मुख्य बिंदु: यह भारत का सबसे लंबा (44 वर्ष), पूर्णतः अहिंसक और प्रथम संगठित किसान आंदोलन था। यह आंदोलन राजस्थान के अन्य सभी किसान व प्रजामंडल आंदोलनों का प्रेरणास्रोत बना। 1. पृष्ठभूमि व ठिकाने का परिचय भौगोलिक स्थिति: बिजौलिया (वर्तमान भीलवाड़ा जिला), तत्कालीन मेवाड़ रियासत का प्रथम श्रेणी का ठिकाना (सोलह उमरावों में से एक) था। प्राचीन […]
यह भारत का सबसे लंबा (44 वर्ष), पूर्णतः अहिंसक और प्रथम संगठित किसान आंदोलन था। यह आंदोलन राजस्थान के अन्य सभी किसान व प्रजामंडल आंदोलनों का प्रेरणास्रोत बना।
1. पृष्ठभूमि व ठिकाने का परिचय
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भौगोलिक स्थिति: बिजौलिया (वर्तमान भीलवाड़ा जिला), तत्कालीन मेवाड़ रियासत का प्रथम श्रेणी का ठिकाना (सोलह उमरावों में से एक) था।
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प्राचीन नाम: विन्ध्यवल्ली / विजयावल्ली।
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ठिकाने का संस्थापक: अशोक परमार। खानवा के युद्ध (1527 ई.) में राणा सांगा की सहायता करने पर सांगा ने उन्हें ‘ऊपरमाल’ की जागीर दी थी, जिसका मुख्यालय बिजौलिया बना।
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प्रमुख कृषक जाति: धाकड़ (लगभग 60% आबादी)।
2. आंदोलन के प्रमुख कारण एवं शोषणकारी कर
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अत्यधिक लगान निर्धारण पद्धतियाँ:
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लता (Lata): कटी हुई फसल के ढेर का अनुमान लगाकर लगान तय करना।
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कुंता (Kunta): खड़ी फसल को देखकर उपज का अनुमान लगाना (जिसमें अक्सर जागीरदार के कारिंदे अधिक कर थोपते थे)।
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84 प्रकार की लाग-बाग (Cesses): किसानों से विभिन्न बहानों से 84 प्रकार के अतिरिक्त कर वसूले जाते थे।
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बेगार प्रथा: बिना मजदूरी दिए किसानों व दस्तकारों से काम करवाना।
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विशिष्ट विवादित कर:
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चौंरी कर (1903 ई.): राव कृष्ण सिंह (किशन सिंह) ने लागू किया। किसानों को अपनी पुत्री के विवाह पर ठिकाने को ₹5 (कुछ स्रोतों में ₹13) कर देना अनिवार्य किया गया।
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तलवार बंधाई कर (1906 ई.): नया जागीरदार बनने पर लगने वाला उत्तराधिकार शुल्क। राव पृथ्वी सिंह ने यह कर खुद न चुकाकर जनता पर थोप दिया।
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3. आंदोलन का त्रि-चरणीय कालक्रम (Three Phases)
प्रथम चरण (1897 – 1915 ई.) : स्थानीय एवं स्वतःस्फूर्त
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शुरुआत (1897 ई.): गिरधारीपुरा गाँव में गंगाराम धाकड़ के पिता के मृत्युभोज (मौसर) के अवसर पर किसान एकत्र हुए।
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प्रारंभिक नेतृत्व: साधु सीताराम दास, फतेहकरण चारण, और ब्रह्मदेव।
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महाराणा से गुहार: किसानों ने नानजी पटेल और ठाकरी पटेल को अपनी शिकायतें लेकर मेवाड़ के महाराणा फतेह सिंह के पास उदयपुर भेजा।
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हामिद हुसैन जांच आयोग: महाराणा ने राजस्व अधिकारी हामिद हुसैन को जांच के लिए बिजौलिया भेजा। हुसैन ने अपनी रिपोर्ट में किसानों की शिकायतों को सही ठहराया, लेकिन राव कृष्ण सिंह के प्रभाव के चलते कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई; उल्टे नानजी व ठाकरी पटेल को ठिकाने से निष्कासित कर दिया गया।
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चौंरी कर का विरोध (1903): किसानों ने 2 वर्षों तक अपनी बेटियों का विवाह नहीं किया और सामूहिक रूप से खेती बंद कर ग्वालियर की ओर कूच किया। विवश होकर राव कृष्ण सिंह ने चौंरी कर माफ किया और लगान में कुछ रियायतें दीं।
द्वितीय चरण (1916 – 1923 ई.) : संगठित एवं राष्ट्रीय स्वरूप (स्वर्ण काल)
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विजय सिंह पथिक का प्रवेश (1916 ई.): साधु सीताराम दास के आग्रह पर भूपसिंह (विजय सिंह पथिक) आंदोलन से जुड़े और इसका नेतृत्व संभाला।
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प्रमुख संस्थाएं व संगठन:
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विद्या प्रचारिणी सभा (1916): मूलतः हरिलाल पाठक द्वारा स्थापित, जिसके वार्षिक सम्मेलन में पथिक जी का संपर्क साधु सीताराम दास से हुआ।
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ऊपरमाल पंच बोर्ड (किसान पंच बोर्ड): 1917 ई. (हरियाली अमावस्या के दिन) बेरीसाल गाँव में स्थापना। इसका सरपंच (अध्यक्ष) मन्ना पटेल (मन्ना जी) को बनाया गया।
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ऊपरमाल सेवा समिति: प्रचार-प्रसार और स्वयंसेवकों के प्रबंधन हेतु गठित।
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‘ऊपरमाल का डंका’: हस्तलिखित समाचार-पत्र, जो किसानों में सूचना और चेतना का माध्यम बना।
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राष्ट्रीय स्तर पर प्रसार:
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कानपुर से प्रकाशित समाचार-पत्र ‘प्रताप’ (संपादक: गणेश शंकर विद्यार्थी) के माध्यम से पथिक जी ने बिजौलिया आंदोलन को पूरे भारत में चर्चित कर दिया। पथिक जी ने विद्यार्थी जी को कृतज्ञता स्वरूप चांदी की राखी भेजी थी।
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बाल गंगाधर तिलक ने अपने पत्र ‘मराठा’ में बिजौलिया के पक्ष में संपादकीय लिखा और महाराणा फतेह सिंह को पत्र भी लिखा।
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1919 के अमृतसर कांग्रेस अधिवेशन में पथिक जी ने बाल गंगाधर तिलक की सहायता से बिजौलिया का मुद्दा उठाया।
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महात्मा गांधी का समर्थन: गांधी जी ने पथिक जी को मुंबई बुलाया और आंदोलन की स्थिति जानने के लिए अपने निजी सचिव महादेव भाई देसाई को बिजौलिया भेजा। गांधी जी ने पथिक जी को ‘राष्ट्रीय पथिक’ की उपाधि दी।
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जांच आयोग:
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प्रथम आयोग (1919): मांडलगढ़ हाकिम बिंदुलाल भट्टाचार्य की अध्यक्षता में ‘बिंदुलाल भट्टाचार्य आयोग’ गठित हुआ (सदस्य: अमरसिंह राणावत, अफजल अली)। इसने भी किसानों को राहत देने की सिफारिश की, लेकिन अमल नहीं हुआ।
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द्वितीय आयोग (1920): राजसिंह बेदला आयोग।
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ऐतिहासिक समझौता (11 फरवरी 1922 ई.):
