मुख्य बिंदु: जलझूलनी एकादशी (देवझूलनी ग्यारस) एवं चारभुजा नाथ जी का मेला (राजसमंद) 1. कब और कहाँ तिथि: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि। समय: अगस्त–सितंबर। प्रमुख क्षेत्र: संपूर्ण भारत (विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश)। अन्य नाम: इसे ‘देवझूलनी एकादशी’, ‘डोल ग्यारस’, ‘पद्मा एकादशी’, और ‘परिवर्तिनी एकादशी’ भी कहा जाता […]
जलझूलनी एकादशी (देवझूलनी ग्यारस) एवं चारभुजा नाथ जी का मेला (राजसमंद)
1. कब और कहाँ
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तिथि: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि।
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समय: अगस्त–सितंबर।
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प्रमुख क्षेत्र: संपूर्ण भारत (विशेष रूप से राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश)।
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अन्य नाम: इसे ‘देवझूलनी एकादशी’, ‘डोल ग्यारस’, ‘पद्मा एकादशी’, और ‘परिवर्तिनी एकादशी’ भी कहा जाता है।
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राजस्थान का प्रमुख मेला: चारभुजा नाथ जी का मेला — गढ़बोर (कुंभलगढ़ तहसील, राजसमंद ज़िला)।
2. पौराणिक व धार्मिक पृष्ठभूमि
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भगवान विष्णु की करवट (परिवर्तिनी एकादशी):
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आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से क्षीरसागर में योगनिद्रा में शयन कर रहे भगवान विष्णु चातुर्मास के ठीक मध्य यानी भाद्रपद शुक्ल एकादशी को करवट बदलते हैं।
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करवट बदलने के कारण शास्त्रों में इसे ‘परिवर्तिनी एकादशी’ कहा गया है।
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श्रीकृष्ण का ‘जलवा पूजन’ (कुआं पूजन / नामकरण):
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लोकमान्यता के अनुसार, श्रीकृष्ण के जन्म (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) के बाद माता यशोदा का सूतक इसी दिन समाप्त हुआ था और उन्होंने पहली बार घर से बाहर निकलकर कुआं/जल देवता की पूजा (जलवा पूजन) की थी।
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वामन अवतार प्रसंग:
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इसी तिथि पर भगवान विष्णु ने राजा बलि के अहंकार और दानशीलता की परीक्षा लेने के लिए वामन अवतार लिया था तथा तीन पग में तीनों लोकों को नाप लिया था।
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3. चारभुजा नाथ जी का मेला : गढ़बोर (राजसमंद)
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स्थान एवं भौगोलिक स्थिति: यह तीर्थ अरावली की तलहटी में गोमती नदी के पास गढ़बोर गाँव में स्थित है। ‘गढ़बोर’ नाम बोर (बेर) के घने वनों और परकोटे (गढ़) के कारण पड़ा।
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इतिहास व पांडव प्रसंग:
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मान्यता है कि चारभुजा (चतुर्भुज विष्णु) की यह चमत्कारी काले पत्थर की प्रतिमा द्वापर युग में पांडवों द्वारा पूजी गई थी। स्वर्गारोहण से पूर्व पांडवों ने इसे जलमग्न (सरोवर में गुप्त) कर दिया था।
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15वीं शताब्दी (वि.सं. 1500 के आसपास) में मेवाड़ के गुहिल/सिसोदिया शासक के काल में गंगाबाई/ग्रामीणों को यह प्रतिमा पुनः प्राप्त हुई और यहाँ भव्य मंदिर बनवाया गया। मेवाड़ के महाराणाओं (विशेषकर महाराणा कुंभा और महाराणा संग्राम सिंह) का इस मंदिर को विशेष संरक्षण प्राप्त रहा।
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रेवाड़ी (बेवाण) सवारी:
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जलझूलनी एकादशी के दिन चारभुजा नाथ जी की बाल स्वरूप प्रतिमा को स्वर्ण-रजत जड़ित काष्ठ के विमान (जिसे ‘बेवाण’ या ‘रेवाड़ी’ कहा जाता है) में विराजित किया जाता है।
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ठाठ-बाट, राजसी छत्र, चंवर और ढोल-नगाड़ों के साथ भव्य शोभायात्रा निकलती है। भगवान को पास के ‘दूधतलाई’ सरोवर ले जाकर पवित्र स्नान (जलझूलना) कराया जाता है।
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मेवाड़ का लक्खी मेला: यह मेवाड़ और मारवाड़ की सीमा पर स्थित होने के कारण दोनों अंचलों के लाखों श्रद्धालुओं का संगम स्थल है।
4. राजस्थान में अन्य प्रमुख जलझूलनी मेले व परंपराएँ
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सांवरिया सेठ का मेला (मंडफिया, चित्तौड़गढ़):
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अफीम उत्पादक किसानों और व्यापारियों के आराध्य ‘सांवरिया जी’ के मंदिर में जलझूलनी एकादशी पर विशाल मेला भरता है और भगवान का बेवाण निकलता है।
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डोल मेला (बारां):
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हाड़ौती अंचल के बारां शहर में जलझूलनी एकादशी को ‘डोल मेला’ आयोजित होता है, जहाँ विभिन्न अखाड़ों और मंदिरों के 50 से अधिक सजे-धजे ‘डोल’ (विमान) एक साथ निकाले जाते हैं।
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माता सीताबाड़ी / वाल्मीकि आश्रम (केलवाड़ा, बारां): यहाँ भी इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।
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झालावाड़: यहाँ के राधारमण मंदिर व द्वारकाधीश मंदिर से भी भव्य डोल निकाले जाते हैं।
5. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)
| बिंदु | विवरण |
| सीधा प्रतियोगी प्रश्न (RPSC / RSMSSB) | “राजस्थान में चारभुजा नाथ जी का प्रसिद्ध मेला कब और कहाँ भरता है?” — गढ़बोर (राजसमंद), भाद्रपद शुक्ल एकादशी। |
| मेवाड़ के चार प्रमुख धाम (चार वैष्णव पीठ) |
1. श्रीनाथजी (नाथद्वारा, राजसमंद)
2. द्वारकाधीश जी (कांकरोली, राजसमंद)
3. चारभुजा नाथ जी (गढ़बोर, राजसमंद)
4. सांवरिया जी (मंडफिया, चित्तौड़गढ़)
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| ‘डोल मेला’ कहाँ आयोजित होता है? | बारां (हाड़ौती) — तिथि: भाद्रपद शुक्ल एकादशी। |
| काष्ठ कला से संबंधित शब्दावली | • बेवाण (Viman): लकड़ी से बना देवी-देवताओं का रथ/विमान जिसमें जलझूलनी ग्यारस पर देव-सवारी निकाली जाती है। (चित्तौड़गढ़ का बस्सी गाँव बेवाण और काष्ठ कला का प्रधान केंद्र है; इसे ‘मिनी मंदिर’ भी कहते हैं)। |
| एकादशियों का वार्षिक क्रम (Grand Re-cap) |
• निर्जला एकादशी: ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी
• देवशयनी एकादशी: आषाढ़ शुक्ल एकादशी (विष्णु शयन, चातुर्मास आरंभ)
• जलझूलनी / परिवर्तिनी एकादशी: भाद्रपद शुक्ल एकादशी (करवट बदलना, स्नान)
• देवउठनी एकादशी: कार्तिक शुक्ल एकादशी (विष्णु जागरण, चातुर्मास समाप्त, तुलसी विवाह)
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