मुख्य बिंदु: यह आंदोलन आधुनिक राजस्थान के इतिहास में किसानों का पहला संगठित विरोध प्रदर्शन माना जाता है, जो बिजोलिया आंदोलन (1897 ई.) से भी 17 वर्ष पूर्व घटित हुआ था। 1. सामान्य परिचय व भौगोलिक स्थिति अन्य नाम: राजस्थान का प्रथम जाट किसान आंदोलन / राशमी किसान आंदोलन। समय: 22 जून 1880 ई. (विस्तार: 1880 से […]
यह आंदोलन आधुनिक राजस्थान के इतिहास में किसानों का पहला संगठित विरोध प्रदर्शन माना जाता है, जो बिजोलिया आंदोलन (1897 ई.) से भी 17 वर्ष पूर्व घटित हुआ था।
1. सामान्य परिचय व भौगोलिक स्थिति
-
अन्य नाम: राजस्थान का प्रथम जाट किसान आंदोलन / राशमी किसान आंदोलन।
-
समय: 22 जून 1880 ई. (विस्तार: 1880 से 1881 ई.)।
-
स्थान: मातृकुंडिया (राशमी परगना, वर्तमान चित्तौड़गढ़ जिला; तत्कालीन मेवाड़ रियासत)।
-
मातृकुंडिया का महत्व: चंद्रभागा नदी के तट पर स्थित पवित्र तीर्थ स्थल, जिसे ‘राजस्थान का हरिद्वार’ और ‘मेवाड़ का हरिद्वार’ कहा जाता है।
-
जातिगत आधार: आंदोलन का मुख्य आधार जाट कृषक थे।
2. आंदोलन के प्रमुख कारण
-
नया भू-राजस्व बंदोबस्त (New Land Revenue Settlement):
-
मेवाड़ के तत्कालीन महाराणा सज्जन सिंह के शासनकाल में ब्रिटिश अधिकारी मिस्टर विंगेट (Mr. Wingate) के निर्देशन में नवीन भूमि-बंदोबस्त नीति तैयार की जा रही थी।
-
-
भू-राजस्व (लगान) की दरों में भारी वृद्धि: नए बंदोबस्त के तहत नकद लगान (बिगौड़ी) की दरें काफी बढ़ा दी गईं।
-
भूमि नाप-जोख से असंतोष: खेतों की पैमाइश (जरीब द्वारा नाप) की नई पद्धति से किसानों में भय था कि उनकी पुश्तैनी जमीन छिन जाएगी या बंजर भूमि पर भी भारी कर लगेगा।
-
अवैध लाग-बाग और चराई कर: चरागाहों पर अतिरिक्त टैक्स लगाने का प्रस्ताव रखा गया था।
3. घटनाक्रम (22 जून 1880 ई.)
-
मातृकुंडिया का वैशाखी/ज्येष्ठ मेला:
-
22 जून 1880 को मातृकुंडिया में आयोजित धार्मिक मेले के अवसर पर चित्तौड़गढ़, कपासन, बेगूं, राशमी आदि परगनों के हजारों जाट किसान एकत्र हुए।
-
-
सत्याग्रह व सामूहिक शपथ:
-
किसानों ने संगठित होकर निर्णय लिया कि जब तक नया बंदोबस्त वापस नहीं लिया जाता, वे:
-
नई दरों पर लगान नहीं देंगे।
-
सरकारी अधिकारियों को खेतों की पैमाइश (नाप) नहीं करने देंगे।
-
-
-
उदयपुर कूच (महाराणा के समक्ष गुहार):
-
लगभग 3,000 से 4,000 किसान मेवाड़ की राजधानी उदयपुर पहुँचे और महाराणा सज्जन सिंह के महल के बाहर अपनी समस्याओं को लेकर डेरा डाल दिया।
-
4. रियासती रुख एवं परिणाम
-
महाराणा का रुख:
-
महाराणा सज्जन सिंह ने किसानों के शिष्टमंडल से वार्ता की।
-
किसानों को शांत करने के लिए आश्वासन दिया गया कि उनकी जायज शिकायतों पर विचार होगा और पैमाइश के नियमों में ढील दी जाएगी।
-
-
प्रशासनिक सख्ती:
-
यद्यपि कुछ माँगें आंशिक रूप से मानी गईं, लेकिन रियासती प्रशासन ने आंदोलन के प्रमुख जाट नेताओं को चिन्हित कर बाद में गिरफ्तार कर लिया और विंगेट बंदोबस्त को संशोधनों के साथ लागू कर दिया।
-
-
ऐतिहासिक महत्व:
-
यह आंदोलन लंबे समय तक नहीं खिंच सका और न ही इसका कोई बड़ा स्थायी संगठन बना, लेकिन इसने सिद्ध कर दिया कि किसान अपनी माँगों के लिए संगठित होकर रियासती राजधानी तक पहुँच सकते हैं। इसने आगे चलकर बिजोलिया (1897) और एकी आंदोलन (1921) की जमीन तैयार की।
-
5. परीक्षा उपयोगी सूक्ष्म तथ्य (Quick Revision Table)
| प्रमुख बिंदु | परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| आंदोलन का वर्ष | 1880 ई. (22 जून 1880 से शुरुआत) |
| प्रमुख स्थल | मातृकुंडिया (राशमी परगना, चित्तौड़गढ़) |
| भौगोलिक उपनाम | मातृकुंडिया को ‘राजस्थान का हरिद्वार’ कहा जाता है |
| तत्कालीन मेवाड़ महाराणा | महाराणा सज्जन सिंह |
| बंदोबस्त अधिकारी | मिस्टर विंगेट (Mr. Wingate) |
| भागीदार जाति | मुख्य रूप से जाट किसान |
| ऐतिहासिक विशिष्टता | बिजोलिया से पूर्व राजस्थान का पहला संगठित किसान प्रतिरोध |