प्रामाणिक अध्ययन नोट्स (Reference Archive)

गोविन्दराज चतुर्थ

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सत्यापित: 01 September 2026
मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के अंतिम चरण और रणथंभौर (रणस्तंभपुर) के चौहान राजवंश के आरंभिक इतिहास में गोविन्दराज चतुर्थ (इन्हें संक्षेप में ‘गोविन्दराज’ या ‘गोला/गुवा’ भी कहा गया है) का स्थान एक नए राजनीतिक अध्याय के संस्थापक के रूप में दर्ज है। समय काल: लगभग 1192–1194 […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के अंतिम चरण और रणथंभौर (रणस्तंभपुर) के चौहान राजवंश के आरंभिक इतिहास में गोविन्दराज चतुर्थ (इन्हें संक्षेप में ‘गोविन्दराज’ या ‘गोला/गुवा’ भी कहा गया है) का स्थान एक नए राजनीतिक अध्याय के संस्थापक के रूप में दर्ज है।
  • समय काल: लगभग 1192–1194 ईस्वी (अजमेर का सामंती शासन) तथा 1194 ईस्वी से (रणथंभौर शाखा की स्थापना)।
  • वंशावलीगत स्थिति:
    • ये चक्रवर्ती सम्राट पृथ्वीराज तृतीय (राय पिथौरा) के अल्पवयस्क पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे।
    • इनके चाचा (पृथ्वीराज तृतीय के छोटे भाई) हरिराज थे।
    • गोविन्दराज चतुर्थ के उपरांत इनके पुत्र वल्हण (बल्हाण), पौत्र प्रह्लादन व वीरनारायण, और आगे चलकर जैत्रसिंह तथा प्रसिद्ध हठी हम्मीरदेव चौहान (1282–1301 ई.) रणथंभौर की गद्दी पर बैठे।
  • तराइन के द्वितीय युद्ध (1192 ई.) के बाद अजमेर का जागीरदार शासन:
    • तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज तृतीय की पराजय व मृत्यु के पश्चात, विजेता शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी ने अल्पवयस्क गोविन्दराज चतुर्थ को अजमेर का करद (जागीरदार / Vassal) राजा नियुक्त किया।
    • गोरी की अधीनता स्वीकार करने और नियमित खिराज (कर) देने की शर्त पर इन्हें अजमेर की गद्दी सौंपी गई।
  • चाचा हरिराज का विद्रोह एवं गृहयुद्ध:
    • पृथ्वीराज तृतीय के भाई हरिराज और उनके समर्थक सेनापतियों (जैसे स्कंद) ने विदेशी तुर्कों की अधीनता स्वीकार करने के विरोध में विद्रोह कर दिया।
    • हरिराज ने अजमेर पर आक्रमण कर गोविन्दराज को गद्दी से बेदखल कर दिया।
    • गोविन्दराज चतुर्थ ने भागकर सामरिक दृष्टि से सुरक्षित रणथंभौर दुर्ग में शरण ली।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक का हस्तक्षेप एवं रणथंभौर की जागीर प्राप्ति:
    • दिल्ली में गोरी के सूबेदार कुतुबुद्दीन ऐबक ने सेना लेकर रणथंभौर का घेरा तुड़वाया और हरिराज की सेना को पीछे धकेला।
    • आभार स्वरूप गोविन्दराज ने ऐबक को तीन सुनहरे खरबूजे (Three Golden Melons) उपहार में भेंट किए थे।
    • 1193–1194 ई. में जब हरिराज ने पुनः अजमेर पर अधिकार कर लिया, तो ऐबक ने 1194 ई. में अजमेर पर सीधा हमला किया, जिससे घिरकर हरिराज ने अपने परिवार सहित चिता में आत्मदाह (जौहर) कर लिया। अजमेर पर तुर्कों का प्रत्यक्ष नियंत्रण हो गया।
  • रणथंभौर के चौहान वंश की स्थापना (1194 ईस्वी):
    • अजमेर का सीधा नियंत्रण तुर्कों के हाथ में चले जाने के बाद, कुतुबुद्दीन ऐबक ने गोविन्दराज चतुर्थ को रणथंभौर (रणस्तंभपुर) की स्वतंत्र जागीर/राज्य प्रदान किया।
    • इस प्रकार 1194 ईस्वी में गोविन्दराज चतुर्थ ने रणथंभौर के चौहान राजवंश की ऐतिहासिक नींव रखी।
