मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य मेवाड़ के इतिहास और 13वीं शताब्दी के सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक परिवेश को समझने के लिए चीरवा का शिलालेख (Chirwa Inscription) सर्वाधिक प्रामाणिक एवं महत्वपूर्ण पुरालेखीय स्रोतों में से एक है। स्थान: उदयपुर से लगभग 14 किलोमीटर उत्तर में स्थित चीरवा गाँव के एक मंदिर (विष्णु/सूर्य मंदिर) के बाहरी […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
मेवाड़ के इतिहास और 13वीं शताब्दी के सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक परिवेश को समझने के लिए चीरवा का शिलालेख (Chirwa Inscription) सर्वाधिक प्रामाणिक एवं महत्वपूर्ण पुरालेखीय स्रोतों में से एक है।
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स्थान: उदयपुर से लगभग 14 किलोमीटर उत्तर में स्थित चीरवा गाँव के एक मंदिर (विष्णु/सूर्य मंदिर) के बाहरी द्वार की दीवार पर उत्कीर्ण।
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उत्कीर्णन का समय: 1273 ईस्वी (विक्रम संवत 1330, कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी)।
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तत्कालीन शासक: मेवाड़ के गुहिल वंशीय शासक रावल समरसिंह के शासनकाल का प्रारंभिक समय।
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भाषा एवं लिपि: भाषा विशुद्ध संस्कृत (पद्यमय शैली, कुल 51 श्लोक) तथा लिपि नागरी है।
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ऐतिहासिक वंशावली: इस अभिलेख में मेवाड़ के चार प्रमुख गुहिल शासकों के शौर्य एवं उपलब्धियों का क्रमिक विवरण मिलता है:
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रावल पदमसिंह
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रावल जैत्रसिंह (1213–1253 ई.)
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रावल तेजसिंह
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रावल समरसिंह
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नागदा विध्वंस व भूताला युद्ध की पुष्टि: इसमें रावल जैत्रसिंह द्वारा मालवा, गुजरात, मारवाड़ तथा दिल्ली के मुस्लिम सुल्तान (इल्तुतमिश) के विरुद्ध लड़े गए युद्धों और तुर्कों द्वारा नागदा के विध्वंस का उल्लेख है।
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तलारक्ष (ग्राम रक्षक/सामंत) परिवार का वृत्तांत: यह शिलालेख मूलतः चीरवा के तलारक्ष (कोतवाल/रक्षक) परिवार के पद्मराज, मदन, योगराज और कर्मसिंह के शौर्य एवं मंदिर निर्माण के उपलक्ष्य में स्थापित किया गया था। मदन के पुत्र योगराज ने कोटेश्वर शिव मंदिर के सम्मुख योगेश्वर (विष्णु) का मंदिर बनवाया था।
2. प्रमुख रचनाकार, उत्कीर्णक एवं संबंधित जैन आचार्य
चीरवा शिलालेख की रचना और प्रतिष्ठा में तत्कालीन जैन विद्वानों की प्रमुख भूमिका थी:
| कार्य / पद | नाम | विवरण / संबद्धता |
| प्रशस्तिकार (रचयिता) | रत्नप्रभ सूरि | प्रसिद्ध जैन आचार्य (चैत्रगच्छ के आचार्य)। इन्होंने संस्कृत पद्य में इस उच्च कोटि की प्रशस्ति की रचना की। |
| संशोधक (शोधनकर्ता) | भुवनसिंह सूरि / पार्श्वचंद्र | रत्नप्रभ सूरि के शिष्य, जिन्होंने प्रशस्ति के भाषा-दोषों का परिष्कार/शोधन किया। |
| उत्कीर्णक (शिल्पी/सूत्रधार) | केलिसिंह (केली) | शिल्पी पद्म के पुत्र, जिन्होंने शिला पर अक्षरों को उत्कीर्ण किया। |
| प्रतिष्ठाता | देवभद्र सूरि | मंदिर एवं प्रशस्ति की प्रतिष्ठा कराने वाले जैन मुनि। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ, प्रवृत्तियाँ एवं सामाजिक साक्ष्य
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सती प्रथा का प्रामाणिक साक्ष्य:
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इस अभिलेख में उल्लेख है कि भूताला/नागदा युद्ध में वीरगति पाने वाले योद्धा मदन की पत्नी रायल (Rayala) पति की मृत्यु के बाद सती हुई थी। राजस्थान में सती प्रथा के प्रारंभिक पुरालेखीय साक्ष्यों में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
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भूताला युद्ध (1227 ई.) की ऐतिहासिक पुष्टि: यह अभिलेख प्रमाणित करता है कि सुल्तान इल्तुतमिश (तुर्क सेना) ने नागदा को जला दिया था और रावल जैत्रसिंह के वीर सेनापतियों ने अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए तुर्कों को पराजित किया था।
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धार्मिक समन्वय (शैव, वैष्णव एवं जैन सह-अस्तित्व):
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मंदिर वैष्णव व शैव मत से संबंधित था।
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प्रशस्ति की रचना और प्रतिष्ठा जैन आचार्यों (रत्नप्रभ सूरि, देवभद्र सूरि) द्वारा की गई। यह तत्कालीन मेवाड़ में धार्मिक सौहार्द और सहिष्णुता की उत्कृष्ट बानगी प्रस्तुत करता है।
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प्रशासनिक शब्दावली का ज्ञान: अभिलेख से मध्यकालीन मेवाड़ की स्थानीय शासन व्यवस्था और पदों, जैसे—‘तलारक्ष’ (नगर रक्षक/कोतवाल) और ‘महाजन’ (व्यापारी/प्रशासनिक वर्ग) की स्पष्ट जानकारी मिलती है।
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पशुबलि निषेध: अभिलेख में मंदिर परिसर के आसपास जीव-हिंसा एवं पशु-बध पर प्रतिबंध का भी उल्लेख मिलता है।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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समय: 1273 ई. (वि.सं. 1330) | स्थान: चीरवा गाँव (उदयपुर)।
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तत्कालीन गुहिल शासक: रावल समरसिंह।
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प्रशस्तिकार: रत्नप्रभ सूरि (संशोधक: भुवनसिंह) | उत्कीर्णक: केलिसिंह।
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वर्णित चार शासक: पदमसिंह, जैत्रसिंह, तेजसिंह, समरसिंह।
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सामाजिक महत्व: सती प्रथा (रायल देवी) तथा तलारक्ष पद का उल्लेख।
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ऐतिहासिक महत्व: नागदा विध्वंस एवं जैत्रसिंह के युद्धों की पुष्टि।