मुख्य बिंदु: जमवाय माता (बुढ़वाय माता) ढूंढाड़ के कछवाहा (कछवाह) राजवंश की कुलदेवी के रूप में पूज्य हैं। धार्मिक व ऐतिहासिक पहचान स्वरूप: इन्हें मां अन्नपूर्णा अथवा आदिशक्ति दुर्गा का अवतार माना जाता है। प्राचीन नाम: जनश्रुतियों और ख्यातों में इन्हें ‘बुढ़वाय माता’ भी कहा गया है। स्थिति: कछवाहा राजवंश की कुलदेवी। (ध्यान दें: आमेर के शासक […]
जमवाय माता (बुढ़वाय माता) ढूंढाड़ के कछवाहा (कछवाह) राजवंश की कुलदेवी के रूप में पूज्य हैं।
धार्मिक व ऐतिहासिक पहचान
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स्वरूप: इन्हें मां अन्नपूर्णा अथवा आदिशक्ति दुर्गा का अवतार माना जाता है।
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प्राचीन नाम: जनश्रुतियों और ख्यातों में इन्हें ‘बुढ़वाय माता’ भी कहा गया है।
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स्थिति: कछवाहा राजवंश की कुलदेवी।(ध्यान दें: आमेर के शासक मानसिंह प्रथम द्वारा बंगाल से लाई गई ‘शीला माता’ कछवाहा वंश की इष्टदेवी/आराध्य देवी हैं, जबकि जमवाय माता कुलदेवी हैं।)
स्थापत्य एवं मंदिर निर्माण
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स्थान: जमवारामगढ़ (जयपुर से लगभग 30 किमी उत्तर-पूर्व में, बाणगंगा नदी के तट के निकट)।
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निर्माता: कछवाहा वंश के संस्थापक दूल्हा राय (तेजकरण) द्वारा 12वीं शताब्दी (लगभग 1137 ई.) में निर्मित।
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पृष्ठभूमि: लोक मान्यताओं के अनुसार, मांच के मीणाओं से युद्ध के दौरान दूल्हा राय की सेना जब संकट में थी, तब देवी के आशीर्वाद से उन्हें विजय प्राप्त हुई। विजय के उपरांत दूल्हा राय ने ‘मांच’ का नाम बदलकर ‘रामनगर’ (बाद में जमवारामगढ़) किया और यहां कुलदेवी के मंदिर की स्थापना की।
मंदिर की विशेषताएं एवं मेले
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गर्भगृह: मंदिर के मुख्य गर्भगृह में जमवाय माता के साथ गाय और बछड़े की प्रतिमा भी स्थापित है, जो वात्सल्य और पोषण का प्रतीक मानी जाती है।
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मेला: प्रतिवर्ष चैत्र और आश्विन दोनों नवरात्रों में यहाँ विशाल लक्खी मेला भरता है।
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परंपरा: कछवाहा राजवंश के साथ-साथ ढूंढाड़ क्षेत्र के श्रद्धालु आज भी अपने बच्चों का जड़ूला (मुंडन संस्कार) और नवविवाहित जोड़ों की जात (गठबंधन धोक) देने मुख्य रूप से जमवाय माता के दरबार में जाते हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ (Sources)
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मुंहता नैणसी: मुंहता नैणसी री ख्यात
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कर्नल जेम्स टॉड: एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान
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डॉ. गोपीनाथ शर्मा: राजस्थान का इतिहास (राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी)