मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक व साहित्यिक तथ्य मेवाड़ (प्राचीन नाम: मेदपाट / प्राग्वाट / शिवि जनपद) राजस्थान का सर्वाधिक प्राचीन, गौरवशाली और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य रहा है। यहाँ गुहिल (गहलोत) तथा बाद में उनकी उपशाखा सिसोदिया राजवंश ने शासन किया। राजवंश का संस्थापक: 566 ई. में गुहादित्य (गुहिल) ने गुहिल वंश की […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक व साहित्यिक तथ्य
मेवाड़ (प्राचीन नाम: मेदपाट / प्राग्वाट / शिवि जनपद) राजस्थान का सर्वाधिक प्राचीन, गौरवशाली और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य रहा है। यहाँ गुहिल (गहलोत) तथा बाद में उनकी उपशाखा सिसोदिया राजवंश ने शासन किया।
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राजवंश का संस्थापक: 566 ई. में गुहादित्य (गुहिल) ने गुहिल वंश की नींव रखी।
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वास्तविक संस्थापक: बप्पा रावल (कालभोज) — इन्होंने 734 ई. में मानमोरी को पराजित कर चित्तौड़ पर अधिकार किया तथा नागदा को अपनी राजधानी बनाया। इन्होंने हरित ऋषि के आशीर्वाद से राज्य प्राप्त किया और एकलिंगनाथ जी (लकुलीश संप्रदाय) को मेवाड़ का वास्तविक शासक तथा स्वयं को उनका दीवान माना।
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राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम:
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नागदा (बप्पा रावल)
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आहाड़ (अल्लट / आलू रावल)
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चित्तौड़गढ़ (रावल जैत्रसिंह — भूताला युद्ध के बाद)
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कुंभलगढ़ (महाराणा कुंभा)
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उदयपुर (महाराणा उदयसिंह — 1559 ई.)
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गोगुंदा / चावंड (महाराणा प्रताप — 1585 ई. में चावंड को 28 वर्षों हेतु राजधानी बनाया)
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दो प्रमुख शाखाएँ:
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रावल शाखा: अंतिम शासक रावल रतनसिंह (1303 ई. — अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण, प्रथम साका, रानी पद्मिनी का जौहर)।
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राणा / सिसोदिया शाखा: संस्थापक राणा हम्मीर (1326 ई. — चित्तौड़ का उद्धार, ‘विषम घाटी पंचानन’)।
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मेवाड़ के तीन ऐतिहासिक साके:
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प्रथम साका (1303 ई.): शासक रावल रतनसिंह, आक्रमणकारी अलाउद्दीन खिलजी, जौहर रानी पद्मिनी।
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द्वितीय साका (1534-35 ई.): शासक विक्रमादित्य (संरक्षिका रानी कर्मावती), आक्रमणकारी बहादुरशाह (गुजरात), जौहर रानी कर्मावती।
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तृतीय साका (1567-68 ई.): शासक महाराणा उदयसिंह, सेनापति जयमल-पत्ता, आक्रमणकारी अकबर, जौहर पत्ता की पत्नी फूलकंवर के नेतृत्व में।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक रचनाएँ, साहित्य और रचनाकार
मेवाड़ के इतिहास और साहित्यिक वैभव को प्रमाणित करने वाले प्रमुख ग्रंथ एवं शिलालेख:
| रचना (Work) | रचनाकार (Author) | भाषा / प्रकार | मुख्य विवरण |
| वीर विनोद | कविराजा श्यामलदास | डिंगल मिश्रित हिंदी | मेवाड़ का प्रामाणिक वृहद इतिहास। इसमें कुंभा द्वारा 84 में से 32 दुर्गों के निर्माण का उल्लेख है। |
