प्रामाणिक अध्ययन नोट्स (Reference Archive)

सांझी पूजन

लॉगिन
1 (आज: 0)
शेयर: WA TG FB 𝕏 सुधार सुझाएँ
सत्यापित: 07 September 2026
मुख्य बिंदु: सांझी पूजन (लोकपर्व एवं पारंपरिक कला) 1. कब, कहाँ और किसके द्वारा अवधि: भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (श्राद्ध पक्ष / कनागत के पूरे 16 दिन)। समय: सितंबर–अक्टूबर। प्रमुख क्षेत्र: मेवाड़ (उदयपुर, राजसमंद), मालवा (मध्य प्रदेश सीमावर्ती क्षेत्र), मारवाड़ और ढूंढाड़ अंचल। प्रतिभागी: मुख्य रूप से कुंवारी कन्याओं (अविवाहित लड़कियों) द्वारा अच्छे वर, सुहाग और […]

सांझी पूजन (लोकपर्व एवं पारंपरिक कला)

1. कब, कहाँ और किसके द्वारा

  • अवधि: भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (श्राद्ध पक्ष / कनागत के पूरे 16 दिन)।
  • समय: सितंबर–अक्टूबर।
  • प्रमुख क्षेत्र: मेवाड़ (उदयपुर, राजसमंद), मालवा (मध्य प्रदेश सीमावर्ती क्षेत्र), मारवाड़ और ढूंढाड़ अंचल।
  • प्रतिभागी: मुख्य रूप से कुंवारी कन्याओं (अविवाहित लड़कियों) द्वारा अच्छे वर, सुहाग और सुखद गृहस्थ जीवन की कामना के लिए।

2. सांस्कृतिक एवं पौराणिक पृष्ठभूमि

  • सांझी का स्वरूप: सांझी को लोक-आस्था में माता पार्वती (गौरी) का बाल/कन्या रूप माना जाता है।
  • नामकरण की व्युत्पत्ति: ‘सांझी’ शब्द की उत्पत्ति ‘संध्या’ (Sanjh/Evening) से हुई है, क्योंकि इसका पूजन और मांडना प्रतिदिन संध्या काल में गोधूलि वेला के समय किया जाता है।
  • पुष्टिमार्गीय (वैष्णव) पृष्ठभूमि:
    • ब्रज और पुष्टिमार्ग (वल्लभ संप्रदाय) की मान्यता के अनुसार, द्वापर युग में श्री राधा जी अपनी सखियों के साथ मिलकर भगवान श्रीकृष्ण को रिझाने और उनके स्वागत हेतु वन के प्राकृतिक फूलों व रंग-बिरंगे पत्थरों से सांझी बनाती थीं।

3. परंपराएँ, विधि और कला शैलियाँ

(क) ग्रामीण लोक सांझी (दीवारों पर गोबर-कौड़ी की सांझी):

  • कन्याएं प्रतिदिन घर के मुख्य द्वार या चबूतरे की दीवार को गाय के ताजे गोबर व पीली मिट्टी/गेरू से लीपकर पवित्र करती हैं।
  • इस पर गोबर से विभिन्न आकृतियां उकेरी जाती हैं तथा उन्हें कौड़ी, कांच के टुकड़े, सीप, रंगीन पन्नी (टिकली), फूल और रोली-चावल से सजाया जाता है।
  • दैनिक आकृतियों का क्रम:
    • पहले दिन: सूर्य, चंद्रमा, तारे, स्वास्तिक (सतिया)।
    • बाद के दिनों में: घेवर, चौपड़, बिच्छू, मोर, बावड़ी, पंखा, सीढ़ी आदि।
    • अंतिम दिन (सर्वपितृ अमावस्या): सबसे जटिल और भव्य आकृति बनाई जाती है, जिसे ‘संज्या कोट’ (Sanja Kot / सांझी का किला) कहा जाता है। इसमें सांझी का पूरा परिवार और श्रृंगार दर्शाया जाता है।
  • सांझी के लोकगीत: पूजा के समय कन्याएं समूह में पारंपरिक गीत गाती हैं:
    “सांझी माई खोल कवाड़, बा’र खड़ी थारी पूजनहार…”
    “म्हारी सांझी चमेली को फूल, सासरिये जावेली…”
  • आरती व बधावा: पूजन के बाद सांझी को घी-गुड़ का भोग लगाया जाता है और आश्विन अमावस्या को अंतिम विसर्जन नदी/जलाशय में किया जाता है।

(ख) मंदिर मार्गीय सांझी (केले के पत्तों व जल पर सांझी):

  • केले के पत्तों की सांझी (नाथद्वारा): श्रीनाथजी मंदिर (नाथद्वारा, राजसमंद) में केले के पत्तों को बारीक कैंची से तराशकर (स्टेंसिल शैली) रंग-बिरंगे सूखे गुलाल और अबीर से कृष्ण-लीलाओं की सांझी बनाई जाती है।
  • जल की सांझी (उदयपुर): पानी के ऊपर रंगों को तैराकर बनाई जाने वाली दुर्लभ कला, जो उदयपुर के वैष्णव मंदिरों में प्रदर्शित होती है।

4. प्रमुख दर्शनीय केंद्र (राजस्थान विशेष)

  • मत्स्येंद्रनाथ जी का मंदिर (उदयपुर):
    • उदयपुर के चांदपोल के निकट स्थित गुरु गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) के इस प्राचीन मंदिर को लोकभाषा में ‘सांझी का मंदिर’ (Temple of Sanjhi) ही कहा जाता है।
    • श्राद्ध पक्ष में यहाँ प्रतिदिन अलग-अलग प्रसंगों पर आधारित भव्य सांझी प्रदर्शनी लगती है।
  • लाडला मंदिर एवं जगदीश मंदिर (उदयपुर): यहाँ भी सांझी दर्शन के लिए भारी भीड़ उमड़ती है।

5. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)

बिंदु विवरण
सीधा प्रतियोगी प्रश्न (RPSC / RSMSSB) “राजस्थान में ‘सांझी का मंदिर’ नाम से विख्यात मंदिर कहाँ स्थित है?” — मत्स्येंद्रनाथ जी का मंदिर (उदयपुर)।
पूजन की अवधि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (16 दिन, श्राद्ध पक्ष)।
पूजा का उद्देश्य व प्रतिभागी कुंवारी कन्याओं द्वारा अच्छे वर व सुखी दांपत्य की प्राप्ति हेतु।
सांझी किसका प्रतीक है? माता पार्वती (गौरी) का।
‘केले के पत्तों की सांझी’ कहाँ प्रसिद्ध है? नाथद्वारा (राजसमंद) — वल्लभ (पुष्टि) संप्रदाय के मंदिरों में।
अंतिम दिन (अमावस्या) की प्रमुख आकृति ‘कोट’ / ‘संज्या कोट’ (विशाल परकोटेनुमा सांझी)।
शिल्प/सामग्री गाय का गोबर, गेरू, कौड़ियां, कांच, पुष्प, अबीर और गुलाल।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

नया संदर्भ / संशोधन जोड़ें
इस आलेख पर अभी कोई बाह्य संदर्भ दर्ज नहीं है। यदि आपके पास प्रामाणिक संदर्भ है तो यहाँ क्लिक करके जोड़ें।

विद्यार्थी चर्चा (0)

विद्यार्थी चर्चा में भाग लेने के लिए कृपया लॉगिन करें।