मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के अंतिम, सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीराज तृतीय (जिन्हें इतिहास में ‘राय पिथौरा’ और ‘हिन्दू सम्राट’ कहा गया है) का शासनकाल मध्यकालीन भारतीय इतिहास का सर्वाधिक युगांतरकारी अध्याय है। जन्म एवं कालक्रम: जन्म: 1166 ईस्वी (वि.सं. 1223, ज्येष्ठ बदी द्वादशी) […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के अंतिम, सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रतापी चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीराज तृतीय (जिन्हें इतिहास में ‘राय पिथौरा’ और ‘हिन्दू सम्राट’ कहा गया है) का शासनकाल मध्यकालीन भारतीय इतिहास का सर्वाधिक युगांतरकारी अध्याय है।
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जन्म एवं कालक्रम:
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जन्म: 1166 ईस्वी (वि.सं. 1223, ज्येष्ठ बदी द्वादशी) को अणहिलपाटन (गुजरात) में।
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शासनकाल: 1177–1192 ईस्वी। मात्र 11 वर्ष की अल्पायु में 1177 ई. में पिता सोमेश्वर की मृत्यु के बाद राज्यारोहण।
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पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं आरंभिक प्रशासन:
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माता-पिता: पिता सोमेश्वर एवं माता त्रिपुरी (चेदि) की राजकुमारी रानी कर्पूरी देवी।
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संरक्षिका काल (1177–1178 ई.): अल्पायु होने के कारण प्रारंभिक 1 वर्ष का शासन माता कर्पूरी देवी के कुशल संरक्षण में चला।
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प्रमुख सहयोगी: प्रधानमंत्री/महामात्य कदम्बवास (कैमास) तथा सेनापति भुवनमल्ल।
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पूर्ण सत्ता ग्रहण: 1178 ई. में (12 वर्ष की आयु में) पृथ्वीराज तृतीय ने स्वयं शासन की पूर्ण बागडोर अपने हाथों में ली।
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उपाधियाँ:
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राय पिथौरा: दिल्ली में पिथौरागढ़ दुर्ग निर्माण एवं उत्तर भारत में संप्रभुता के कारण।
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दलपंगुल (Dalpangula): विश्व विजेता / सेनाओं का संहारक (‘दल’ अर्थात् सेना को पंगु बना देने वाला)।
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भारतेश्वर / अंतिम हिन्दू सम्राट: उत्तर भारत के विशाल भूभाग पर एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने के कारण।
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2. सैन्य अभियान एवं दिग्विजय नीति (1178–1190 ई.)
पृथ्वीराज तृतीय ने शासक बनते ही चारों दिशाओं में अपनी साम्राज्य विस्तारवादी नीति का संचालन किया:
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नागार्जुन का दमन (1178 ई. – गृहयुद्ध समाप्ति):
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विग्रहराज चतुर्थ के पुत्र नागार्जुन ने गुड़गांव (गुड़गांवा) में विद्रोह कर दिया था। पृथ्वीराज ने गुड़गांव दुर्ग को घेरकर नागार्जुन के सैनिकों का दमन किया और विद्रोहियों के सिर अजमेर दुर्ग के परकोटे पर टंगवा दिए।
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भण्डानकों का पूर्ण उन्मूलन (1182 ई.):
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भरतपुर, अलवर, मथुरा और गुड़गांव क्षेत्र में उपद्रव करने वाली लड़ाकू भण्डानक जाति का समूल विनाश कर साम्राज्य की उत्तरी-पूर्वी सीमा को सुरक्षित किया।
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महोबा का युद्ध / तुमुल का युद्ध (1182 ई. – चंदेलों की पराजय):
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बुंदेलखंड/जेजाकभुक्ति के चंदेल शासक परमर्दिदेव (परमाल) को पराजित किया।
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इस भीषण युद्ध में महोबा के वीर सेनापति भाई आल्हा और ऊदल अप्रतिम वीरता दिखाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
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पृथ्वीराज ने महोबा का प्रशासक अपने सेनानायक पंजुनराय (पंजवन राय) को नियुक्त किया।
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नागौर का युद्ध (1184 ई. – चालुक्य संघर्ष व संधि):
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गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक भीमदेव द्वितीय और उनके प्रधानमंत्री जगद्देव प्रतिहार के साथ नागौर के निकट युद्ध हुआ।
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अंततः 1187 ई. में जगद्देव प्रतिहार के प्रयासों से चौहानों और चालुक्यों के मध्य सम्मानजनक संधि हो गई।
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कन्नौज के गहड़वालों से शत्रुता एवं संयोगिता प्रसंग:
