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एकी / भौमट भील आंदोलन

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सत्यापित: 02 September 2026
मुख्य बिंदु: एकी आंदोलन राजस्थान के जनजातीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। भगत आंदोलन जहाँ मुख्य रूप से सामाजिक-धार्मिक सुधार से शुरू हुआ था, वहीं एकी आंदोलन प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक, आर्थिक शोषण (लाग-बाग व बेगार) और सामंती दमन के विरुद्ध किसानों-आदिवासियों का संगठित सत्याग्रह था। 1. प्रणेता : मोतीलाल तेजावत का जीवन परिचय जन्म: 1886 […]
एकी आंदोलन राजस्थान के जनजातीय इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था। भगत आंदोलन जहाँ मुख्य रूप से सामाजिक-धार्मिक सुधार से शुरू हुआ था, वहीं एकी आंदोलन प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक, आर्थिक शोषण (लाग-बाग व बेगार) और सामंती दमन के विरुद्ध किसानों-आदिवासियों का संगठित सत्याग्रह था।

1. प्रणेता : मोतीलाल तेजावत का जीवन परिचय

  • जन्म: 1886 ई.
  • जन्म स्थान: कोलयारी गाँव (झाड़ोल ठिकाना, उदयपुर/मेवाड़)।
  • जाति / परिवार: ओसवाल (जैन) महाजन परिवार।
  • आरंभिक कार्य: झाड़ोल ठिकाने के कामदार (मुनीम/प्रबंधक)। कामदार रहते हुए उन्होंने सामंती शोषण, अत्यधिक लगान और आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों को करीब से देखा और पद छोड़ दिया।
  • उपनाम / जनमानस में पहचान:
    • “बावजी” (भीलों द्वारा दिया गया स्नेहपूर्ण नाम)।
    • “आदिवासियों का मसीहा”।
  • प्रभाव: महात्मा गांधी और बिजोलिया किसान आंदोलन के विजय सिंह पथिक से प्रभावित।

2. आंदोलन की शुरुआत व कारण

  • प्रारंभ वर्ष: 1921 ई. (वैशाख पूर्णिमा)।
  • प्रारंभ स्थल: मातृकुंडिया (राशमी परगना, चित्तौड़गढ़)। मातृकुंडिया को ‘राजस्थान का हरिद्वार’ भी कहा जाता है।
  • विस्तार क्षेत्र: मेवाड़ का भौमट क्षेत्र, सिरोही, ईडर, दांता, विजयनगर (गुजरात सीमावर्ती रियासतें)।
  • ‘एकी’ शब्द का अर्थ: जनजातियों और किसानों में “पूर्ण एकता और एकजुटता”।
  • प्रमुख कारण:
    1. जागीरदारों द्वारा ली जाने वाली लाग-बाग (अवैध उपकर) और बेगार (बिना मजदूरी के श्रम)।
    2. हाकमों व जागीरदारों द्वारा उत्पीड़न और भीलों के पारंपरिक वन अधिकारों की जब्ती।
    3. सूअरों द्वारा फसल नष्ट करने पर भी उन्हें मारने पर प्रतिबंध।
  • नारा: “ना हाकम, ना हुकम” (न कोई शासक मानेंगे, न उसका हुक्म)।

3. ‘मेवाड़ पुकार’ (21 सूत्री मांग पत्र)

मोतीलाल तेजावत ने मेवाड़ के भीलों और काश्तकारों की समस्याओं को लेकर एक मांग पत्र तैयार किया:
  • दस्तावेज़ का नाम: ‘मेवाड़ पुकार’।
  • कुल माँगें: 21 माँगें।
  • प्रस्तुति: यह मांग पत्र मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
  • परिणाम: महाराणा ने 21 में से 18 माँगें स्वीकार कर लीं, लेकिन 3 प्रमुख माँगें खारिज कर दीं:
    1. वन संपदा के पारंपरिक अधिकार।
    2. बेगार प्रथा का पूर्ण खात्मा।
    3. सूअरों को मारने की अनुमति।
  • इन तीन माँगों के अस्वीकार होने के बाद तेजावत ने आंदोलन को और तेज कर दिया तथा “कर-बंदी” (Non-tax payment) का आह्वान किया।

4. नीमड़ा / पाल-चितरिया हत्याकांड (7 मार्च 1922 ई.)

