मुख्य बिंदु: शेखावाटी क्षेत्र में हुआ यह आंदोलन राजस्थान के किसान आंदोलनों में सबसे प्रखर, सामाजिक रूप से जागृत और राजनीतिक रूप से प्रभावी आंदोलनों में से एक था। इसकी गूँज ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स (ब्रिटिश संसद) तक पहुँची थी। 1. भौगोलिक व प्रशासनिक पृष्ठभूमि रियासत: जयपुर रियासत के अधीन अर्द्ध-स्वायत्त क्षेत्र। प्रमुख क्षेत्र: सीकर ठिकाना: […]
शेखावाटी क्षेत्र में हुआ यह आंदोलन राजस्थान के किसान आंदोलनों में सबसे प्रखर, सामाजिक रूप से जागृत और राजनीतिक रूप से प्रभावी आंदोलनों में से एक था। इसकी गूँज ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स (ब्रिटिश संसद) तक पहुँची थी।
1. भौगोलिक व प्रशासनिक पृष्ठभूमि
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रियासत: जयपुर रियासत के अधीन अर्द्ध-स्वायत्त क्षेत्र।
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प्रमुख क्षेत्र:
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सीकर ठिकाना: शेखावाटी का सबसे बड़ा और शक्तिशाली ठिकाना।
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पंचपाने (Five Estates of Jhunjhunu): झुंझुनूं के पाँच प्रमुख जागीर क्षेत्र — बिसाऊ, डूंडलोद, मंडावा, मलसीसर और नवलगढ़।
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प्रमुख कृषक वर्ग: मुख्य रूप से जाट किसान (लगभग 70-80% काश्तकार)।
2. आंदोलन के कारण व शुरुआत (सीकर ठिकाना)
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शासक: सीकर के तत्कालीन रावराजा कल्याण सिंह।
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तात्कालिक कारण (1922 ई.):
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रावराजा कल्याण सिंह ने अपने पिता के देहांत के बाद गद्दी पर बैठते ही किसानों पर लगान की दर में 25% से 50% तक भारी वृद्धि कर दी।
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अकाल और सूखे के बावजूद रावराजा ने वादाखिलाफी करते हुए कोई छूट नहीं दी, बल्कि अतिरिक्त लाग-बाग और नए उपकर थोप दिए।
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प्रारंभिक नेतृत्व:
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1922-23 में राजस्थान सेवा संघ के रामनारायण चौधरी और हरि ब्रह्मचारी ने सीकर पहुँचकर आंदोलन को संगठित रूप दिया।
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गूँज:
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1925 ई. में ब्रिटिश संसद (House of Commons) के सदस्य सर पैथिक लॉरेंस (Sir Pethick-Lawrence) ने सीकर के किसानों पर हो रहे अत्याचारों और लगान वृद्धि का मुद्दा ब्रिटिश संसद में उठाया।
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लंदन से प्रकाशित समाचार-पत्र ‘डेली हेराल्ड’ (Daily Herald) में भी सीकर आंदोलन के समर्थन में लेख छपे।
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3. सामाजिक व शैक्षणिक पुनरुत्थान : प्रमुख संस्थाएं
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चिड़ावा की अमर सेवा समिति (1918 ई.): मास्टर प्यारेलाल गुप्ता (जिन्हें ‘चिड़ावा का गांधी’ कहा जाता है) द्वारा स्थापित।
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अखिल भारतीय जाट महासभा: 1925 में पुष्कर (अजमेर) अधिवेशन के बाद शेखावाटी के किसानों को संगठित करने का संकल्प लिया गया।
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जाट प्रजापति महायज्ञ (1934 ई.):
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समय: 20 से 29 जनवरी 1934 (वसंत पंचमी)।
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स्थान: सीकर।
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पुरोहित (यज्ञाचार्य): पंडित खेमराज शर्मा।
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आयोजक: कुंवर हुकम सिंह (संपादक ‘जाट वीर’)।
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महत्व: किसानों में एकता, आत्मसम्मान और सामाजिक जागृति स्थापित करने वाला ऐतिहासिक धार्मिक-सामाजिक सम्मेलन।
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4. कटराथल महिला सम्मेलन (25 अप्रैल 1934 ई.)
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कारण: सिहोट (सीकर) के ठाकुर मानसिंह द्वारा सोतिया का बास गाँव में किसान महिलाओं के साथ किए गए अभद्र व अमानवीय दुर्व्यवहार के विरोध में।
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स्थान: कटराथल (सीकर)।
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तिथि: 25 अप्रैल 1934 ई.
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अध्यक्षता: श्रीमती किशोरी देवी (सरदार हरलाल सिंह खर्रा की धर्मपत्नी)।
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मुख्य वक्ता: उत्तमा देवी (ठाकुर देशराज की धर्मपत्नी — जिन्होंने अत्यंत ओजस्वी और क्रांतिकारी भाषण दिया)।
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अन्य प्रमुख भागीदार महिलाएं: दुर्गा देवी, रमा देवी, फूलां देवी।
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ऐतिहासिक महत्व: सामंती प्रतिबंधों और धारा 144 को तोड़ते हुए 10,000 से अधिक किसान महिलाओं ने भाग लिया। यह राजपूताना के इतिहास का सबसे बड़ा महिला सम्मेलन था।
5. प्रमुख हिंसक घटनाएं व हत्याकांड
(क) जयसिंहपुरा हत्याकांड (21 जून 1934 ई.)
