मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य रणथंभौर (रणस्तंभपुर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 13वीं शताब्दी के मध्य के शासकों में वाग्भट्ट (साहित्यिक ग्रंथों व लोक-स्मृति में इन्हें ‘बाहुबली’ तथा फारसी तवारीखों में ‘बहाबहा’ / ‘बाग्भट’ भी कहा गया है) का स्थान इस शाखा के सबसे बड़े पुनरुद्धारक एवं साम्राज्य-संस्थापक के रूप में प्रतिष्ठित है। इन्होंने […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
रणथंभौर (रणस्तंभपुर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 13वीं शताब्दी के मध्य के शासकों में वाग्भट्ट (साहित्यिक ग्रंथों व लोक-स्मृति में इन्हें ‘बाहुबली’ तथा फारसी तवारीखों में ‘बहाबहा’ / ‘बाग्भट’ भी कहा गया है) का स्थान इस शाखा के सबसे बड़े पुनरुद्धारक एवं साम्राज्य-संस्थापक के रूप में प्रतिष्ठित है। इन्होंने तुर्कों के कब्जे से रणथंभौर को मुक्त कराकर चौहान संप्रभुता को पुनः चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया।
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समय काल: लगभग 1236–1253 ईस्वी (13वीं शताब्दी का मध्य भाग)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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हम्मीर महाकाव्य के अनुसार, ये वाल्हण (वल्हण) के कनिष्ठ पुत्र तथा प्रह्लादन के छोटे भाई थे।
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वीरनारायण के चाचा एवं संरक्षक।
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वाग्भट्ट के उपरांत इनके प्रतापी पुत्र जैत्रसिंह (जयसिंह) रणथंभौर की गद्दी पर बैठे।
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मालवा प्रवास एवं शक्ति संचय:
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जब 1226 ई. में इल्तुतमिश ने वीरनारायण की हत्या कर रणथंभौर पर कब्जा कर लिया, तो वाग्भट्ट ने मालवा के सीमांत क्षेत्र में जाकर अपनी स्वतंत्र सैन्य शक्ति संगठित की।
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इन्होंने मालवा और विंध्य क्षेत्र के सरदारों को एकत्र किया और रणथंभौर पर पुनः आक्रमण का उचित समय तलाशा।
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रणथंभौर की पुनर्विजय (1236 ईस्वी – रजिया सुल्तान का काल):
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1236 ई. में इल्तुतमिश की मृत्यु के पश्चात जब दिल्ली सल्तनत में उत्तराधिकार का संकट (रजिया सुल्तान का शासन) उत्पन्न हुआ, तो वाग्भट्ट ने रणथंभौर दुर्ग पर भीषण आक्रमण कर दिया।
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इन्होंने दुर्ग के तुर्क गवर्नर कुतुबुद्दीन हसन गोरी को दुर्ग छोड़ने पर विवश कर दिया। रजिया सुल्तान द्वारा भेजी गई सेना को भी पीछे हटना पड़ा और वाग्भट्ट ने रणथंभौर को पूर्णतः स्वतंत्र करा लिया।
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उलूग खाँ (भावी बलबन) एवं नासिरुद्दीन महमूद के हमलों का सफल प्रतिरोध (1248 व 1253 ईस्वी):
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दिल्ली सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद के नायब उलूग खाँ (गयासुद्दीन बलबन) ने 1248 ई. और 1253 ई. में रणथंभौर पर भारी सेना के साथ आक्रमण किए।
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वाग्भट्ट ने अदम्य साहस और गुरिल्ला (छापामार) रणनीति का प्रयोग करते हुए बलबन की शाही सल्तनत सेना को दोनों बार बुरी तरह पराजित कर खदेड़ दिया।
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‘बाहुबली’ उपनाम एवं धार्मिक निर्माण:
