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श्राद्ध पक्ष / कनागत

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सत्यापित: 07 September 2026
मुख्य बिंदु: श्राद्ध पक्ष / कनागत (पितृ पक्ष) 1. कब और कहाँ तिथि: भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक। कुल अवधि: 16 दिन (16 श्राद्ध)। समय: सितंबर–अक्टूबर। क्षेत्र: संपूर्ण भारत (विशेष रूप से उत्तर भारत, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश)। उपनाम: लोकभाषा में इसे ‘कनागत’ (कन्यागत — जब सूर्य […]

श्राद्ध पक्ष / कनागत (पितृ पक्ष)

1. कब और कहाँ

  • तिथि: भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक।
  • कुल अवधि: 16 दिन (16 श्राद्ध)।
  • समय: सितंबर–अक्टूबर।
  • क्षेत्र: संपूर्ण भारत (विशेष रूप से उत्तर भारत, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश)।
  • उपनाम: लोकभाषा में इसे ‘कनागत’ (कन्यागत — जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करता है) या ‘पितृ पक्ष’ कहा जाता है।

2. पौराणिक पृष्ठभूमि एवं धार्मिक मान्यता

  • कर्ण का दान और यमलोक कथा:
    • महाभारत युद्ध के बाद जब दानवीर कर्ण की आत्मा स्वर्ग पहुँची, तो उन्हें खाने के लिए सोने-चांदी और रत्न दिए गए।
    • कर्ण ने इसका कारण पूछा, तो देवराज इंद्र ने बताया कि जीवनभर उन्होंने स्वर्ण-रत्न दान किए, परंतु अपने पितरों के निमित्त कभी अन्न और जल का तर्पण नहीं किया।
    • कर्ण को अपनी भूल सुधारने के लिए 16 दिनों के लिए पुनः पृथ्वी पर भेजा गया। इन 16 दिनों में उन्होंने विधिवत पिंडदान और अन्न-जल का दान किया। यही काल ‘श्राद्ध पक्ष’ कहलाया।
  • पितृ ऋण से मुक्ति:
    • हिंदू धर्म के तीन मुख्य ऋणों में से एक ‘पितृ ऋण’ माना गया है (देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण)।
    • मान्यता है कि इन 16 दिनों में पितृलोक के द्वार खुलते हैं और पूर्वज सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों के घर आते हैं। श्रद्धापूर्वक जल (तर्पण) और तिल-जौ मिश्रित चावल के पिण्ड (पिंडदान) अर्पित करने से पितृ तृप्त होकर वंशवृद्धि व सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

3. प्रमुख परंपराएँ एवं श्राद्ध की विशिष्ट तिथियाँ

  • पंचबलि (Panchabali) का नियम:
    • श्राद्ध के दिन ब्राह्मण भोजन से पूर्व अग्नि और प्रकृति के 5 घटकों को ग्रास (भाग) निकाला जाता है:
      1. गो-बलि: गाय के लिए
      2. श्वान-बलि: कुत्ते के लिए
      3. काक-बलि: कौवे के लिए (कौवे को पितरों का संदेशवाहक माना जाता है)
      4. देवादि-बलि: चींटियों/कीट-पतंगों के लिए
      5. अतिथि/भिक्षुक-बलि: भिक्षुक या ब्राह्मण के लिए
  • विशिष्ट तिथियों के नियम (Exam Traps):
    • भाद्रपद पूर्णिमा: केवल उन पूर्वजों का श्राद्ध होता है जिनकी मृत्यु किसी भी माह की पूर्णिमा तिथि को हुई हो (ऋषि तर्पण)।
    • अविधवा नवमी (मातृ नवमी): आश्विन कृष्ण नवमी को उन माताओं/सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु पति के जीवित रहते (सुहागन अवस्था में) हुई हो।
    • शस्त्रघात / दुर्घटना श्राद्ध (त्रयोदशी/चतुर्दशी): अकाल मृत्यु (युद्ध, दुर्घटना, विष, अस्त्र-शस्त्र) से मृत परिजनों का श्राद्ध चतुर्दशी को किया जाता है।
    • सर्वपितृ अमावस्या: जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश छूट गया हो, उन सभी का सामूहिक श्राद्ध आश्विन अमावस्या को किया जाता है।
  • शुभ कार्यों का निषेध: इस पक्ष में गृह-प्रवेश, मुंडन, विवाह, नवीन वस्त्र-आभूषण की खरीद जैसे मांगलिक कार्य वर्जित माने जाते हैं।