| एकलिंग महात्म्य | कान्हा व्यास | संस्कृत | गुहिल-सिसोदिया वंशावली का विशद वर्णन। इसका प्रथम भाग ‘राजवर्णन’ स्वयं महाराणा कुंभा ने लिखा। |
| संगीतराज, रसिकप्रिया टीका, संगीत मीमांसा | महाराणा कुंभा | संस्कृत | कुंभा के संगीत, काव्य और शास्त्र-ज्ञान का चरमोत्कर्ष (‘संगीतराज’ 5 उल्लासों में विभक्त है)। |
| राजवल्लभ, रूपमंडन, प्रसाद मंडन, कोदंड मंडन | मंडन (कुंभा का प्रधान शिल्पी) | संस्कृत (वास्तुशास्त्र) | नगर, दुर्ग, मूर्ति एवं देवालय स्थापत्य के शास्त्रीय नियम। |
| अमरकाव्य वंशावली / राजप्रशस्ति | रणछोड़ भट्ट तैलंग | संस्कृत | राजसमंद झील की पाल पर 25 काली शिलाओं पर उत्कीर्ण विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख (संस्कृत महाकाव्य)। |
| गोरा बादल री बात | हेमरतन सूरि | डिंगल/राजस्थानी (1589 ई.) | 1303 के चित्तौड़ साके में गोरा और बादल के अप्रतिम बलिदान का आख्यान। |
| पद्मावत | मलिक मुहम्मद जायसी | अवधी (1540 ई.) | सूफी प्रेमाख्यानक काव्य जिसमें रतनसिंह, पद्मिनी और खिलजी का रूपक वर्णन है। |
| चेतावनी रा चूँगट्या | केसरी सिंह बारहठ | डिंगल (13 सोरठे) | 1903 ई. के लॉर्ड कर्जन के दिल्ली दरबार में जाने से महाराणा फतेहसिंह को रोकने हेतु रचित। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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दीवान परंपरा एवं संप्रभुता: मेवाड़ के महाराणा स्वयं को कभी राजा नहीं मानते थे, बल्कि वे भगवान श्री एकलिंगनाथ जी के दीवान के रूप में शासन करते थे।
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राज्य चिह्न एवं आदर्श वाक्य: मेवाड़ के राजचिह्न पर अंकित सूत्र वाक्य है—“जो दृढ़ राखे धरम को, तिहिं राखे करतार।”(राजचिह्न पर एक तरफ राजपूत योद्धा और दूसरी तरफ भील योद्धा ‘पूंजा भील’ का अंकन है)।
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प्रतिरोध एवं स्वाधीनता का साहित्य: दिल्ली सल्तनत और मुग़ल साम्राज्य के विरुद्ध अनवरत प्रतिरोध के कारण मेवाड़ चारणी साहित्य और डिंगल काव्य में राष्ट्रीय चेतना एवं स्वाभिमान का केंद्र बिंदु बना।
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चित्रकला की चावंड/मेवाड़ शैली: महाराणा अमरसिंह प्रथम के काल में प्रसिद्ध चित्रकार निसारदीन (नासिुरुद्दीन) ने 1605 ई. में ‘रागमाला’ का चित्रांकन चावंड में किया। जगतसिंह प्रथम का काल मेवाड़ चित्रकला का स्वर्णकाल माना जाता है (इन्होंने ‘चितारों की ओवरी’ या ‘तस्वीरां रो कारखानो’ बनवाया)।
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प्रथम मुग़ल-मेवाड़ संधि (5 फरवरी, 1615): महाराणा अमरसिंह प्रथम और मुग़ल बादशाह जहाँगीर के मध्य खुर्रम (शाहजहाँ) के प्रयासों से संधि हुई (शर्त: महाराणा मुग़ल दरबार में नहीं जाएंगे, कुँवर कर्णसिंह उपस्थित होंगे; चित्तौड़ दुर्ग की मरम्मत नहीं की जाएगी)।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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मेवाड़ का प्रथम शासक जिसने नौकरशाही का गठन किया: अल्लट (आलू रावल)।
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भूताला का युद्ध (1227 ई.): रावल जैत्रसिंह ने इल्तुतमिश को पराजित किया (जयसिंह सूरि कृत ‘हम्मीर मदमर्दन’ में उल्लेख)।
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मेवाड़ का भीष्म पितामह: कुँवर चूड़ा (महाराणा लाखा के पुत्र)।
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हल्दीघाटी का युद्ध: 18 जून, 1576 (गोपीनाथ शर्मा के अनुसार 21 जून, 1576) — अबुल फज़ल ने ‘खमनौर का युद्ध’ और बदायूँनी ने ‘गोगुंदा का युद्ध’ कहा।
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विश्व का सबसे बड़ा शिलालेख: राजप्रशस्ति (25 शिलाएँ, रणछोड़ भट्ट तैलंग) राजसमंद में।