मुख्य बिंदु: सलूंबर जिले (मेवाड़-भोमट अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य उपनाम: हाड़ी रानी की बलिदान भूमि, चुंडावतों का प्रमुख ठिकाना, जयसमंद की मनोरम धरा। पुनर्गठन व गठन: अगस्त 2023 में उदयपुर जिले के पुनर्गठन से सलूंबर, सराड़ा, सेमारी, लसाड़िया और झल्लारा तहसीलों […]
सलूंबर जिले (मेवाड़-भोमट अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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उपनाम: हाड़ी रानी की बलिदान भूमि, चुंडावतों का प्रमुख ठिकाना, जयसमंद की मनोरम धरा।
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पुनर्गठन व गठन: अगस्त 2023 में उदयपुर जिले के पुनर्गठन से सलूंबर, सराड़ा, सेमारी, लसाड़िया और झल्लारा तहसीलों को मिलाकर नए स्वतंत्र जिले के रूप में गठित किया गया।
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भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
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प्रमुख नदियाँ: गोमती नदी (जयसमंद झील में गिरने वाली), सोम नदी (दक्षिणी सीमा), जाखम, झामरी, केलवा।
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जयसमंद झील (ढेबर झील):
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1685–1691 ई. में महाराणा जयसिंह द्वारा गोमती नदी पर बांध बनाकर निर्मित राजस्थान की सबसे बड़ी मीठे पानी की कृत्रिम झील।
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झील में कुल 7 बड़े-छोटे टापू (Islands) हैं: सबसे बड़ा टापू ‘बाबा का भागड़ा’ (भाकड़ा) और सबसे छोटा टापू ‘प्यारी’ कहलाता है।
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इन टापुओं पर ‘भील’ व ‘मीणा’ समुदाय के लोग निवास करते हैं।
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झील से सिंचाई हेतु ‘श्यामपुरा नहर’ और ‘भाट नहर’ निकाली गई हैं।
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रूठी रानी का महल: जयसमंद झील की पहाड़ी पर स्थित हवामहल।
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लसाड़िया का पठार (Lasadiya Plateau): जयसमंद झील के पूर्व में स्थित अत्यधिक कटा-फटा व विच्छेदित (Dissected) पठार।
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जयसमंद वन्यजीव अभयारण्य: इसे ‘जलचरों की बस्ती’ (Home of Aquatic Life) कहा जाता है (बघेरा, सांभर, चीतल व जलीय पक्षियों का प्राकृतिक वास)।
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2. राजवंश एवं प्रमुख इतिहास
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चुंडावत राजवंश (मेवाड़ का प्रथम श्रेणी ठिकाना):
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मेवाड़ के महाराणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र रावत चूड़ा (जिन्हें ‘राजस्थान का भीष्म पितामह’ कहा जाता है) ने अपने छोटे भाई मोकल के लिए मेवाड़ की राजगद्दी का त्याग किया।
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मेवाड़ महाराणा द्वारा रावत चूड़ा को जागीर में सलूंबर ठिकाना प्रदान किया गया।
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सलूंबर के रावत के विशेषाधिकार (मेवाड़ रियासत में):
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मेवाड़ के महाराणा के राजतिलक करने का प्रथम अधिकार सलूंबर के रावत को था।
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मेवाड़ सेना के हरावल दस्ते (अग्रिम पंक्ति) का नेतृत्व सदैव सलूंबर के चुंडावत करते थे।
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महाराणा की अनुपस्थिति में राजधानी (उदयपुर) की सुरक्षा का भार सलूंबर के रावत पर होता था।
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मेवाड़ के सभी राज्य पत्रों/पट्टों पर महाराणा के साथ सलूंबर के रावत के हस्ताक्षर व ‘भाले का चिन्ह’ अंकित होता था।
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3. हाड़ी रानी ‘सहज कंवर’ का अमर बलिदान
