मुख्य बिंदु: मेव किसान आंदोलन राजस्थान के किसान आंदोलनों में विशिष्ट स्थान रखता है। यह आंदोलन न केवल कृषक असंतोष और लगान वृद्धि के विरुद्ध था, बल्कि आगे चलकर इसमें सांप्रदायिक और अंतर-प्रांतीय राजनीतिक प्रभाव भी जुड़े। RPSC व RSMSSB परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इसके सभी महत्वपूर्ण बिंदु नीचे दिए गए हैं: 1. भौगोलिक विस्तार व पृष्ठभूमि […]
मेव किसान आंदोलन राजस्थान के किसान आंदोलनों में विशिष्ट स्थान रखता है। यह आंदोलन न केवल कृषक असंतोष और लगान वृद्धि के विरुद्ध था, बल्कि आगे चलकर इसमें सांप्रदायिक और अंतर-प्रांतीय राजनीतिक प्रभाव भी जुड़े। RPSC व RSMSSB परीक्षाओं के दृष्टिकोण से इसके सभी महत्वपूर्ण बिंदु नीचे दिए गए हैं:
1. भौगोलिक विस्तार व पृष्ठभूमि
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क्षेत्र (मेवात अंचल): तत्कालीन अलवर और भरतपुर रियासतों के सीमावर्ती परगने—जैसे किशनगढ़ बास, तिजारा, रामगढ़, लक्ष्मणगढ़, कामां और नगर।
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समुदाय: मुख्य रूप से मेव कृषक (जो सांस्कृतिक रूप से हिंदू रीति-रिवाजों और आस्था से जुड़े मुस्लिम कृषक थे)।
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शासक: अलवर के तत्कालीन महाराजा सवाई जयसिंह।
2. आंदोलन के प्रमुख कारण
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अत्यधिक भू-राजस्व एवं नई बंदोबस्त दरें: 1923-24 के बाद लागू की गई बंदोबस्त दरों से लगान का भारी बोझ किसानों पर था।
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लाग-बाग व चराई कर: चरागाहों पर अत्यधिक कर और अनेक गैर-कानूनी उपकर वसूले जा रहे थे।
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सूअर एवं वन्यजीव समस्या: शाही रौंदों (शिकारगाहों) के जंगली जानवरों द्वारा फसलों को नष्ट किया जाना।
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धार्मिक एवं शैक्षणिक असंतोष: अलवर राज्य द्वारा मस्जिदों और मदरसों पर प्रशासनिक नियंत्रण तथा धार्मिक शिक्षा के संचालन पर सरकारी पाबंदियां लगाई गईं, जिससे असंतोष को मजहबी रंग मिलने लगा।
3. प्रमुख संगठन एवं नेतृत्वकर्ता
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अंजुमन-ए-खादिम-उल-इस्लाम (Anjuman-e-Khadim-ul-Islam):
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स्थापना वर्ष: 1923 ई. (अलवर)।
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संस्थापक: डॉ. मोहम्मद अली (अलवर के प्रमुख वकील)।
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भूमिका: इस संस्था ने शुरुआत में मेवों की शैक्षणिक और सामाजिक माँगों को उठाया, किंतु 1932 में यह सीधे मेव किसान आंदोलन की मुख्य रणनीतिकार बन गई।
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चौधरी मोहम्मद यासीन खान:
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पहचान: गुड़गांव (नूंह/मेवात) के प्रसिद्ध कद्दावर नेता और वकील, जिन्हें मेवात में “बाबा-ए-कौम” कहा जाता था।
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योगदान: इन्होंने अलवर और भरतपुर के मेव किसानों को संगठित किया, आंदोलन को अंतर-प्रांतीय स्तर (पंजाब व ब्रिटिश भारत) से जोड़ा और ब्रिटिश अधिकारियों तक मेवों की आवाज पहुँचाई।
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सैयद भीक नारनौली व अन्य:
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नारनौल और अंबाला से आए मुस्लिम नेताओं ने भी आंदोलन में प्रचारक की भूमिका निभाई।
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4. आंदोलन का घटनाक्रम व उग्र रूप (1932 – 1933 ई.)
