मुख्य बिंदु: नागपंचमी एवं जोधपुर (मंडोर) का नागपंचमी मेला 1. कब और कहाँ तिथि: श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (कुछ क्षेत्रों/पंचांगों में कृष्ण पक्ष पंचमी को भी स्थानीय पूजा होती है, पर मुख्य रूप से शुक्ल पक्ष पंचमी)। समय: जुलाई-अगस्त (वर्षा ऋतु)। प्रमुख स्थान (मेला): राजस्थान के जोधपुर जिले का मंडोर (Mandore) क्षेत्र (मंडोर […]
नागपंचमी एवं जोधपुर (मंडोर) का नागपंचमी मेला
1. कब और कहाँ
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तिथि: श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि (कुछ क्षेत्रों/पंचांगों में कृष्ण पक्ष पंचमी को भी स्थानीय पूजा होती है, पर मुख्य रूप से शुक्ल पक्ष पंचमी)।
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समय: जुलाई-अगस्त (वर्षा ऋतु)।
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प्रमुख स्थान (मेला): राजस्थान के जोधपुर जिले का मंडोर (Mandore) क्षेत्र (मंडोर उद्यान परिसर)।
2. पौराणिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(क) राष्ट्रीय/पौराणिक संदर्भ (सर्पयज्ञ की कथा):
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महाभारत के अनुसार, राजा परीक्षित की मृत्यु ‘तक्षक’ नाग के काटने से हुई थी। उनके पुत्र राजा जनमेजय ने प्रतिशोध लेने के लिए पृथ्वी से सभी सर्पों को समाप्त करने हेतु ‘सर्प सत्र’ (सर्पयज्ञ) आयोजित किया।
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जब सर्प भस्म होने लगे, तब आस्तीक ऋषि ने जनमेजय को समझाकर श्रावण शुक्ल पंचमी के दिन यज्ञ रुकवाया और तक्षक सहित शेष सर्प जाति की रक्षा की। इसी उपलक्ष्य में नागपंचमी मनाई जाती है।
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इसके अतिरिक्त, समुद्र मंथन के समय वासुकि नाग द्वारा मंदराचल पर्वत की रस्सी बनना और भगवान शिव का हलाहल विष पीकर सर्पों को आभूषण रूप में धारण करना भी इसके महत्व को बढ़ाता है।
(ख) जोधपुर (मंडोर) के संदर्भ में स्थानीय इतिहास:
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मंडोर, मारवाड़ (जोधपुर) की प्राचीन राजधानी रही है, जहाँ प्राचीन काल में नागवंशी, परिहार (प्रतिहार) और बाद में राठौड़ शासकों का नियंत्रण रहा।
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स्थानीय किंवदंती: माना जाता है कि प्राचीन काल में मंडोर क्षेत्र में विषैले सर्पों का अत्यधिक उपद्रव था। स्थानीय लोगों ने नाग देवता की विशेष स्तुति व अनुष्ठान कर क्षेत्र को सर्पदंश के भय से मुक्त कराया था, जिसकी स्मृति में यहाँ प्रतिवर्ष विशाल मेला भरने की परंपरा शुरू हुई।
3. प्रमुख परंपराएँ एवं विशेषताएँ
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मंडोर का नागपंचमी मेला: नागपंचमी के दिन जोधपुर के मंडोर उद्यान में विशाल मेला लगता है। मारवाड़ क्षेत्र के ग्रामीण और शहरी श्रद्धालु पारंपरिक वेशभूषा में यहाँ पहुँचते हैं।
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नाग पूजा व दूध अर्पण: घरों में दरवाजे के दोनों ओर गाय के गोबर या कोयले से नाग की आकृतियाँ बनाई जाती हैं। मंदिरों व बांबी (anthill) में नाग प्रतिमाओं को कच्चा दूध, दूर्वा, ज्वार/बाजरे की धानी और फूल अर्पित किए जाते हैं।
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भूमि की जुताई व खुदाई पर रोक: इस दिन धरती को जोतना, खोदना या कुदाल-फावड़ा चलाना वर्जित माना जाता है, ताकि मिट्टी में छिपे जीवों या सर्पों को नुकसान न पहुँचे।
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कालबेलिया समुदाय की प्रस्तुति: मेले में सपेरा (कालबेलिया) जाति के लोग पुंगी (बीन) वादन और लोकनृत्य प्रस्तुत करते हैं।
4. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)
| बिंदु | विवरण |
| प्रतियोगी परीक्षा का सीधा प्रश्न | “राजस्थान में नागपंचमी का प्रसिद्ध मेला कहाँ भरता है?” — मंडोर (जोधपुर)। |
| तिथि संबंधी कन्फ्यूजन | राजस्थान में नागपंचमी श्रावण शुक्ल पंचमी को मनाई जाती है। (ध्यान रहे: निडरी नवमी/नेवला नवमी श्रावण कृष्ण नवमी को होती है, जो सर्पदंश से रक्षा हेतु पूजी जाती है)। |
| मारवाड़ के अन्य संबंधित मेले | मंडोर में नागपंचमी के अलावा ‘वीरपुरी का मेला’ (श्रावण मास के अंतिम सोमवार को) भी भरता है, जहाँ मारवाड़ के वीरों/शहीदों की पूजा होती है। |
| मंडोर की ‘वीरों की दालान’ (Hall of Heroes) | मंडोर उद्यान में 16 विशाल मूर्तियाँ (चट्टान काटकर बनाई गई) हैं, जिनमें पाबूजी, रामदेवजी, गोगाजी, मल्लीनाथजी आदि लोकदेवता शामिल हैं। इसका निर्माण महाराजा अजीत सिंह के काल में शुरू हुआ था। |
| सांस्कृतिक जुड़ाव | यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) में शामिल कालबेलिया नृत्य का ऐतिहासिक संबंध सर्प पूजा और सपेरा संस्कृति से है। |