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पृष्ठभूमि: 1680 ई. में मुग़ल बादशाह औरंगजेब के विरुद्ध महाराणा राजसिंह के आह्वान पर सलूंबर के रावत रतन सिंह चुंडावत को युद्ध में जाना था।
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सेनानी (निशानी) का बलिदान:
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रावत रतन सिंह का नवविवाह बूंदी के हाड़ा शासक की पुत्री रानी सहज कंवर (हाड़ी रानी) से हुआ था। युद्ध में जाते समय रावत का मन विचलित था, अतः उन्होंने रानी से अंतिम निशानी (सेनानी) मांगी।
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रानी ने सोचा कि उनके मोह के कारण पति कर्तव्य मार्ग से विमुख न हो जाएं, इसलिए उन्होंने अपना शीश काटकर थाल में सजाकर सेनानी के रूप में भेज दिया।
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कवि मेघराज मुकुल की कालजयी पंक्तियाँ (कविता: ‘सेनाणी’):“चूंडावत मांगी सैनाणी, सिर काट दे दियो क्षत्राणी॥”
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रावत रतन सिंह ने रानी का कटा शीश अपने गले में बांधकर युद्धभूमि में मुग़ल सेना के छक्के छुड़ा दिए और विजय प्राप्त कर वीरगति पाई।
4. प्रमुख दुर्ग, महल एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता / काल | प्रमुख विशेषता |
| सलूंबर दुर्ग (हाड़ी रानी महल) | रावत चुंडावत शासक | पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक व सामरिक गिरि दुर्ग; इसमें हाड़ी रानी का महल, शस्त्रागार व सभा भवन स्थित हैं। |
| रूठी रानी का महल (जयसमंद) | महाराणा जयसिंह (17वीं सदी) | जयसमंद झील के किनारे ऊंची पहाड़ी पर रानी कोमलावती हेतु निर्मित महल। |
| सराड़ा का किला (Sarada Fort) | मेवाड़ रियासत काल | सामरिक किला; रियासती काल में इसे ‘मेवाड़ का काला पानी’ कहा जाता था (स्वतंत्रता सेनानियों को यहाँ कठोर यातनाएं दी जाती थीं)। |
| ईदाणा माता मंदिर (बंबोरा) | प्राकृतिक शक्तिपीठ | चमत्कारी देवी धाम; यहाँ प्रतिमा वर्ष में 2-3 बार स्वतः अग्नि स्नान करती है (अग्नि में माता की चुनरी व श्रृंगार भस्म हो जाता है किंतु पाषाण प्रतिमा अक्षुण्ण रहती है)। |
| गोबरिया बावड़ी व छतरियाँ | सलूंबर जागीरदार | कलात्मक ऐतिहासिक जल संरचनाएं व चुंडावत सरदारों की समाधि छतरियाँ। |
5. संत, आंदोलन एवं लसाड़िया आंदोलन
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संत मावजी एवं ‘लसाड़िया आंदोलन’:
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निष्कलंकी संप्रदाय के प्रवर्तक संत मावजी द्वारा सलूंबर के लसाड़िया क्षेत्र में भील व मीणा आदिवासियों के नैतिक, सामाजिक व आध्यात्मिक उत्थान हेतु ‘लसाड़िया आंदोलन’ चलाया गया।
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गोविंद गुरु का प्रभाव: 20वीं सदी के प्रारंभ में मानगढ़ व सलूंबर-सराड़ा क्षेत्र में भील जागृति आंदोलन।
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भूरेशिया बाबा / लोकदेवता: वागड़ व मेवाड़ सीमावर्ती जनजातियों के आराध्य।
6. स्वतंत्रता संग्राम, सराड़ा जेल एवं प्रजामंडल
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सराड़ा दुर्ग — ‘मेवाड़ का काला पानी’:
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मेवाड़ प्रजामंडल के प्रखर स्वतंत्रता सेनानी माणिक्यलाल वर्मा के सहयोगी भूरेलाल बया को स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सराड़ा दुर्ग में ही बंदी बनाकर कठोर कारावास दिया गया था।
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रावत केसरी सिंह चुंडावत (1857 की क्रांति):
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1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय सलूंबर के रावत केसरी सिंह ने अंग्रेजों का प्रखर विरोध किया और आउवा के ठाकुर खुशाल सिंह तथा तात्या टोपे को रसद व सैन्य सहायता प्रदान की थी।
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मेवाड़ प्रजामंडल व एकीकरण: सलूंबर क्षेत्र के देशभक्तों ने उत्तरदायी शासन की स्थापना में सक्रिय योगदान दिया; राजस्थान एकीकरण के समय यह क्षेत्र उदयपुर रियासत के साथ राजस्थान संघ में सम्मिलित हुआ।