मुख्य बिंदु: नीमड़ा हत्याकांड (जिसे पाल-चितरिया हत्याकांड भी कहा जाता है) राजस्थान-गुजरात सीमा पर औपनिवेशिक सत्ता और सामंती दमन का एक अत्यंत रक्तरंजित अध्याय है। यह नरसंहार मोतीलाल तेजावत द्वारा संचालित ‘एकी आंदोलन’ (भौमट भील आंदोलन) के दौरान घटित हुआ था। 1. भौगोलिक स्थिति एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि सटीक तिथि: 7 मार्च 1922 ई. (फाल्गुन शुक्ल नवमी/दशमी, विक्रम […]
नीमड़ा हत्याकांड (जिसे पाल-चितरिया हत्याकांड भी कहा जाता है) राजस्थान-गुजरात सीमा पर औपनिवेशिक सत्ता और सामंती दमन का एक अत्यंत रक्तरंजित अध्याय है। यह नरसंहार मोतीलाल तेजावत द्वारा संचालित ‘एकी आंदोलन’ (भौमट भील आंदोलन) के दौरान घटित हुआ था।
1. भौगोलिक स्थिति एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
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सटीक तिथि: 7 मार्च 1922 ई. (फाल्गुन शुक्ल नवमी/दशमी, विक्रम संवत 1978; होली के त्योहार से ठीक पूर्व)।
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स्थान: नीमड़ा गाँव (पाल-चितरिया क्षेत्र), तत्कालीन विजयनगर राज्य (महीकांठा एजेंसी, गुजरात-राजस्थान सीमा; वर्तमान साबरकांठा/अरावली जिला)।
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आंदोलन से संबंध: एकी आंदोलन (शुरुआत: 1921, मातृकुंडिया से मोतीलाल तेजावत द्वारा)।
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प्रमुख प्रतिभागी समुदाय: भील और गरासिया आदिवासी किसान।
2. घटना की पृष्ठभूमि ও कारण
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‘मेवाड़ पुकार’ और कर-बंदी: मोतीलाल तेजावत के 21 सूत्रीय मांग पत्र में से महाराणा द्वारा 3 प्रमुख मांगें (जंगल के अधिकार, बेगार का खात्मा और सूअर मारने की अनुमति) अस्वीकार करने के बाद आदिवासियों ने “ना हाकम, ना हुकम” का नारा देकर कर-बंदी शुरू कर दी थी।
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आंदोलन का सीमावर्ती रियासतों में प्रसार: मेवाड़ के भौमट से निकलकर आंदोलन सिरोही, ईडर, दांता और विजयनगर रियासतों में दावानल की तरह फैल गया।
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जागीरदारों का षड्यंत्र: जागीरदारों और राजाओं ने ब्रिटिश पोलिटिकल एजेंट को झूठी सूचना दी कि तेजावत आदिवासियों की समानांतर सरकार चला रहे हैं और ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ फेंकने की योजना बना रहे हैं।
3. हत्याकांड का घटनाक्रम (7 मार्च 1922)
(क) नीमड़ा में किसान सभा:
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होली के पर्व से ठीक पहले 7 मार्च 1922 को नीमड़ा गाँव में लगभग 2,000 से अधिक आदिवासी (भील व गरासिया) एकत्र हुए थे।
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सभा का मुख्य उद्देश्य विजयनगर राज्य द्वारा अवैध लाग-बाग, लगान वसूली और बेगार के विरोध में सामूहिक रणनीति तय करना था।
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सभा को मोतीलाल तेजावत स्वयं संबोधित कर रहे थे।
(ख) ब्रिटिश सेना की घेराबंदी व दमन:
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कमांडिंग ऑफिसर: ब्रिटिश अधिकारी मेजर एच. जी. सटन (Major H. G. Sutton)।
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सैन्य बल: मेवाड़ भील कोर (MBC) की हथियारबंद टुकड़ी।
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मेजर सटन ने नीमड़ा गाँव की खुली घाटी को चारों ओर से घेर लिया और आदिवासियों को आत्मसमर्पण करने को कहा।
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आदिवासियों के इंकार करने पर बिना किसी पूर्व चेतावनी या तितर-बितर होने का समय दिए, शांतिपूर्ण निहत्थी सभा पर आधुनिक राइफलों और मशीनगनों से अंधाधुंध गोलियां बरसा दी गईं।
(ग) हताहत व बर्बरता:
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गोलियों की बौछार से संकरी घाटी में भगदड़ मच गई।
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इस गोलीकांड में लगभग 1,200 निहत्थे आदिवासी पुरुष, महिलाएँ और बच्चे शहीद हुए।
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ब्रिटिश सैनिकों ने सबूत मिटाने और भय पैदा करने के लिए मारे गए आदिवासियों के शवों को पास के कुओं में फेंक दिया और कई झोपड़ियों को आग लगा दी।
(घ) मोतीलाल तेजावत की स्थिति:
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गोलीबारी के दौरान एक गोली मोतीलाल तेजावत के दाहिने पैर में लगी, जिससे वे लहूलुहान होकर गिर पड़े।
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उनके विश्वासपात्र भील साथियों ने अदम्य साहस दिखाते हुए उन्हें कंधों और ऊँट पर लादकर सुरक्षित घेरे से बाहर निकाला और सिरोही की पहाड़ियों में छुपा दिया।
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इसके बाद तेजावत लगभग 7 वर्षों तक भूमिगत रहे (1929 में आत्मसमर्पण तक)।
4. ऐतिहासिक उपनाम एवं राष्ट्रीय महत्व
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गुजरात/राजस्थान का दूसरा जलियांवाला बाग:
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1919 के जलियांवाला बाग और 1913 के मानगढ़ नरसंहार की तरह ही यह घटना निहत्थी भीड़ पर बर्बर गोलीबारी का ज्वलंत उदाहरण थी।
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दशकों तक दबी रही दास्तान:
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ब्रिटिश सरकार ने इस नरसंहार की खबरों को पूरी तरह दबा दिया था। सरकारी अभिलेखों में हताहतों की संख्या को केवल 22 बताकर रफा-दफा करने का प्रयास किया गया।
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आजादी के बाद जब स्थानीय शोध और लोकगीतों की पड़ताल हुई, तब पाल-चितरिया/नीमड़ा की यह शहादत राष्ट्रीय पटल पर उजागर हुई।
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5. परीक्षा उपयोगी अति-महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Table)
| प्रमुख बिंदु | परीक्षा उपयोगी तथ्य |
| सटीक तिथि | 7 मार्च 1922 ई. |
| स्थान | नीमड़ा गाँव (पाल-चितरिया, विजयनगर राज्य) |
| संबंधित आंदोलन | एकी आंदोलन (भौमट भील आंदोलन) |
| आंदोलन के प्रणेता | मोतीलाल तेजावत (जन्म: कोलयारी गाँव, 1886) |
| गोलीबारी का आदेश देने वाला सैन्य अधिकारी | मेजर सटन (Major Sutton) |
| दमन करने वाली वाहिनी | मेवाड़ भील कोर (MBC) |
| शहीदों की अनुमानित संख्या | लगभग 1,200 आदिवासी |
| तेजावत को चोट | पैर में गोली लगी, साथियों द्वारा सिरोही की पहाड़ियों में बचाए गए |
| लोकप्रिय नारा | “ना हाकम, ना हुकम” |