मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (सांभर / शाकंभरी) के चौहान राजवंश के प्रारंभिक इतिहास में सामन्तराज (सामन्तदेव) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मूल पुरुष वासुदेव चौहान (551 ई.) के उपरांत चौहान वंश की राजनीतिक प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करने वाले आरंभिक शासकों में सामन्तराज अग्रणी माने जाते हैं। समय काल: लगभग 7वीं–8वीं शताब्दी (लगभग […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (सांभर / शाकंभरी) के चौहान राजवंश के प्रारंभिक इतिहास में सामन्तराज (सामन्तदेव) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मूल पुरुष वासुदेव चौहान (551 ई.) के उपरांत चौहान वंश की राजनीतिक प्रतिष्ठा को सुदृढ़ करने वाले आरंभिक शासकों में सामन्तराज अग्रणी माने जाते हैं।
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समय काल: लगभग 7वीं–8वीं शताब्दी (लगभग 684–709 ईस्वी)।
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वंशानुगत स्थिति: वासुदेव चौहान के बाद चौहान वंशावली को निरंतरता देने वाले प्रभावशाली शासक। इनके बाद नरदेव (नृप), जयराज (अजयराज प्रथम), विग्रहराज प्रथम, चंद्रराज प्रथम और दुर्लभराज प्रथम जैसे शासक हुए।
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बिजौलिया शिलालेख में उल्लेख: 1170 ई. के बिजौलिया शिलालेख (भीलवाड़ा) में चौहानों की वंशावली का प्रारंभ मूल रूप से सामन्तराज से ही माना गया है।
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वत्सगोत्रीय ब्राह्मण संदर्भ: बिजौलिया शिलालेख के तीसरे श्लोक में सामन्तराज के संदर्भ में उल्लेख मिलता है—“विप्रः श्रीवत्सगोत्रेऽभूदभूत भूपाल विप्रहः। सामन्तोऽनंतसामन्तः स्फुरद्रत्नचयो चयः॥”अर्थात् वत्सगोत्र के विप्र (ब्राह्मण) कुल में सामन्त नाम के एक प्रतापी राजा हुए, जिनके अधीन अनेक सामंत थे। इसी आधार पर डॉ. दशरथ शर्मा और डॉ. डी. आर. भंडारकर ने चौहानों को ‘वत्सगोत्रीय ब्राह्मण’ माना है।
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उपाधियाँ व स्वरूप: इन्हें अनेक सामंतों का अधिपति होने के कारण ‘अनंत सामंत’ भी कहा गया।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
सामन्तराज और प्रारंभिक चाहमान शासकों के इतिहास की पुष्टि करने वाले प्रमुख अभिलेखीय व साहित्यिक स्रोत:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य विवरण |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (दिगंबर जैन विद्वान) | संस्कृत (शिलालेख) | सामन्तराज का विशद प्रशस्तिपरक उल्लेख, उन्हें वत्सगोत्रीय विप्र (ब्राह्मण) और ‘अनंत सामंत’ का अधिपति घोषित किया गया। |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी राजकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | सपादलक्ष (सांभर) के प्रारंभिक चाहमान नरेशों की वंशावली और उनकी उपलब्धियों का प्रामाणिक विवरण। |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि | संस्कृत (महाकाव्य) | प्रारंभिक चौहान शासकों के पराक्रम और सूर्यवंशी उत्पत्ति का आख्यान। |
| प्रबंध चिंतामणि | आचार्य मेरुतुंग | संस्कृत (प्रबंध साहित्य) | शाकंभरी और गुजरात के समकालीन संबंधों व प्रारंभिक राजपूत वंशावलियों का उल्लेख। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज (Early Chauhan Dynasties) | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; सामन्तराज के काल और बिजौलिया अभिलेख के आधार पर वत्सगोत्रीय उत्पत्ति का शोधपरक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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सामंती व्यवस्था का बीजारोपण: सामन्तराज के काल से ही चौहानों में स्थानीय सरदारों और छोटे सामंतों को संगठित कर एक सुदृढ़ शक्ति-केंद्र बनाने की प्रक्रिया आरंभ हुई।
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वत्सगोत्रीय ब्राह्मण मत का आधारस्तंभ: राजस्थान की प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जाने वाला ‘चौहानों की वत्सगोत्रीय ब्राह्मण उत्पत्ति’ का संपूर्ण सिद्धांत बिजौलिया शिलालेख में वर्णित सामन्तराज के श्लोक पर ही आधारित है।
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शाकंभरी शक्तिपीठ और शैव मत का पोषण: इस काल में कुलदेवी शाकंभरी माता और कुलदेवता हर्षनाथ (शिव) के प्रति अनन्य आस्था का प्रादुर्भाव हुआ।
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गुर्जर-प्रतिहारों के साथ प्रारंभिक संबंध: इस काल के आरंभिक चौहान शासक स्वतंत्र होने के साथ-साथ उत्तर भारत की प्रमुख शक्ति गुर्जर-प्रतिहारों के साथ सामरिक संतुलन बनाए हुए थे (जो आगे चलकर गूवक प्रथम के समय पूर्णतः स्वतंत्र हुए)।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) में किस चौहान शासक को ‘वत्सगोत्रीय विप्र’ कहा गया: सामन्तराज।
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सामन्तराज को दी गई उपाधि: ‘अनंत सामंत’।
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बिजौलिया शिलालेख के रचयिता: गुणभद्र (उत्कीर्णक: गोविंद / कायस्थ केशव)।
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चौहानों की प्रारंभिक राजधानी: अहिच्छत्रपुर (नागौर) और शक्ति केंद्र: सपादलक्ष (सांभर)।