मुख्य बिंदु: गोविंदपुरा हत्याकांड मेवाड़ रियासत के बेंगू किसान आंदोलन का सबसे दर्दनाक और निर्णायक मोड़ था। यह घटना ब्रिटिश अधिकारी मिस्टर ट्रेंच की निर्मम गोलीबारी तथा रूपाजी और कृपाजी धाकड़ के सर्वोच्च बलिदान के लिए राजस्थान के इतिहास में दर्ज है। 1. पृष्ठभूमि व संदर्भ संबंधित आंदोलन: बेंगू किसान आंदोलन (1921 – 1925 ई.)। ठिकाना व […]
गोविंदपुरा हत्याकांड मेवाड़ रियासत के बेंगू किसान आंदोलन का सबसे दर्दनाक और निर्णायक मोड़ था। यह घटना ब्रिटिश अधिकारी मिस्टर ट्रेंच की निर्मम गोलीबारी तथा रूपाजी और कृपाजी धाकड़ के सर्वोच्च बलिदान के लिए राजस्थान के इतिहास में दर्ज है।
1. पृष्ठभूमि व संदर्भ
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संबंधित आंदोलन: बेंगू किसान आंदोलन (1921 – 1925 ई.)।
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ठिकाना व रियासत: बेंगू ठिकाना (वर्तमान चित्तौड़गढ़ जिला), मेवाड़ रियासत।
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तत्कालीन जागीरदार (रावत): रावत अनूप सिंह।
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प्रमुख आंदोलनकारी वर्ग: धाकड़ जाति के किसान।
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मार्गदर्शक संस्था: राजस्थान सेवा संघ (नेता: विजय सिंह पथिक और रामनारायण चौधरी)।
2. तात्कालिक कारण : ‘बोल्शेविक समझौता’ और ‘ट्रेंच कमीशन’
(क) ‘बोल्शेविक समझौता’ रद्द होना:
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1922 में किसानों के तीव्र सत्याग्रह के दबाव में आकर रावत अनूप सिंह ने अजमेर में राजस्थान सेवा संघ (रामनारायण चौधरी) के साथ किसानों की अधिकांश मांगें मान ली थीं।
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मेवाड़ रियासत का रुख: मेवाड़ सरकार (महाराणा) और ब्रिटिश रेजिडेंट ने इस समझौते को मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया। रियासती प्रशासन ने इसे रूस की साम्यवादी क्रांति की संज्ञा देते हुए “बोल्शेविक फैसला / बोल्शेविक समझौता” कहा और खारिज कर दिया।
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रावत अनूप सिंह को गद्दी से हटाकर उदयपुर में नजरबंद कर दिया गया तथा ठिकाने पर कोर्ट ऑफ वार्ड्स (सरकारी प्रशासक) बैठा दिया गया।
(ख) ट्रेंच कमीशन (Trench Commission) का बहिष्कार:
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मेवाड़ सरकार ने किसानों के असंतोष की जांच और समाधान के नाम पर भूमि-बंदोबस्त अधिकारी मि. ट्रेंच (Mr. Trench) को बेंगू भेजा।
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ट्रेंच ने किसानों की मूलभूत समस्याओं (लाग-बाग, बेगार और लाटा-कुंता) को नजरअंदाज करते हुए ठिकाने के पक्ष में एकतरफा निर्णय दिया।
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किसानों ने ट्रेंच के फैसले को मानने से साफ मना कर दिया और आयोग का पूर्ण बहिष्कार किया।
3. गोविंदपुरा हत्याकांड का घटनाक्रम (13 जुलाई 1923 ई.)
(क) गोविंदपुरा में किसानों का महाजमावड़ा:
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सटीक तिथि: 13 जुलाई 1923 ई.
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स्थान: गोविंदपुरा गाँव (बेंगू ठिकाना, चित्तौड़गढ़)।
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ट्रेंच आयोग के एकतरफा फैसले और राज्य के अत्याचारों के विरोध में आगे की रणनीति तय करने के लिए गोविंदपुरा में आसपास के दर्जनों गाँवों के किसान शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे।
(ख) मि. ट्रेंच की बर्बर कार्रवाई:
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मिस्टर ट्रेंच भारी पुलिस बल, तोपों और घुड़सवार सेना के साथ गोविंदपुरा पहुँचा।
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उसने सभा स्थल और पूरे गाँव को चारों तरफ से घेर लिया।
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किसानों को तुरंत सभा समाप्त कर आत्मसमर्पण करने का फरमान जारी किया गया।
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किसानों द्वारा अपनी न्यायोचित मांगों पर अड़े रहने पर, ट्रेंच ने बिना किसी चेतावनी दिए निहत्थी भीड़ पर अंधाधुंध गोलीबारी और लाठीचार्ज का आदेश दे दिया।
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पुलिस ने गाँव के कई घरों और खलिहानों में आग लगा दी।
(ग) अमर शहादत : रूपाजी व कृपाजी धाकड़:
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गोलियों की तड़तड़ाहट के बीच दो निर्भीक किसान नेता सीना तानकर आगे खड़े रहे और मौके पर ही वीरगति को प्राप्त हुए:
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रूपाजी धाकड़
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कृपाजी धाकड़
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इस गोलीबारी में सैकड़ों किसान गंभीर रूप से घायल हुए।
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घटना के बाद लगभग 500 से अधिक किसानों को गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस दिया गया।
4. घटना के बाद के परिणाम
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पथिक जी का प्रवेश व गिरफ्तारी:
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गोविंदपुरा नरसंहार के बाद विजय सिंह पथिक ने आंदोलन की कमान प्रत्यक्ष रूप से अपने हाथों में ले ली।
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वे भूमिगत रहकर बेंगू पहुँचे, लेकिन 10 सितंबर 1923 को मेवाड़ पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए। उन पर विशेष अदालत में देशद्रोह का मुकदमा चला और 5 वर्ष के कठोर कारावास की सजा हुई।
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जागीरदारी व्यवस्था पर दबाव:
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इस वीभत्स हत्याकांड के कारण ब्रिटिश सरकार और मेवाड़ रियासत की चौतरफा बदनामी हुई।
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अंततः 1925 ई. में एक नया भूमि-बंदोबस्त लागू किया गया, जिसमें अधिकांश अवैध लाग-बागें समाप्त की गईं, बेगार पर रोक लगी और किसानों को राहत दी गई।
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5. परीक्षा उपयोगी अति-महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Table)
| प्रमुख बिंदु | परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| सटीक तिथि | 13 जुलाई 1923 ई. |
| स्थान | गोविंदपुरा गाँव (बेंगू ठिकाना, चित्तौड़गढ़) |
| संबंधित आंदोलन | बेंगू किसान आंदोलन |
| गोलीबारी का आदेश देने वाला अधिकारी | मि. ट्रेंच (Mr. Trench) |
| गोविंदपुरा के अमर शहीद | रूपाजी धाकड़ और कृपाजी धाकड़ |
| विवादित समझौता | बोल्शेविक समझौता (1922) — रावत अनूप सिंह व किसानों के बीच (सरकार द्वारा निरस्त) |
| जांच आयोग | ट्रेंच कमीशन (किसानों द्वारा पूर्ण बहिष्कृत) |
| विजय सिंह पथिक की गिरफ्तारी | 10 सितंबर 1923 (5 वर्ष की सजा) |
| आंदोलन की समाप्ति | 1925 ई. (लाग-बाग समाप्त व बंदोबस्त लागू होने के बाद) |