  • तिथि: 7 मार्च 1922 ई.
  • स्थान: नीमड़ा गाँव (विजयनगर ठिकाना, वर्तमान साबरकांठा/अरावली सीमा, गुजरात-राजस्थान बॉर्डर)। इसे पाल-चितरिया (Pal-Chitariya) नरसंहार भी कहा जाता है।
  • घटनाक्रम:
    • नीमड़ा गाँव में लगभग 2,000 भील-गरासिया सम्मेलन के लिए एकत्र हुए थे।
    • मेवाड़ भील कोर (MBC) के कमांडर मेजर सटन (Major Sutton) के आदेश पर निहत्थी सभा पर गोलियाँ चला दी गईं।
  • हताहत: लगभग 1,200 आदिवासी किसान शहीद हुए।
  • तेजावत की स्थिति: मोतीलाल तेजावत के पैर में गोली लगी, लेकिन उनके साथियों ने उन्हें सुरक्षित बचाकर सिरोही की पहाड़ियों में छिपा दिया।
  • ऐतिहासिक महत्व: यह हत्याकांड नरसंहार के पैमाने पर मानगढ़ और जलियांवाला बाग की तरह ही भीषण था।

5. सिरोही में आंदोलन व रोहिड़ा-सियावा हत्याकांड

  • 1922 में आंदोलन का केंद्र सिरोही रियासत बनी।
  • 12 अप्रैल 1922 (सियावा गाँव): सिरोही में गरासियों के मेले पर गोलीबारी हुई।
  • 6 मई 1922 (रोहिड़ा व बलोरिया): ब्रिटिश सेना और राज्य की सेना ने गाँवों को जला दिया, जिसमें कई गरासिया मारे गए।
  • गांधीजी की भूमिका:
    • महात्मा गांधी ने तेजावत के उग्र रूप को नियंत्रित करने के लिए अपने दूत मणिलाल कोठारी को सिरोही भेजा।
    • इसके बाद रामनारायण चौधरी ने भी सिरोही जाकर वस्तुस्थिति की जाँच की।

6. आत्मसमर्पण व अंतिम चरण

  • तेजावत लगभग 7 वर्षों तक भूमिगत रहे (ईडर और दांता के जंगलों में)।
  • आत्मसमर्पण: महात्मा गांधी के व्यक्तिगत आग्रह और पत्र पर मोतीलाल तेजावत ने 4 जून 1929 को ईडर स्टेट के खेड़ब्रह्मा में आत्मसमर्पण किया।
  • ईडर पुलिस ने उन्हें मेवाड़ राज्य को सौंप दिया। उदयपुर में बिना मुकदमा चलाए उन्हें केंद्रीय कारागार में रखा गया।
  • रिहाई: 23 अप्रैल 1936 को मणिलाल कोठारी के हस्तक्षेप और एक मुचलके (शर्त) पर रिहा किया गया कि वे मेवाड़ नहीं छोड़ेंगे और किसी आंदोलन में भाग नहीं लेंगे।
  • भारत छोड़ो आंदोलन (1942): तेजावत ने 1942 के आंदोलन में पुनः सक्रिय भूमिका निभाई, जिसके कारण उन्हें फिर से नजरबंद किया गया।
  • देहांत: 28 नवंबर 1969 ई.।

7. परीक्षा उपयोगी सूक्ष्म तथ्य (Quick Revision Pointers)

बिंदु परीक्षा तथ्य
प्रणेता मोतीलाल तेजावत (जन्म: 1886, कोलयारी गाँव, ओसवाल जैन)
उपनाम आदिवासियों का मसीहा, बावजी
आंदोलन शुरुआत वर्ष व स्थल 1921 ई., मातृकुंडिया (चित्तौड़गढ़)
मांग पत्र ‘मेवाड़ पुकार’ (कुल 21 सूत्रीय मांग पत्र)
स्वीकृत / अस्वीकृत माँगें 18 स्वीकृत, 3 अस्वीकृत (वन अधिकार, बेगार, सूअर)
नारा “ना हाकम, ना हुकम”
नीमड़ा (पाल-चितरिया) नरसंहार 7 मार्च 1922 (मेजर सटन के आदेश पर फायरिंग, ~1200 शहीद)
गांधीजी के प्रतिनिधि मणिलाल कोठारी
आत्मसमर्पण 4 जून 1929 (खेड़ब्रह्मा, ईडर राज्य)

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