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कन्नौज के गहड़वाल सम्राट जयचंद और पृथ्वीराज के मध्य दिल्ली सीमा और राजनीतिक प्रभुत्व को लेकर कटु वैमनस्य था।
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चन्दबरदाई कृत पृथ्वीराज रासो के अनुसार, पृथ्वीराज ने जयचंद की राजकन्या संयोगिता का उसके स्वयंवर से हरण कर गंधर्व विवाह किया, जिससे दोनों शक्तियों में कभी सामरिक एकता नहीं बन सकी।
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3. शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी से संघर्ष (तराइन के ऐतिहासिक युद्ध)
उत्तर-पश्चिम से भारत पर आक्रमण करने वाले गजनी/गोर के सुल्तान शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी के साथ दो निर्णायक युद्ध लड़े गए:
| युद्ध | वर्ष | प्रमुख घटनाक्रम एवं व्यूहरचना | परिणाम एवं परीक्षा-उपयोगी तथ्य |
| तराइन का प्रथम युद्ध | 1191 ई. | हरियाणा के करनाल/तरावड़ी मैदान में युद्ध। दिल्ली के गवर्नर गोविंदराज तोमर ने गोरी पर बरछी से प्रहार कर उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। खिलजी सैनिक गोरी को बचाकर ले भागा। | पृथ्वीराज तृतीय की निर्णायक विजय। भागती हुई तुर्क सेना का पीछा न करना और सरहिंद (तबरहिंद) दुर्ग के घेरे में 13 माह का समय व्यर्थ करना रणनीतिक भूल साबित हुई। |
| तराइन का द्वितीय युद्ध | 1192 ई. | गोरी ने 1,20,000 सुसज्जित अश्वारोही सेना के साथ कपट-संधि वार्ता का नाटक रचा और सुबह के समय राजपूत छावनी पर अचानक हमला किया। | गोरी की विजय। पृथ्वीराज के प्रधान सेनापति स्कंद उस समय अनुपस्थित थे। पृथ्वीराज को सरस्वती नदी (सिरसा, हरियाणा) के निकट बंदी बनाया गया। |
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मृत्यु एवं समाधि के ऐतिहासिक साक्ष्य:
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पृथ्वीराज विजय (जयानक) व मिनहाज-उस-सिराज (तबकात-ए-नासिरी): पृथ्वीराज को सिरसा के पास बंदी बनाकर बाद में मृत्युदंड दिया गया।
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हसन निजामी (ताजुल मासिर): पृथ्वीराज ने कुछ समय अजमेर में गोरी की अधीनता में शासन किया (इसके प्रमाण स्वरूप ‘श्री मुहम्मद साम’ और ‘पृथ्वीराज’ दोनों नामों वाले संयुक्त सिक्के मिले हैं), बाद में विद्रोह के आरोप में वध किया गया।
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पृथ्वीराज रासो (चन्दबरदाई): गजनी ले जाकर शब्दभेदी बाण द्वारा गोरी का वध (“चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण…”) और फिर चन्दबरदाई व पृथ्वीराज द्वारा एक-दूसरे का वध।
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समाधि/स्मारक: गजनी (अफगानिस्तान) में समाधि तथा अजमेर (तारागढ़ की तलहटी) में भव्य राष्ट्रीय स्मारक।
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4. कला, साहित्य एवं प्रमुख दरबारी विद्वान
सम्राट पृथ्वीराज तृतीय स्वयं बहुभाषाविद् और कला-साहित्य के महान संरक्षक थे। इन्होंने अजमेर में एक स्वतंत्र ‘कला एवं साहित्य विभाग’ की स्थापना की, जिसके अध्यक्ष पद्मनाभ थे।
| दरबारी विद्वान / कवि | रचित प्रमुख ग्रंथ | मुख्य विवरण |
| चन्दबरदाई (पृथ्वीभट्ट) | पृथ्वीराज रासो | पिंगल (ब्रज मिश्रित राजस्थानी)। 69 समय (अध्याय)। इसे इनके पुत्र जल्हण ने पूर्ण किया (“पुस्तक जल्हण हत्थ दै…”)। |
| जयानक भट्ट | पृथ्वीराज विजय | संस्कृत महाकाव्य (12 सर्ग)। इसमें चौहानों की प्रामाणिक वंशावली और तत्कालीन अजमेर का विशद विवरण है। |
| विद्यापति गौड़ | विभिन्न संस्कृत शास्त्र | प्रकांड शास्त्रीय विद्वान। |
| वागीश्वर जनार्दन | संस्कृत काव्य | दरबारी कवि व नीतिज्ञ। |
| विश्वस्वरूप | धर्मशास्त्र ग्रंथ | न्यायिक व धार्मिक परामर्शदाता। |
| आशाराम / पद्मनाभ | साहित्य ग्रंथ | कला एवं साहित्य विभाग के प्रमुख। |
5. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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उपनाम / उपाधियाँ: ‘राय पिथौरा’, ‘दलपंगुल’ (विश्व विजेता), ‘हिन्दू सम्राट’।
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जन्म: 1166 ई. (अणहिलपाटन) | शासन: 1177–1192 ई.।
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माता व संरक्षिका: रानी कर्पूरी देवी | प्रधानमंत्री: कदम्बवास (कैमास) | सेनापति: भुवनमल्ल।
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महोबा युद्ध (1182 ई.) में वीरगति पाने वाले सेनानायक: आल्हा और ऊदल (चंदेल शासक: परमर्दिदेव)।
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अजमेर में कला एवं साहित्य विभाग के अध्यक्ष: पद्मनाभ।
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तराइन का प्रथम युद्ध: 1191 ई. (पृथ्वीराज विजयी) | तराइन का द्वितीय युद्ध: 1192 ई. (गोरी विजयी)।
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पृथ्वीराज तृतीय के बाद अजमेर की सत्ता: भाई हरिराज तथा पुत्र गोविंदराज (जिन्होंने 1194 ई. में रणथंभौर के चौहान वंश की स्थापना की)।