विशेष नोट (परीक्षा भ्रम निवारण — चौहान वंश के चार गोविन्दराज):
  • गोविन्दराज प्रथम (गूवक प्रथम): 9वीं सदी (हर्षनाथ मंदिर निर्माण प्रारंभ, नागभट्ट द्वितीय द्वारा ‘वीर’ उपाधि)।
  • गोविन्दराज द्वितीय (गूवक द्वितीय): 9वीं सदी (बहन कलावती का विवाह मिहिर भोज से कराया)।
  • गोविन्दराज तृतीय: 11वीं सदी (‘वेरीघरट’ उपाधि, महमूद गजनवी के सोमनाथ अभियान के समकालीन)।
  • गोविन्दराज चतुर्थ: 12वीं सदी के अंत (1194 ई. — पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र, रणथंभौर चौहान शाखा के संस्थापक)।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
गोविन्दराज चतुर्थ के काल और रणथंभौर शाखा के निकास के प्रामाणिक संदर्भ:
स्रोत / ग्रंथ रचनाकार / रचयिता भाषा / विधा मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण
ताजुल मासिर हसन निजामी फारसी (समकालीन इतिहास) सर्वप्रमुख समकालीन स्रोत। तराइन के बाद गोविन्दराज को अजमेर का शासक बनाने, हरिराज के विद्रोह और रणथंभौर शरण लेने का प्रामाणिक विवरण।
तबकात-ए-नासिरी मिनहाज-उस-सिराज फारसी (इतिहास) तराइन के बाद चौहान उत्तराधिकार, ऐबक के सैन्य हस्तक्षेप और रणथंभौर के स्थानांतरण का उल्लेख।
हम्मीर महाकाव्य नयनचंद्र सूरि संस्कृत (महाकाव्य) पृथ्वीराज तृतीय के बाद रणथंभौर में चौहान वंश की स्थापना और गोविन्दराज से लेकर हम्मीरदेव तक की वंशावली।
तारीख-ए-फरिश्ता मुहम्मद कासिम फरिश्ता फारसी (इतिहास) गोविन्दराज का उल्लेख ‘गोला’ / ‘गुवा’ के नाम से किया गया है।
अर्ली चौहान डायनेस्टीज डॉ. दशरथ शर्मा शोध ग्रंथ (इतिहास) राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; गोविन्दराज चतुर्थ के 1192–1194 ई. घटनाक्रम और रणथंभौर शाखा की स्थापना का विश्लेषण।
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
  • चौहान शक्ति का केंद्र परिवर्तन: अजमेर के पतन के बाद सपादलक्ष की सदियों पुरानी राजनीति का केंद्र विंध्य और अरावली की घनी पहाड़ियों में स्थित रणथंभौर (सवाई माधोपुर) स्थानांतरित हो गया, जहाँ से चौहानों ने आगामी 100 से अधिक वर्षों तक दिल्ली सल्तनत को कड़ी टक्कर दी।
  • सामरिक भूगोल का चयन: रणथंभौर का दुर्ग वनों और दुर्गम पहाड़ियों से घिरा (एरण एवं गिरि दुर्ग) होने के कारण तुर्कों के विरुद्ध एक अत्यंत सुरक्षित रक्षा केंद्र साबित हुआ।
  • स्वायत्तता और निरंतरता: गोविन्दराज ने यद्यपि प्रारंभ में संधि की, परंतु उन्होंने चौहान कुल की राजनीतिक निरंतरता को बनाए रखा, जो आगे चलकर वीरनारायण, जैत्रसिंह और हम्मीरदेव के समय पूर्णतः संप्रभु व शक्तिशाली राज्य बना।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
  • रणथंभौर के चौहान वंश के संस्थापक: गोविन्दराज चतुर्थ (1194 ईस्वी)।
  • पिता: सम्राट पृथ्वीराज तृतीय (राय पिथौरा)।
  • चाचा जिन्होंने अजमेर से निष्कासित किया: हरिराज।
  • कुतुबुद्दीन ऐबक को उपहार में क्या दिया: तीन सुनहरे खरबूजे।
  • उत्तराधिकारी / पुत्र: वल्हण (बल्हाण)।
  • वंशावली क्रम: पृथ्वीराज तृतीय ➔ गोविन्दराज चतुर्थ (रणथंभौर, 1194 ई.) ➔ वल्हण ➔ प्रह्लादन ➔ वीरनारायण ➔ वाग्भट ➔ जैत्रसिंह ➔ हम्मीरदेव चौहान (1301 ई.)।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

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