4. राजस्थान में सांस्कृतिक आयाम : ‘सांझी पूजन’ (Sanjhi Art)

श्राद्ध पक्ष के दौरान राजस्थान और मालवा में एक अत्यंत विशिष्ट लोककला और अनुष्ठान देखने को मिलता है:
  • कुंवारियों का पर्व:
    • श्राद्ध पक्ष के 16 दिनों तक अविवाहित कन्याएं अच्छे वर और गृहस्थ सुख की कामना के लिए ‘सांझी’ (माता पार्वती का लोक स्वरूप) की पूजा करती हैं।
  • कला का स्वरूप (गोबर एवं रंगों की सांझी):
    • प्रतिदिन घर की बाहरी दीवारों पर गाय के ताजे गोबर, गेरू, चूना, कौड़ियों और फूल-पत्तियों से देवी सांझी की विभिन्न ज्यामितीय आकृतियाँ बनाई जाती हैं।
    • अंतिम दिन (अमावस्या) को सबसे भव्य ‘कोट’ (संज्या कोट) बनाया जाता है।
  • उदयपुर का लाडला मंदिर / मत्स्येंद्रनाथ मंदिर (सांझी का मंदिर):
    • राजस्थान में सांझी कला का सबसे प्रसिद्ध केंद्र मत्स्येंद्रनाथ जी का मंदिर (उदयपुर) है, जिसे स्थानीय स्तर पर ‘सांझी का मंदिर’ कहा जाता है।
    • यहाँ केले के पत्तों के कटे हुए सांचों (Stencils) पर विभिन्न रंगों से बनाई जाने वाली सांझी देश-विदेश में विख्यात है।
  • नाथद्वारा (राजसमंद): श्रीनाथजी मंदिर में भी वल्लभ संप्रदाय के तहत जल और केले के पत्तों पर विशेष सांझी झांकी सजाई जाती है।

5. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)

बिंदु विवरण
श्राद्ध पक्ष की अवधि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (कुल 16 दिन)।
‘कनागत’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘कन्यागत’ (सूर्य का कन्या राशि में संचरण)।
अविधवा नवमी (मातृ नवमी) आश्विन कृष्ण नवमी — सुहागन मृत माताओं का श्राद्ध।
सर्वपितृ अमावस्या / महालय आश्विन अमावस्या (अज्ञात तिथि वाले सभी पितरों का तर्पण)।
सांझी पूजन का समय भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या (श्राद्ध पक्ष के 16 दिन) — कुंवारी कन्याओं द्वारा।
‘सांझी का मंदिर’ कहाँ स्थित है? मत्स्येंद्रनाथ मंदिर (उदयपुर) — केले के पत्तों की सांझी हेतु प्रसिद्ध।
पिंडदान के प्रमुख तीर्थ स्थल
• गया (बिहार): फल्गु नदी तट (विष्णुपाद मंदिर — देश का सर्वोच्च श्राद्ध तीर्थ)।
• पुष्कर (अजमेर, राजस्थान): ‘तीर्थराज’ — यहाँ गया कुंड व ब्रह्म घाट पर श्राद्ध तर्पण होता है।
• लोहार्गल (झुंझुनूं, राजस्थान): पांडवों के अस्त्र गलने और पितृ मुक्ति का तीर्थ।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

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