मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी) के चाहमान (चौहान) राजवंश के इतिहास में अजयराज द्वितीय (शासनकाल: लगभग 1110–1135 ईस्वी) का स्थान एक नए युग के सूत्रपातकर्ता के रूप में दर्ज है। इन्होंने चौहानों की राजनीतिक धुरी को सांभर से स्थानांतरित कर अजमेर को केंद्र बनाया और चौहान साम्राज्य को एक शक्तिशाली सार्वभौम स्वरूप […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी) के चाहमान (चौहान) राजवंश के इतिहास में अजयराज द्वितीय (शासनकाल: लगभग 1110–1135 ईस्वी) का स्थान एक नए युग के सूत्रपातकर्ता के रूप में दर्ज है। इन्होंने चौहानों की राजनीतिक धुरी को सांभर से स्थानांतरित कर अजमेर को केंद्र बनाया और चौहान साम्राज्य को एक शक्तिशाली सार्वभौम स्वरूप दिया।
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समय काल: लगभग 1110–1135 ईस्वी (12वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) और पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के अनुसार, ये पृथ्वीराज प्रथम (‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’) के पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे।
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अजयराज द्वितीय के उपरांत इनके प्रतापी पुत्र अर्णोराज (आनाजी) गद्दी पर बैठे।
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अजमेर (अजयमेरु) नगर की स्थापना (1113 ईस्वी):
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इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा और दशरथ शर्मा के अनुसार, अजयराज द्वितीय ने 1113 ईस्वी में अपनी नई राजधानी के रूप में ‘अजयमेरु’ (वर्तमान अजमेर) नगर की स्थापना की।
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अजयमेरु दुर्ग (तारागढ़ / गढ़ बीठली):
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इन्होंने नगर की सुरक्षा हेतु बीठली पहाड़ी पर सामरिक दृष्टि से अजेय ‘अजयमेरु दुर्ग’ का निर्माण करवाया।
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इसे ‘गढ़ बीठली’ तथा कालांतर में मेवाड़ के पृथ्वीराज सिसोदिया (उड़ना राजकुमार) द्वारा अपनी पत्नी ताराबाई के नाम पर ‘तारागढ़ दुर्ग’ कहा गया।
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बिशप हेबर ने इस दुर्ग की सुदृढ़ सामरिक बनावट के कारण इसे “राजस्थान का जिब्राल्टर” की संज्ञा दी।
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मुद्रा प्रणाली — ‘अजयप्रिय द्रम्म’ सिक्के:
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अजयराज द्वितीय राजस्थान के पहले चौहान शासक थे जिन्होंने बड़े पैमाने पर अपने नाम के चाँदी और ताँबे के सिक्के चलाए।
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इन सिक्कों पर ‘श्री अजयदेव’ अथवा ‘अजयप्रिय द्रम्म’ अंकित था। कुछ सिक्कों पर एक ओर लक्ष्मी/विष्णु के चिह्न तथा दूसरी ओर राजा का नाम उत्कीर्ण था।
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रानी सोमलवती (सोमलदेवी / सोमलेखा) के सिक्के:
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अजयराज की महारानी सोमलवती (सोमलदेवी) का नाम भी इन सिक्कों पर अंकित करवाया गया।
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राजस्थान के इतिहास में यह अत्यंत दुर्लभ और महत्वपूर्ण घटना है, जहाँ किसी राजपूत रानी के नाम के सिक्के (चाँदी/ताँबा) स्वतंत्र रूप से जारी किए गए।
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सामरिक अभियान एवं चालुक्य-परमार संघर्ष:
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चालुक्य संघर्ष: गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासक जयसिंह सिद्धराज (1094–1142 ई.) के साथ सीमांत संघर्ष हुआ। यद्यपि दोनों में दीर्घकालिक प्रतिद्वंद्विता रही, किंतु अजयराज ने चौहान सीमाओं को अक्षुण्ण रखा।
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परमार सेनापति का वध: अजयराज ने मालवा के परमारों पर आक्रमण कर उनके सेनापति/सामंत गगडू (गद्दन / नरवर्मन का सेनानायक) को पराजित कर उसका वध किया।