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कर-बंदी आंदोलन (1932):
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यासीन खान के आह्वान पर मेव किसानों ने एकजुट होकर रियासत को लगान और अन्य कर देना पूरी तरह बंद कर दिया।
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मेवों ने स्थानीय पंचायतों के माध्यम से सरकारी अदालतों का बहिष्कार किया।
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गोविंदगढ़ गोलीकांड (जनवरी 1933):
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आंदोलन उग्र होने पर अलवर सरकार ने पुलिस और सेना भेजी।
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जनवरी 1933 में गोविंदगढ़ (अलवर) के पास पुलिस और आंदोलनकारी मेवों के बीच हिंसक झड़प हुई।
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राज्य पुलिस द्वारा चलाई गई गोलियों में कई मेव किसान मारे गए।
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सांप्रदायिक रंग व दंगे:
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आंदोलन केवल कर-विरोध तक सीमित न रहकर तिजारा और आसपास के क्षेत्रों में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों में बदल गया।
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बाहर से आए चरमपंथी तत्वों के कारण स्थिति अत्यधिक तनावपूर्ण हो गई।
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5. ब्रिटिश हस्तक्षेप एवं महाराजा जयसिंह का निष्कासन
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ब्रिटिश सेना की तैनाती:
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स्थिति बेकाबू होते देख ब्रिटिश सरकार ने हस्तक्षेप किया और स्थिति संभालने के लिए ब्रिटिश फौज (ब्रिटिश इन्फैंट्री) अलवर और भरतपुर भेजी।
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जांच आयोग गठन:
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ब्रिटिश अधिकारियों के दबाव में स्थिति की समीक्षा के लिए मिस्टर विली (Wylie) और जी.डी. ओगिल्वी (A.G.G.) ने मध्यस्थता की।
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महाराजा जयसिंह का देश निकाला (1933 ई.):
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ब्रिटिश सरकार ने मेव उपद्रव और राज्य में कुशासन के लिए महाराजा जयसिंह को प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार ठहराया।
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मई 1933 में महाराजा जयसिंह को गद्दी छोड़ने और राज्य से बाहर (निर्वासित) जाने का आदेश दिया गया।
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महाराजा जयसिंह पेरिस (फ्रांस) चले गए, जहाँ 19 मई 1937 को उनका देहावसान हो गया।
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प्रशासनिक नियंत्रण: ब्रिटिश सरकार ने अलवर रियासत का प्रशासन अपने हाथ में लेकर एफ.एस. विली (F.S. Wylie) को राज्य का प्रधानमंत्री/प्रशासक नियुक्त कर दिया।
6. आंदोलन का समाधान
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ब्रिटिश प्रशासक विली ने मेव किसानों की शिकायतों के निवारण हेतु कदम उठाए:
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भू-राजस्व की दरों में उल्लेखनीय कमी की गई।
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अधिकांश लाग-बाग और चराई कर समाप्त कर दिए गए।
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मस्जिदों व धार्मिक मदरसों पर से अनुचित प्रतिबंध हटा लिए गए।
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इन रियायतों के बाद 1934 ई. तक मेव किसान आंदोलन पूर्णतः शांत हो गया।
7. परीक्षा उपयोगी सूक्ष्म तथ्य (Quick Revision Table)
| प्रमुख बिंदु | परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| आंदोलन की अवधि | 1932 – 1934 ई. |
| प्रमुख कार्यक्षेत्र | मेवात क्षेत्र (अलवर व भरतपुर रियासत) |
| प्रमुख संगठन | अंजुमन-ए-खादिम-उल-इस्लाम (1923, संस्थापक: डॉ. मोहम्मद अली) |
| प्रमुख नेतृत्वकर्ता | चौधरी मोहम्मद यासीन खान (गुड़गांव/नूंह, ‘बाबा-ए-कौम’) |
| प्रमुख हिंसक घटना | गोविंदगढ़ गोलीकांड (जनवरी 1933) |
| अलवर के तत्कालीन शासक | महाराजा सवाई जयसिंह |
| शासक पर प्रभाव | महाराजा जयसिंह को 1933 में निष्कासित (पेरिस निर्वासित) किया गया |
| ब्रिटिश प्रशासक | एफ.एस. विली (F.S. Wylie) |
| आंदोलन की विशिष्टता | किसान आंदोलन के साथ-साथ अंतर-प्रांतीय और सांप्रदायिक रंग लेने वाला आंदोलन |