मुख्य बिंदु: शीला माता जयपुर (आमेर) के कछवाहा राजवंश की इष्टदेवी (आराध्य देवी) हैं। धार्मिक व ऐतिहासिक पहचान स्वरूप: महिषासुरमर्दिनी (देवी दुर्गा) का स्वरूप; काले संगमरमर की अष्टभुजी पाषाण प्रतिमा। स्थिति: कछवाहा राजवंश की इष्टदेवी/आराध्य देवी। स्थान: जलेब चौक के पास, आमेर दुर्ग (जयपुर)। मूर्ति का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व स्थापना प्रतिष्ठापक शासक: आमेर के राजा मानसिंह प्रथम […]
शीला माता जयपुर (आमेर) के कछवाहा राजवंश की इष्टदेवी (आराध्य देवी) हैं।
धार्मिक व ऐतिहासिक पहचान
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स्वरूप: महिषासुरमर्दिनी (देवी दुर्गा) का स्वरूप; काले संगमरमर की अष्टभुजी पाषाण प्रतिमा।
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स्थिति: कछवाहा राजवंश की इष्टदेवी/आराध्य देवी।
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स्थान: जलेब चौक के पास, आमेर दुर्ग (जयपुर)।
मूर्ति का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व स्थापना
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प्रतिष्ठापक शासक: आमेर के राजा मानसिंह प्रथम (लगभग 1604 ई.)।
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लाए जाने का संदर्भ: मानसिंह प्रथम ने मुगल बादशाह अकबर के समय बंगाल अभियान (1594–1604 ई.) का नेतृत्व किया था।
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जेसोर विजय: पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) के जेसोर के शासक राजा केदार कायथ को पराजित करने के बाद, मानसिंह यह चमत्कारिक शिला (पाषाण) वहां से आमेर लेकर आए।
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नामकरण: एक विशाल पाषाण शिला (काला पत्थर) पर उत्कीर्ण होने के कारण देवी का नाम ‘शीला माता’ पड़ा।
मंदिर की स्थापत्य व धार्मिक विशेषताएं
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स्थापत्य शैली: राजपूत और मुगल स्थापत्य का मिश्रित प्रभाव। मंदिर के प्रवेश द्वार पर चांदी का भव्य दरवाजा लगा है, जिस पर नवदुर्गा और दस महाविद्याओं की आकृतियां उत्कीर्ण हैं।
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हिंगलाज माता का स्वरूप: मुख्य प्रतिमा के दाईं ओर हिंगलाज माता की छोटी पाषाण प्रतिमा भी स्थापित है।
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भोग व बलि परंपरा: पूर्व काल में यहां नरबलि (अति प्राचीन काल) और बाद में महिष (भैंसे) व बकरे की बलि दी जाती थी। वर्तमान में पशु बलि पूर्णतः प्रतिबंधित है। देवी को मदिरा का चरणामृत (ढाई प्याला) और लापसी-गूघरी का भोग लगाने की परंपरा रही है।
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मेला: प्रतिवर्ष चैत्र और आश्विन दोनों नवरात्रों में आमेर दुर्ग में विशाल मेला भरता है।
लोक मान्यता एवं कहावत
आमेर और ढूंढाड़ क्षेत्र में शीला माता के चमत्कार और मानसिंह की विजय को लेकर प्रसिद्ध लोक कहावत है:
“सांगानेर को सांगो बाबो, जयपुर को हनुमान।आमेर की शीला देवी, लायो राजा मान॥”
ऐतिहासिक संदर्भ (Sources)
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अबुल फजल: अकबरनामा (बंगाल अभियान का संदर्भ)।
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डॉ. गोपीनाथ शर्मा: राजस्थान का इतिहास (राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी)।
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डॉ. हुकमचंद जैन एवं डॉ. नारायण लाल माली: राजस्थान की संस्कृति एवं इतिहास।
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कर्नल जेम्स टॉड: एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान।