तनकं काव्यम्’ में उल्लेख।