प्रामाणिक अध्ययन नोट्स (Reference Archive)

नगर सभ्यता

लॉगिन
0 (आज: 0)
शेयर: WA TG FB 𝕏 सुधार सुझाएँ
सत्यापित: 24 September 2026
मुख्य बिंदु: नगर सभ्यता (टोंक): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार नगर सभ्यता राजस्थान की ऐतिहासिक, मुद्राशास्त्रीय (Numismatics) और पुरातात्विक सभ्यताओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। नगर से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं: 1. सामान्य परिचय एवं […]

नगर सभ्यता (टोंक): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण

मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार नगर सभ्यता राजस्थान की ऐतिहासिक, मुद्राशास्त्रीय (Numismatics) और पुरातात्विक सभ्यताओं में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
नगर से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं:

1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक स्थिति

  • जिला: टोंक (राजस्थान) — यह प्राचीन स्थल टोंक जिले के उनियारा कस्बे के पास स्थित है।
  • प्राचीन नाम: इस ऐतिहासिक स्थल का प्राचीन नाम ‘मालव नगर’ या ‘करकोटक नगर’ (करकोट नगर) मिलता है। यह प्राचीन मालव गणराज्य की राजधानी या प्रमुख राजनीतिक केंद्र था।
  • क्षेत्रफल: इस प्राचीन टीले का क्षेत्रफल लगभग 5 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है।

2. खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation)

  • आरंभिक खोज व सर्वेक्षण: इस स्थल पर सबसे पहले वर्ष 1871 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् ए.सी. कार्लाइल (A.C. Carlleyle) द्वारा सर्वेक्षण किया गया था। (कार्लाइल को राजस्थान के पुरातत्व जगत में विशिष्ट स्थान प्राप्त है)।
  • वैज्ञानिक उत्खनन: वर्ष 1942-43 में पुरातत्वविद् श्रीकृष्ण देव (Sri Krishna Deva) के निर्देशन में यहाँ बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक उत्खनन कराया गया था।

3. नगर सभ्यता की मुख्य विशेषताएँ (बिंदुवार संपूर्ण विवरण)

A. मालव सिक्कों का विशाल भंडार (6000 सिक्के)

  • नगर सभ्यता की सबसे बड़ी और सर्वविदित विशेषता यहाँ से मिलने वाला सिक्कों का अपार भंडार है।
  • उत्खनन और सर्वेक्षण के दौरान यहाँ से एक साथ लगभग 6000 (छह हजार) तांबे के मालव सिक्के तथा बड़ी संख्या में आहत (पंचमार्क) मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।
  • इतनी भारी मात्रा में सिक्के मिलने से यह सिद्ध होता है कि प्राचीन काल में यहाँ सिक्का ढालने की टकसाल (Mint) रही होगी और यह एक समृद्ध व्यावसायिक केंद्र था।

B. काल निर्धारण और निरंतरता

  • पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार यह नगर दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर तीसरी-चौथी शताब्दी ईस्वी तक अपनी चरम उन्नति पर था, और इसके अवशेष 9वीं-10वीं शताब्दी ईस्वी तक अस्तित्व में रहे।

C. उत्कृष्ट मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ

नगर के उत्खनन से गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल की बेजोड़ कलाकृतियाँ प्राप्त हुई हैं:
  • महिषासुरमर्दिनी की मूर्ति: यहाँ से स्लेटी पत्थर (Grey stone) से निर्मित महिषासुरमर्दिनी की एक अत्यंत सुंदर और कलात्मक प्रतिमा मिली है।
  • अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ: यहाँ से मोदक धारण किए हुए गणेश जी का अंकन, फणधारी नाग की आकृतियाँ, और कमल का फूल धारण किए हुए लक्ष्मी जी की खड़ी प्रतिमा प्राप्त हुई है।

D. मृदभांड और दैनिक जीवन की सामग्रियाँ

  • यहाँ से मिलने वाले अधिकांश मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) गहरे लाल रंग के हैं।
  • इसके अलावा यहाँ से अन्न भरने के बड़े-बड़े कलात्मक मटके, पक्की ईंटों के घर, आभूषण और टेराकोटा की सुंदर सामग्रियाँ मिली हैं, जो इसके उन्नत शहरी जीवन को दर्शाती हैं।
आरपीएससी (RPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से नगर सभ्यता से मुख्य रूप से टोंक जिला, उनियारा कस्बा, प्राचीन नाम करकोटक नगर/मालव नगर, श्रीकृष्ण देव (1942-43), और 6000 मालव सिक्कों की प्राप्ति से जुड़े प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

नया संदर्भ / संशोधन जोड़ें
इस आलेख पर अभी कोई बाह्य संदर्भ दर्ज नहीं है। यदि आपके पास प्रामाणिक संदर्भ है तो यहाँ क्लिक करके जोड़ें।

विद्यार्थी चर्चा (0)

विद्यार्थी चर्चा में भाग लेने के लिए कृपया लॉगिन करें।