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स्थान: जयसिंहपुरा (झुंझुनूं)।
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घटना: डूंडलोद के ठाकुर हरनाथ सिंह के भाई ईश्वर सिंह ने खेत जोत रहे निहत्थे किसानों पर गोलियाँ चलवाईं और लाठियों से हमला कराया।
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ऐतिहासिक विशिष्टता: राजस्थान के इतिहास में यह पहला मामला था जब किसानों पर हमला करने वाले किसी सामंत (ईश्वर सिंह) को गिरफ्तार कर अदालत द्वारा सजा सुनाई गई।
(ख) खूड़ी गाँव की घटना (मार्च 1935 ई.)
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सीकर के खूड़ी गाँव में दूल्हे द्वारा घोड़ी पर चढ़ने (तोरण मारने) को लेकर राजपूत सामंतों और जाटों में विवाद हुआ। पुलिस ने किसानों पर बर्बर लाठीचार्ज किया, जिसमें कई किसान घायल हुए।
(ग) कूदन हत्याकांड (25 अप्रैल 1935 ई.)
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स्थान: कूदन गाँव (सीकर)।
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घटनाक्रम: पुलिस अधिकारी कैप्टन वेब (Captain Webb) के नेतृत्व में राजस्व वसूली के लिए पुलिस दल पहुँचा। एक वृद्ध किसान महिला धापी दादी के ललकारने पर किसानों ने लगान देने से मना कर दिया।
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गोलीबारी: पुलिस ने निहत्थे किसानों पर गोलियां बरसाईं।
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शहादत: चेतराम, टीकूराम, तुलछाराम और आशाराम मौके पर शहीद हो गए और लगभग 175 किसान घायल हुए।
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ब्रिटिश संसद में फिर गूँज: कूदन हत्याकांड की गूँज भी ब्रिटिश संसद में जोरदार ढंग से उठी।
6. प्रमुख नेतृत्वकर्ता व्यक्तित्व
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चौधरी हरलाल सिंह (सरदार हरलाल सिंह खर्रा): आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकार और किसान सभा के अध्यक्ष।
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ठाकुर देशराज: जाट महासभा के प्रमुख नेता व प्रखर लेखक।
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मास्टर प्यारेलाल गुप्ता: ‘चिड़ावा का गांधी’।
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ताड़कश्वर शर्मा: ‘गणेश’ व ‘काटली’ पत्रिकाओं के माध्यम से किसानों की आवाज उठाई।
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पंडित ताड़केश्वर शर्मा व चौधरी घासीराम: कानूनी और सांगठनिक नेतृत्व दिया।
7. आंदोलन का समापन
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1935 के बाद जयपुर प्रजामण्डल (विशेषकर जमनालाल बजाज और हीरालाल शास्त्री) के हस्तक्षेप से किसानों और राज्य सरकार के बीच कई दौर की वार्ताएं हुईं।
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1938-1939 में समझौता: अधिकांश अवैध लाग-बागें हटाई गईं और भू-राजस्व में रियायतें मिलीं।
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अंतिम समाधान (1947-1952): स्वतंत्रता के पश्चात राजस्थान काश्तकारी अधिनियम और जागीरदारी उन्मूलन के साथ शेखावाटी के किसानों को उनकी भूमि का पूर्ण मालिकाना हक मिला।
8. परीक्षा उपयोगी सूक्ष्म तथ्य (Quick Revision Table)
| प्रमुख बिंदु | परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| अवधि | 1922 – 1947 ई. |
| सीकर के तत्कालीन शासक | रावराजा कल्याण सिंह (1922 में लगान बढ़ाया) |
| ब्रिटिश संसद में आवाज उठाने वाले | सर पैथिक लॉरेंस (1925 ई.) |
| चर्चित विदेशी समाचार पत्र | ‘डेली हेराल्ड’ (लंदन) |
| ‘चिड़ावा का गांधी’ | मास्टर प्यारेलाल गुप्ता (अमर सेवा समिति, 1918) |
| जाट प्रजापति महायज्ञ | जनवरी 1934, सीकर (यज्ञाचार्य: पं. खेमराज शर्मा) |
| कटराथल महिला सम्मेलन | 25 अप्रैल 1934 (10,000 महिलाएं; अध्यक्षा: श्रीमती किशोरी देवी) |
| कटराथल की मुख्य वक्ता | उत्तमा देवी (ठाकुर देशराज की पत्नी) |
| जयसिंहपुरा कांड (1934) | डूंडलोद के ईश्वर सिंह को अदालत द्वारा बाकायदा सजा दी गई |
| कूदन हत्याकांड की तिथि | 25 अप्रैल 1935 (गोलीबारी अधिकारी: कैप्टन वेब) |
| कूदन के प्रमुख शहीद | चेतराम, टीकूराम, तुलछाराम, आशाराम |
| कूदन में किसानों को प्रेरित करने वाली | धापी दादी |