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ए.जी.जी. (Agent to the Governor-General) रॉबर्ट हॉलैंड, मेवाड़ के पॉलिटिकल एजेंट विल्किंसन और ठिकाने के अधिकारियों की मौजूदगी में किसानों से वार्ता हुई।
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नतीजा: कुल 84 में से 35 लाग-बागें समाप्त करने पर सहमति बनी। किंतु जागीरदार के अड़ियल रवैये के कारण यह समझौता स्थायी रूप से लागू नहीं हो सका।
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तृतीय चरण (1923 – 1941 ई.) : अंतिम दौर व समापन
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नेतृत्व परिवर्तन: 1923 में बेगूं आंदोलन के सिलसिले में विजय सिंह पथिक को गिरफ्तार कर लिया गया (1927 में रिहाई)। मतभेदों के बाद 1927 में पथिक जी आंदोलन से अलग हो गए।
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नए नेता: आंदोलन की बागडोर जमनालाल बजाज और हरिभाऊ उपाध्याय ने संभाली। जमीनी स्तर पर माणिक्य लाल वर्मा और रामनारायण चौधरी सक्रिय रहे।
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महिलाओं की भूमिका:
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अंजना देवी चौधरी, नारायणी देवी वर्मा और रमा देवी ने जेल यातनाएं सहीं और किसान महिलाओं को संगठित किया।
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आंदोलन का अंत (1941 ई.):
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मेवाड़ के तत्कालीन प्रधानमंत्री (दीवान) सर टी. विजयराघवाचार्य और राजस्व मंत्री डॉ. मोहन सिंह मेहता ने बिजौलिया आकर माणिक्य लाल वर्मा व अन्य किसान नेताओं से बात की।
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किसानों की जब्त की गई पुश्तैनी जमीनें वापस लौटाई गईं, लगान घटाया गया और 1941 में 44 वर्षों बाद यह आंदोलन सफलतापूर्वक समाप्त हुआ।
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4. आंदोलन से जुड़े प्रमुख गीत व साहित्य
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‘पंछीड़ा’ गीत: माणिक्य लाल वर्मा द्वारा रचित ओजस्वी गीत, जो आंदोलनकारियों में जोश भरता था।
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प्रताप समाचार पत्र: कानपुर से प्रकाशित (संपादक: गणेश शंकर विद्यार्थी)।
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अभ्युदय, मराठा, भारत मित्र: इन राष्ट्रीय समाचार पत्रों ने भी आंदोलन का समर्थन किया।
5. परीक्षा उपयोगी अति-महत्वपूर्ण तथ्य (Quick Revision Table)
| बिंदु | परीक्षा तथ्य |
| अवधि | 1897 से 1941 ई. (कुल 44 वर्ष, भारत का सबसे लंबा अहिंसक आंदोलन) |
| ठिकाना / रियासत | बिजौलिया (भीलवाड़ा), मेवाड़ रियासत (संस्थापक: अशोक परमार) |
| प्रमुख कृषक जाति | धाकड़ |
| शुरुआती नेतृत्व (1897) | साधु सीताराम दास, नानजी पटेल, ठाकरी पटेल (गिरधारीपुरा गाँव) |
| प्रमुख कर | चौंरी कर (1903, राव कृष्ण सिंह), तलवार बंधाई कर (1906, राव पृथ्वी सिंह) |
| ऊपरमाल पंच बोर्ड | 1917 ई. (हरियाली अमावस्या), संस्थापक: विजय सिंह पथिक, सरपंच: मन्ना पटेल |
| हस्तलिखित पत्रिका | ‘ऊपरमाल का डंका’ |
| राष्ट्रीय प्रचारक पत्र | ‘प्रताप’ (कानपुर, गणेश शंकर विद्यार्थी) |
| रॉबर्ट हॉलैंड समझौता | फरवरी 1922 ई. (35 लागें माफ करने की घोषणा) |
| समापन (1941 ई.) | मेवाड़ दीवान सर टी. विजयराघवाचार्य और राजस्व मंत्री डॉ. मोहन सिंह मेहता के प्रयासों से |
| प्रमुख महिला सत्याग्रही | रमा देवी, नारायणी देवी वर्मा, अंजना देवी चौधरी |