मुख्य बिंदु: फलोदी जिले (मरुकांतार व सौर ऊर्जा अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य नामकरण: 15वीं सदी में फला (फलजी) राठौड़ के नाम पर इस कस्बे का नाम ‘फलोदी’ पड़ा (प्राचीन नाम: फलवर्द्धिका)। उपनाम: राजस्थान का सबसे शुष्क स्थल, सौर ऊर्जा का महा-हब […]
फलोदी जिले (मरुकांतार व सौर ऊर्जा अंचल) के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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नामकरण: 15वीं सदी में फला (फलजी) राठौड़ के नाम पर इस कस्बे का नाम ‘फलोदी’ पड़ा (प्राचीन नाम: फलवर्द्धिका)।
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उपनाम: राजस्थान का सबसे शुष्क स्थल, सौर ऊर्जा का महा-हब (Solar City), कुरंजा नगरी (खींचन), लोकदेवता पाबूजी एवं हड़बूजी की पावन भूमि।
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पुनर्गठन व गठन: अगस्त 2023 में जोधपुर जिले से पृथक कर फलोदी, लोहावट, बाप, आऊ, देचू, सेतरावा, घंटियाली और बापिणी को मिलाकर नए स्वतंत्र जिले के रूप में गठित किया गया।
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भौगोलिक स्थिति व जलवायु:
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राजस्थान का सबसे शुष्क स्थान: फलोदी नगर राजस्थान का सबसे शुष्क और अत्यधिक ग्रीष्मकालीन तापमान वाला क्षेत्र माना जाता है।
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बाप बोल्डर बेड (Bap Boulder Clay Bed): बाप क्षेत्र में कार्बोनिफेरस (Permo-Carboniferous) युग के हिमानी (Glacial) अपरदन से बने विशाल गोल चिकने पत्थर/शिलाखंड पाए जाते हैं, जो भू-वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ हैं।
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खारे पानी के रन (Rann) व झीलें:
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बाप रन (Bap Rann): प्राकृतिक खारा दलदली क्षेत्र।
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फलोदी झील: नमक उत्पादन का प्रमुख खारा स्रोत।
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सौर ऊर्जा का वैश्विक केंद्र:
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भड़ला सोलर पार्क (Bhadla Solar Park, बाप तहसील):
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कुल क्षमता: 2,245 मेगावाट (MW) से अधिक।
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विश्व का सबसे बड़ा एकल सौर ऊर्जा पार्क (World’s Largest Solar Park); लगभग 14,000 एकड़ में विस्तृत।
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नोख सोलर पार्क: फलोदी-जैसलमेर सीमा पर विकसित दूसरा प्रमुख सौर संयंत्र।
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2. राजवंश एवं प्रमुख इतिहास
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राठौड़ राजवंश का प्रभाव:
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मारवाड़ के राव जोधा के पुत्र राव सूजा और राव नरा के समय फलोदी का सामरिक विकास हुआ।
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1459 ई. में राव सूजा ने फलोदी दुर्ग की नींव रखी।
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बीकानेर-जोधपुर सीमांत संघर्ष: 16वीं-17वीं सदी में फलोदी दुर्ग जोधपुर और बीकानेर रियासतों के मध्य सामरिक आधिपत्य का प्रमुख केंद्र रहा।
3. प्रमुख दुर्ग, हवेलियाँ एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता / काल | प्रमुख विशेषता |
| फलोदी दुर्ग (Phalodi Fort) | राव सूजा राठौड़ (1459 ई.) | पीले व लाल पत्थरों से निर्मित धान्वन/मैदानी दुर्ग; सामरिक सुरक्षा और रसद केंद्र रहा। |
| लाल हवेली (हवेलियों का नगर) | 19वीं सदी के व्यापारी | लाल बलुआ पत्थर की बारीक जालियों, झरोखों और सुंदर नक्काशीदार कंगूरों हेतु प्रसिद्ध। |
| मोतीलाल अमरचंद कोचर की हवेली | कोचर सेठ | शेखावाटी की तर्ज पर मारवाड़ में भित्तिचित्रों वाली प्राचीन हवेली। |
| हड़बूजी की गाड़ी का मंदिर (बैंगटी) | महाराजा अजीत सिंह (1721 ई.) | लोकदेवता हड़बूजी की पूजा स्थली; यहाँ उनकी ‘बैलगाड़ी’ स्थापित है। |
| पाबूजी पैनोरमा (कोलू) | राज्य सरकार | लोकदेवता पाबूजी के जीवन, गौ-रक्षा व बलिदान को प्रदर्शित करता ऐतिहासिक पैनोरमा। |
4. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं तीर्थ
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लोकदेवता पाबूजी महाराज (कोलू मंड, फलोदी):
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जन्म: 1239 ई. में कोलू (फलोदी) में धांधल जी राठौड़ के घर; माता: कमलादे; घोड़ी: केसर कालमी।