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तुर्क आक्रांताओं का दमन: गजनी/लाहौर से आने वाले तुर्क हमलों को खदेड़कर पश्चिमी राजस्थान को सुरक्षित किया।
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जीवन का अंतिम चरण (संन्यास व पुष्कर वास):
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अपने जीवन के अंतिम वर्षों में अजयराज द्वितीय ने राजकार्य अपने योग्य पुत्र अर्णोराज (आनाजी) को सौंप दिया और स्वयं पुष्कर के वन में जाकर वानप्रस्थ/तपस्वी जीवन व्यतीत किया।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
अजयराज द्वितीय के निर्माण कार्यों, सिक्कों और अभियानों के प्रामाणिक संदर्भ निम्नलिखित स्रोतों में मिलते हैं:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | सर्वप्रमुख स्रोत। 1113 ई. में अजमेर नगर बसाने, अजयमेरु दुर्ग निर्माण, परमार सेनापति गगडू के वध और पुष्कर में संन्यास लेने का विशद वर्णन। |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) | संस्कृत (शिलालेख) | पृथ्वीराज प्रथम के बाद अजयराज और उनके पुत्र अर्णोराज की क्रमिक वंशावलीय पुष्टि। |
| प्रबंधकोश | राजशेखर सूरि | संस्कृत (प्रबंध साहित्य) | अजयराज द्वारा चलाए गए सिक्कों (अजयप्रिय द्रम्म) और अजमेर बसाने की ऐतिहासिक पुष्टि। |
| टॉड कृत ट्रैवल्स इन वेस्टर्न इंडिया | कर्नल जेम्स टॉड | अंग्रेजी (इतिहास) | अजयमेरु दुर्ग और अजमेर नगर के सामरिक भूगोल का ऐतिहासिक विवरण। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; अजयराज के 1113 ई. कालक्रम, रानी सोमलवती के सिक्कों और चालुक्य संबंधों का प्रामाणिक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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राजधानी का रणनीतिक स्थानांतरण: सांभर (जो खुला मैदानी क्षेत्र था) के स्थान पर पहाड़ियों से घिरे अरावली के मध्य स्थित अजमेर को राजधानी बनाकर चौहानों ने बाह्य आक्रांताओं से सुरक्षा का स्थायी दुर्ग निर्मित किया।
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प्रगतिशील मुद्रा अर्थव्यवस्था: ‘अजयप्रिय द्रम्म’ और रानी सोमलवती के सिक्कों ने चौहान राज्य को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और व्यापारिक दृष्टिकोण से समृद्ध बनाया।
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नारी सम्मान व राजकीय सहभागिता: सिक्कों पर रानी सोमलवती का नाम उत्कीर्ण होना तत्कालीन राजपूत समाज में रानियों की उच्च राजनीतिक व प्रशासनिक प्रतिष्ठा का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
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धार्मिक सहिष्णुता: परम शैव होते हुए भी अजयराज ने अजमेर में जैन धर्म के पार्श्वनाथ मंदिर के लिए स्वर्ण कलश भेंट किया तथा धार्मिक सद्भाव को बढ़ावा दिया।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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अजमेर (अजयमेरु) नगर की स्थापना: 1113 ईस्वी में अजयराज द्वितीय द्वारा।
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अजयमेरु दुर्ग (गढ़ बीठली / तारागढ़): निर्माता अजयराज द्वितीय (उपनाम: राजस्थान का जिब्राल्टर – बिशप हेबर)।
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सिक्के: ‘अजयप्रिय द्रम्म’ एवं ‘श्री अजयदेव’ (चाँदी व ताँबा)।
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सिक्कों पर नाम अंकित करवाने वाली रानी: रानी सोमलवती (सोमलदेवी)।
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मालवा के किस परमार सेनापति को पराजित किया: गगडू (गद्दन)।
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जीवन के अंतिम दिनों में कहाँ वास किया: पुष्कर तीर्थ (पुत्र अर्णोराज को सत्ता सौंपकर)।
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वंशावली क्रम: पृथ्वीराज प्रथम ➔ अजयराज द्वितीय ➔ अर्णोराज (आनाजी) ➔ विग्रहराज चतुर्थ।