मुख्य बिंदु: खेजड़ली शहीद मेला : विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला (जोधपुर) 1. कब और कहाँ तिथि: प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि (तेजा दशमी के दिन ही)। समय: अगस्त–सितंबर। स्थान: खेजड़ली गाँव (जोधपुर शहर से लगभग 28 किमी दक्षिण-पूर्व), ज़िला जोधपुर ग्रामीण, राजस्थान। वैश्विक पहचान: यह विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला (Tree Fair) […]
खेजड़ली शहीद मेला : विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला (जोधपुर)
1. कब और कहाँ
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तिथि: प्रतिवर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि (तेजा दशमी के दिन ही)।
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समय: अगस्त–सितंबर।
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स्थान: खेजड़ली गाँव (जोधपुर शहर से लगभग 28 किमी दक्षिण-पूर्व), ज़िला जोधपुर ग्रामीण, राजस्थान।
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वैश्विक पहचान: यह विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला (Tree Fair) एवं पर्यावरण शहीदों का समागम स्थल है।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : खेजड़ली महाबलिदान (1730 ई.)
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ऐतिहासिक तिथि: 28 अगस्त 1730 ईस्वी (भाद्रपद शुक्ल दशमी, विक्रम संवत 1787)।
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तत्कालीन शासक एवं घटनाक्रम:
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मारवाड़ (जोधपुर) के महाराजा अभय सिंह को अपने नए महल (फूल महल/मेहरानगढ़ विस्तार) के निर्माण में चूना पकाने के लिए ईंधन (इमारती लकड़ी) की आवश्यकता पड़ी।
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राजा के हाकिम/दीवान गिरधर दास भंडारी अपने सैनिकों के साथ हरे खेजड़ी (शमी) के पेड़ों को काटने के लिए बिश्नोई बहुल गाँव खेजड़ली पहुँचे।
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अमृता देवी बिश्नोई का नेतृत्व:
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पेड़ों की कटाई का विरोध करते हुए अमृता देवी बिश्नोई ने सैनिकों को रोका। जब सैनिक नहीं माने, तो अमृता देवी अपनी तीन बेटियों (आसू, रत्नी और भागू) के साथ खेजड़ी के तने से लिपट गईं।
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उन्होंने अमर नारा दिया:
“सिर साठे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण।”(अर्थात् यदि सिर कटाकर भी एक पेड़ बचता है, तो यह सौदा बहुत सस्ता है।) -
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363 बलिदानियों का ‘साका’ (खड़ाणा):
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सैनिकों ने बेरहमी से अमृता देवी और उनकी पुत्रियों का सिर कलम कर दिया। इसके बाद उनके पति रामोजी बिश्नोई और गाँव के अन्य लोग आगे आए।
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कुल 363 पर्यावरण रक्षकों (जिनमें 294 पुरुष और 69 महिलाएं शामिल थीं) ने पेड़ों से चिपककर अपने प्राणों की आहुति दे दी।
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राजा का पश्चाताप और राज्यादेश: जब इस भीषण नरसंहार की सूचना महाराजा अभय सिंह तक पहुँची, तो उन्होंने तुरंत कटाई रुकवाई, खेजड़ली गाँव आकर क्षमा मांगी और तांबे के पत्र पर राज्यादेश (ताम्रपत्र) जारी किया कि बिश्नोई क्षेत्रों में हरे पेड़ों की कटाई और वन्यजीवों का शिकार पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा।
3. प्रमुख परंपराएँ एवं मेले का स्वरूप
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शहीद स्मारक एवं नमन: खेजड़ली में 363 शहीदों की स्मृति में भव्य स्मारक और छतरी बनी हुई है, जहाँ भाद्रपद शुक्ल दशमी को विशाल मेला भरता है।
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हवन और पाहल (अमृत) संस्कार:
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मेले के दिन बिश्नोई समाज के लोग गुरु जाम्भोजी द्वारा निर्धारित 29 नियमों का पालन करते हुए विशाल ‘हवन’ (यज्ञ) का आयोजन करते हैं।
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मंत्रोच्चार के साथ पवित्र जल (पाहल) ग्रहण कर पर्यावरण एवं वन्यजीव रक्षा का संकल्प दोहराया जाता है।
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पर्यावरण तीर्थ: देश-विदेश के पर्यावरणविद, विश्नोई समुदाय और आम नागरिक इस दिन यहाँ खेजड़ी के पेड़ों की पूजा करते हैं और नए पौधे रोपने का संकल्प लेते हैं।
4. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)
| बिंदु | विवरण |
| सीधा प्रतियोगी प्रश्न (RPSC / RSMSSB) | “विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला कहाँ और कब आयोजित होता है?” — खेजड़ली (जोधपुर ग्रामीण), भाद्रपद शुक्ल दशमी। |
| घटना का वर्ष एवं शासक | वर्ष: 1730 ई. (वि.सं. 1787) — तत्कालीन जोधपुर शासक: महाराजा अभय सिंह (दीवान: गिरधर दास भंडारी)। |
| शहीदों की कुल संख्या | कुल 363 (69 महिलाएं और 294 पुरुष)। |
| स्थानीय शब्दावली | पेड़ों की रक्षार्थ दिए गए इस सामूहिक आत्मोत्सर्ग को बिश्नोई परंपरा में ‘खड़ाणा’ (Khadana) कहा जाता है। |
| चिपको आंदोलन की प्रेरणा | 1970 के दशक में उत्तराखंड (चमोली) में सुंदरलाल बहुगुणा और गौरा देवी द्वारा शुरू किया गया प्रसिद्ध ‘चिपको आंदोलन’ मूलतः खेजड़ली की इस ऐतिहासिक घटना से ही प्रेरित था। |
| पर्यावरण पुरस्कार (Awards) |
• अमृता देवी विश्नोई स्मृति पुरस्कार: राजस्थान सरकार द्वारा 1994 में स्थापित (वन्यजीव और वन संरक्षण के क्षेत्र में दिया जाने वाला राज्य का सर्वोच्च पुरस्कार; प्रथम प्राप्तकर्ता: गंगाराम बिश्नोई)।
• भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर ‘अमृता देवी बिश्नोई वन्यजीव संरक्षण पुरस्कार’ दिया जाता है।
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| खेजड़ी वृक्ष के तथ्य (Art & Bio GK) |
• राजस्थान का राज्य वृक्ष (घोषित: 31 अक्टूबर 1983)।
• वैज्ञानिक नाम: Prosopis cineraria।
• अन्य नाम: शमी, जांटी (स्थानीय), कल्पवृक्ष, थार का गौरव।
• फल: सांगरी, पत्तियाँ: लूम।
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