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उपनाम: ऊंटों के देवता (राजस्थान में सर्वप्रथम सांडे/ऊंट लाने का श्रेय), प्लेग रक्षक देवता, लक्ष्मण के अवतार, हाड़-फाड़ के देवता, गौ-रक्षक।
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देवल चारणी की गायों की रक्षा: अपने विवाह के फेरों से उठकर देवल चारणी की गायों को बचाने हेतु जींदराव खींची (जायल) के विरुद्ध युद्ध किया और देचू (फलोदी) में वीरगति (1276 ई.) पाई।
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पाबूजी की फड़: राजस्थान की सबसे लोकप्रिय फड़ (नायक/भील भोपों द्वारा ‘रावणहत्था’ वाद्ययंत्र के साथ वाचन)।
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मेला: प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को कोलू मंड में विशाल लक्खी मेला भरता है।
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लोकदेवता हड़बूजी सांखला (बैंगटी धाम, फलोदी):
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रामदेव जी के मौसेरे भाई; शकुन शास्त्र के प्रकांड ज्ञाता; गुरु: बालीनाथ जी।
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राव जोधा को मंडोर विजय का आशीर्वाद व ‘कटार’ भेंट की थी; राव जोधा ने विजयोपरांत इन्हें ‘बैंगटी गाँव’ जागीर में दिया।
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हड़बूजी अपनी ‘छकड़ा गाड़ी’ से पंगु (अपंग) गायों के लिए घास लाते थे; अतः मंदिर में गाड़ी की पूजा होती है।
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लटियाल माता मंदिर (फलोदी):
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कल्ला (पुष्करणा) ब्राह्मण समाज की कुलदेवी; मंदिर परिसर में पवित्र खेजड़ी का वृक्ष होने के कारण इन्हें ‘खेजड़बेरी राय भवानी’ भी कहा जाता है।
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मेहा जी मांगलिया (बापिणी, फलोदी):
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पंचपीरों में शामिल लोकदेवता; घोड़ा: ‘किरड़ काबरा’; भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी) को बापिणी में मेला भरता है।
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5. खींचन गाँव — ‘कुरंजा पक्षियों की शरणस्थली’
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खींचन पक्षी चुग्गाघर (Kheechan Bird Sanctuary):
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फलोदी का खींचन गाँव विश्व भर में शीत ऋतु में आने वाले ‘कुरंजा’ (Demoiselle Crane) पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है।
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यह प्रवासी पक्षी मंगोलिया, कजाकिस्तान, यूरेशिया और चीन के ठंडे क्षेत्रों से हजारों किलोमीटर की उड़ान भरकर प्रतिवर्ष सितंबर-अक्टूबर में यहाँ आते हैं और मार्च तक रहते हैं।
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पक्षी मित्र व संरक्षक: स्वर्गीय रतनलाल मालू (जिन्हें ‘कुरंजा का मित्र’ कहा जाता था) द्वारा पक्षियों को दाना (चुग्गा) डालने की अनूठी जन-परंपरा प्रारंभ की गई।
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सांस्कृतिक संदर्भ: कुरंजा पक्षी राजस्थानी लोकगीतों में ‘विरह व संदेशवाहक’ (विप्रलंभ श्रृंगार) का अमर प्रतीक है (“कुरंजां ए म्हारो भंवर मिलाद्यो…”)।
6. कला, संस्कृति, हस्तशिल्प एवं प्रसिद्ध सट्टा बाजार
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फलोदी का सट्टा बाजार (Phalodi Satta Bazaar):
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चुनाव परिणामों, मौसम (मानसून) और राष्ट्रीय घटनाओं के सटीक आकलन व सट्टा सट्टेबाजी हेतु देश-विदेश में चर्चित अनौपचारिक बाजार।
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जूती शिल्प व कशीदाकारी: फलोदी की चमड़े की कलात्मक कसीदा युक्त मोजड़ियां (जूतियां)।
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नमक उद्योग (बाप व फलोदी): गैर-रिफाइनरी व औद्योगिक नमक का बड़ा उत्पादन केंद्र।
7. स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रमुख जननायक
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मारवाड़ लोक परिषद व जनजागरण: फलोदी मारवाड़ प्रजामंडल के अंतर्गत राजनीतिक व सामाजिक चेतना का प्रखर केंद्र रहा।
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अमर शहीद छगनराज चौपासनी वाला व लादूराम जोशी: इन्होंने इस क्षेत्र में अस्पृश्यता निवारण, खादी प्रचार और किसान अधिकारों हेतु जन आंदोलन चलाए।