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अपनी असाधारण शारीरिक शक्ति, विशाल भुजाओं और अद्वितीय पराक्रम के कारण इन्हें इतिहास में ‘बाहुबली’ की उपाधि/उपनाम से जाना गया।
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इन्होंने रणथंभौर में अनेक शिव व विष्णु मंदिरों का निर्माण करवाया तथा अपने दुर्ग के चारों ओर नवीन प्राचीरों का निर्माण कर उसे अभेद्य बनाया।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
वाग्भट्ट के शौर्य, रणथंभौर पुनर्विजय और बलबन के हमलों के प्रामाणिक संदर्भ:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि | संस्कृत (महाकाव्य) | सर्वप्रमुख स्रोत। वाग्भट्ट (बाहुबली) द्वारा मालवा से सैन्य संगठन, तुर्कों को मारकर रणथंभौर पुनः छीनने और जैत्रसिंह के राज्यारोहण का विशद काव्यात्मक वर्णन। |
| तबकात-ए-नासिरी | मिनहाज-उस-सिराज | फारसी (समकालीन इतिहास) | सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद और नायब उलूग खाँ (बलबन) के 1248 व 1253 ई. के रणथंभौर अभियानों का समकालीन दरबारी विवरण (जिसमें वाग्भट्ट को ‘बहाबहा/बहादुर’ कहा गया है)। |
| हम्मीरायण | भांडव व्यास | प्राकृत / प्राचीन राजस्थानी | रणथंभौर चौहानों के गौरव, वाग्भट्ट के बाहुबल और सल्तनत प्रतिरोध का निरूपण। |
| तारीख-ए-फरिश्ता | मुहम्मद कासिम फरिश्ता | फारसी (इतिहास) | दिल्ली सल्तनत और रणथंभौर के मध्य हुए 13वीं सदी के युद्धों की ऐतिहासिक पुष्टि। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; वाग्भट्ट (Vagbhata) के 1236–1253 ई. कालक्रम, रजिया-बलबन से युद्ध और सामरिक महत्व का शोधपरक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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रणथंभौर का द्वितीय संस्थापक/पुनरुद्धारक: यदि वाग्भट्ट ने 1236 ई. में तुर्कों से रणथंभौर को वापस न जीता होता, तो चौहानों की रणथंभौर शाखा 1226 ई. में ही समाप्त हो जाती। अतः इन्हें रणथंभौर चौहान राज्य का वास्तविक पुनरुद्धारक माना जाता है।
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सल्तनत के चरमोत्कर्ष का मुकाबला: बलबन और रजिया सुल्तान के समय दिल्ली सल्तनत अपनी सैन्य शक्ति के उच्च स्तर पर थी, उस दौर में दिल्ली की सेनाओं को बार-बार पराजित करना वाग्भट्ट की उत्कृष्ट युद्ध-कुशलता को सिद्ध करता है।
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भावी स्वर्णिम युग का आधार: वाग्भट्ट की सुदृढ़ नींव पर ही इनके पुत्र जैत्रसिंह ने 32 वर्षों तक निर्बाध शासन किया और पौत्र हम्मीरदेव चौहान ने ‘हठी हम्मीर’ के रूप में अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त की।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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रणथंभौर को तुर्कों से पुनः जीतकर स्वतंत्र कराने वाले चौहान शासक: वाग्भट्ट (‘बाहुबली’)।
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समकालीन दिल्ली शासक: इल्तुतमिश, रजिया सुल्तान, नासिरुद्दीन महमूद एवं बलबन।
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बलबन (उलूग खाँ) के 1248 व 1253 ई. के आक्रमणों को विफल करने वाले: वाग्भट्ट।
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पिता: वाल्हण | भतीजे: वीरनारायण | पुत्र व उत्तराधिकारी: जैत्रसिंह (जयसिंह)।
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वंशावली क्रम: गोविन्दराज ➔ वाल्हण ➔ प्रह्लादन ➔ वीरनारायण ➔ वाग्भट्ट (‘बाहुबली’) ➔ जैत्रसिंह ➔ हम्मीरदेव चौहान।