मुख्य बिंदु: गणेश चतुर्थी (विनायक चतुर्थी / चतरा चौथ) 1. कब और कहाँ तिथि: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि। समय: अगस्त–सितंबर। प्रमुख क्षेत्र: राष्ट्रीय स्तर: महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 10 दिवसीय गणेशोत्सव (अनंत चतुर्दशी तक)। राजस्थान में विशेष: रणथंभौर (सवाई माधोपुर) का त्रिनेत्र गणेश मेला, मोती डूंगरी (जयपुर), बोहरा […]
गणेश चतुर्थी (विनायक चतुर्थी / चतरा चौथ)
1. कब और कहाँ
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तिथि: भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि।
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समय: अगस्त–सितंबर।
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प्रमुख क्षेत्र:
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राष्ट्रीय स्तर: महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 10 दिवसीय गणेशोत्सव (अनंत चतुर्दशी तक)।
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राजस्थान में विशेष: रणथंभौर (सवाई माधोपुर) का त्रिनेत्र गणेश मेला, मोती डूंगरी (जयपुर), बोहरा गणेश (उदयपुर), और गढ़ गणेश (जयपुर)।
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2. पौराणिक पृष्ठभूमि एवं लोककथाएँ
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गणेश जी का प्राकट्य: मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती ने अपने उबटन/मैल से बालक का निर्माण कर उसमें प्राण फूंके थे। भगवान शिव द्वारा बालक का शीश काटे जाने के बाद हाथी (गज) का शीश जोड़कर उन्हें पुनर्जीवित किया गया और सभी देवताओं में ‘प्रथम पूज्य’ घोषित किया गया।
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कलंक चौथ (चंद्र दर्शन निषेध):
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एक बार गणेश जी की आकृति और सवारी (मूषक) को देखकर चंद्र देव हंस पड़े और उनका उपहास उड़ाया।
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गणेश जी ने कुपित होकर चंद्रमा को शाप दिया कि जो कोई भी इस दिन चंद्रमा के दर्शन करेगा, उस पर झूठा कलंक या लांछन लगेगा। इसी कारण इसे लोकभाषा में ‘कलंक चौथ’ या ‘चोरी चौथ’ भी कहते हैं।
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भागवत कथा के अनुसार, द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने भी भूलवश इस दिन चंद्रमा देख लिया था, जिसके परिणामस्वरूप उन पर स्यमंतक मणि चुराने का झूठा आरोप लगा था।
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3. प्रमुख मेले एवं राजस्थान के प्रसिद्ध गणेश मंदिर
(क) त्रिनेत्र गणेश मेला (रणथंभौर दुर्ग, सवाई माधोपुर)
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स्थान: यूनेस्को विश्व धरोहर रणथंभौर दुर्ग के भीतर स्थित।
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मेला: भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को यहाँ राजस्थान का सबसे बड़ा गणेश मेला भरता है।
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इतिहास: 1299–1301 ईस्वी में जब दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने रणथंभौर पर घेरा डाला, तब राव हम्मीर देव चौहान के शस्त्रागार व रसद में भारी कमी आ गई। स्वप्न में गणेश जी के दर्शन के बाद दुर्ग की दीवार पर त्रिनेत्र गणेश का प्राकट्य माना गया और युद्ध संकट टल गया। हम्मीर देव ने यहाँ मंदिर का निर्माण कराया।
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विशेषताएँ:
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यह विश्व की एकमात्र ऐसी प्रतिमा है जहाँ गणेश जी की तीन आंखें (त्रिनेत्र) हैं।
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यहाँ गणेश जी अपने पूरे परिवार — पत्नियाँ (रिद्धि-सिद्धि) और पुत्र (शुभ-लाभ) के साथ विराजमान हैं।
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विवाह का प्रथम निमंत्रण (कुंकुम पत्रिका): देश-विदेश से श्रद्धालु अपने परिवार के विवाह, गृह प्रवेश या मांगलिक कार्य का पहला निमंत्रण कार्ड डाक द्वारा “श्री त्रिनेत्र गणेश जी, रणथंभौर” के पते पर भेजते हैं।
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(ख) राजस्थान के अन्य प्रसिद्ध गणेश मंदिर (Exam Special):
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मोती डूंगरी गणेश मंदिर (जयपुर): यहाँ मावली शैली की प्रतिमा है, जिसका निर्माण राजा माधोसिंह प्रथम के काल में हुआ था।
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गढ़ गणेश (जयपुर): नाहरगढ़ पहाड़ी के नीचे; यहाँ गणेश जी की बिना सूंड वाली (बाल रूप) प्रतिमा स्थापित है।
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बोहरा गणेश मंदिर (उदयपुर): व्यापार और आर्थिक संकट दूर करने की मान्यता।
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बाजना गणेश: सिरोही (झरने के पास ध्वनि के कारण ‘बाजना’ नाम)।
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नाचना गणेश: अलवर।
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खेड़ के गणेश: बालोतरा (पूर्व में बाड़मेर)।
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हेरंब गणपति (सिंहारूढ़ गणेश): बीकानेर (जूनागढ़ दुर्ग में 33 करोड़ देवी-देवताओं के मंदिर में; यहाँ गणेश जी चूहे पर नहीं, बल्कि शेर पर सवार हैं)।
4. प्रमुख परंपराएँ एवं राष्ट्रीय गणेशोत्सव
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मोदक और दूर्वा अर्पण: गणेश जी को 21 दुर्वा (दूब) और मोदक/लड्डू का भोग लगाया जाता है।
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तिलक का सार्वजनिक गणेशोत्सव (इतिहास): 1893 में स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक ने राष्ट्रीय चेतना, जन-जागृति और अंग्रेजों के विरुद्ध एकता स्थापित करने के लिए गणेश उत्सव को घर की चौखट से निकालकर सार्वजनिक उत्सव का रूप दिया।
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अनंत चतुर्दशी (विसर्जन): 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव का समापन भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी (अनंत चतुर्दशी) को गणेश विसर्जन के साथ होता है।
5. परीक्षा उपयोगी तथ्य (Exam Pointers)
| बिंदु | विवरण |
| सीधा पंचांग प्रश्न | गणेश चतुर्थी कब मनाई जाती है? — भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी। |
| त्रिनेत्र गणेश मंदिर कहाँ है? | रणथंभौर दुर्ग (सवाई माधोपुर)। |
| सिंह पर सवार गणेश (हेरंब गणपति) | बीकानेर (जूनागढ़ परिसर)। |
| बिना सूंड वाले गणेश जी (गढ़ गणेश) | जयपुर। |
| ‘कलंक चौथ’ या ‘चतरा चौथ’ | भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी (चंद्र दर्शन निषेध / स्यमंतक मणि प्रसंग)। |
| सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत | बाल गंगाधर तिलक (1893, महाराष्ट्र)। |
| डाक द्वारा निमंत्रण पत्रिका | रणथंभौर के त्रिनेत्र गणेश मंदिर में विवाह की पहली पत्रिका भेजने की अनूठी परंपरा। |