मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के 12वीं शताब्दी के अत्यंत प्रतापी एवं शक्तिशाली शासकों में अर्णोराज (लोकप्रिय नाम: ‘आनाजी’) का स्थान सर्वोपरि है। इन्होंने अजमेर को एक सुदृढ़ साम्राज्यिक राजधानी के रूप में स्थापित किया तथा उत्तर व पश्चिम भारत की समकालीन शक्तियों के साथ ऐतिहासिक संघर्ष […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष एवं अजमेर के चाहमान (चौहान) राजवंश के 12वीं शताब्दी के अत्यंत प्रतापी एवं शक्तिशाली शासकों में अर्णोराज (लोकप्रिय नाम: ‘आनाजी’) का स्थान सर्वोपरि है। इन्होंने अजमेर को एक सुदृढ़ साम्राज्यिक राजधानी के रूप में स्थापित किया तथा उत्तर व पश्चिम भारत की समकालीन शक्तियों के साथ ऐतिहासिक संघर्ष लड़े।
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समय काल: लगभग 1135–1150 ईस्वी (12वीं शताब्दी का मध्य भाग)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) एवं पृथ्वीराज विजय के अनुसार, ये अजमेर के संस्थापक अजयराज द्वितीय और रानी सोमलवती (सोमलदेवी) के पुत्र व उत्तराधिकारी थे।
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इनके चार प्रमुख पुत्र हुए:
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जगद्देव: पितृहंता (इन्होंने अर्णोराज की हत्या कर सत्ता हथियाई)।
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विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव): चौहान साम्राज्य का स्वर्णकाल लाने वाले प्रतापी शासक।
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अपरगांगेय: अल्पकालिक शासक।
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सोमेश्वर: चालुक्य राजकुमारी कांचनदेवी से उत्पन्न पुत्र (पृथ्वीराज तृतीय ‘राय पिथौरा’ के पिता)।
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तुर्क आक्रमणकारियों का संहार (तुर्क विजय):
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अजमेर पर हुए मुस्लिम/तुर्क आक्रमण को अर्णोराज ने पूरी शक्ति से विफल किया और तुर्क सेना का भारी संहार किया।
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युद्धभूमि में इतनी बड़ी संख्या में आक्रांता मारे गए कि पूरी भूमि रक्त-रंजित हो गई थी, जिसे पवित्र करने के लिए इन्होंने आनासागर झील का निर्माण करवाया।
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आनासागर झील (अजमेर) का निर्माण (1137 ईस्वी):
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तुर्कों के रक्त से अपवित्र हुई भूमि को शुद्ध करने हेतु अर्णोराज ने चंद्रा (बांडी) नदी के जल को रोककर 1137 ई. में अजमेर में भव्य ‘आनासागर झील’ का निर्माण करवाया।
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कालांतर में इसी झील के किनारे मुगल सम्राट जहाँगीर ने ‘दौलत बाग’ (वर्तमान सुभाष उद्यान) तथा शाहजहाँ ने संगमरमर की ‘बारहदरी’ का निर्माण करवाया था।
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पुष्कर में वराह मंदिर का निर्माण:
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अर्णोराज परम शैव होते हुए भी धार्मिक समन्वयवादी थे। इन्होंने पवित्र पुष्कर में भगवान विष्णु के ‘वराह मंदिर’ का निर्माण करवाया (जिसकी मूर्ति को कालांतर में जहाँगीर ने जल में फेंकवा दिया था, जिसे बाद में पुनः स्थापित किया गया)।
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गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासकों से संघर्ष व वैवाहिक संबंध:
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जयसिंह सिद्धराज से संघर्ष व संधि: गुजरात के चालुक्य नरेश जयसिंह सिद्धराज ने अर्णोराज पर आक्रमण किया, परंतु बाद में दोनों के मध्य संधि हो गई। जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचनदेवी का विवाह अर्णोराज से किया (जिनके पुत्र सोमेश्वर हुए)।
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कुमारपाल चालुक्य से संघर्ष: जयसिंह के उत्तराधिकारी कुमारपाल के साथ अर्णोराज के दो भीषण युद्ध हुए:
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प्रथम युद्ध: अर्णोराज विजयी रहे या स्थिति बराबरी पर छूटी।
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द्वितीय युद्ध (आबू की तलहटी): कुमारपाल ने अर्णोराज को पराजित किया। तत्पश्चात अर्णोराज ने अपनी पुत्री जल्हणा का विवाह कुमारपाल के साथ कर संधि स्थापित की।
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मालवा व सिंध अभियान:
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अर्णोराज ने मालवा के परमार शासक नरवर्मन को पराजित किया तथा सिंध और सरस्वती नदी घाटी तक सफल सैन्य अभियान चलाए।
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अंतिम समय एवं मृत्यु (पितृहत्या):
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लगभग 1150 ई. में इनके ज्येष्ठ पुत्र जगद्देव ने सत्ता के लालच में इनकी हत्या कर दी। जगद्देव को चौहान वंश का प्रथम पितृहंता कहा जाता है।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
अर्णोराज के सैन्य अभियानों, स्थापत्य और समकालीन घटनाओं के प्रामाणिक साक्ष्य:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | सर्वप्रमुख स्रोत। तुर्कों के संहार, रक्त से लाल हुई भूमि को शुद्ध करने हेतु बांडी नदी रोककर आनासागर झील निर्माण और पुष्कर वराह मंदिर का विशद वर्णन। |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) | संस्कृत (शिलालेख) | अर्णोराज की विजयों, मालवा अभियान और चौहान वंशावली की क्रमिक पुष्टि। |
| द्व्याश्रय महाकाव्य एवं प्रबंध चिंतामणि | हेमचन्द्र सूरि / मेरुतुंग | संस्कृत (ऐतिहासिक काव्य / प्रबंध) | चालुक्य नरेश जयसिंह सिद्धराज (कांचनदेवी विवाह) और कुमारपाल के साथ अर्णोराज के दोनों युद्धों का विस्तृत विवरण। |
| रेवासा (सीकर) शिलालेख (1139 ई.) | समकालीन स्थानीय अभिलेख | संस्कृत (शिलालेख) | अर्णोराज (महाराजाधिराज) के शासनकाल, धार्मिक अनुदान और सामरिक स्थिति की पुष्टि। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; अर्णोराज की राजनीतिक उपलब्धियों, चालुक्य संघर्ष और दरबारी विद्वानों का प्रामाणिक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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विद्वानों को राजाश्रय (देवबोध एवं धर्मघोष):
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अर्णोराज विद्यानुरागी शासक थे। इनके दरबार में प्रकांड शैव विद्वान देवबोध तथा श्वेतांबर जैन आचार्य धर्मघोष सूरि को सर्वोच्च सम्मान प्राप्त था।
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इन्होंने जैन आचार्य धर्मघोष सूरि के उपदेशों से प्रभावित होकर एकादशी के दिन राज्य में जीव-हिंसा पर प्रतिबंध (अमारि घोषणा) का आदेश दिया था।
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सामरिक एवं स्थापत्य संतुलन: बांडी नदी के पानी को मोड़कर झील बनाना तत्कालीन जल-प्रबंधन एवं नगर-सौंदर्यीकरण का उत्कृष्ट नमूना था, जिसने अजमेर की सैन्य व नागरिक जल आवश्यकताओं को स्थायी रूप से हल किया।
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धार्मिक सहिष्णुता: शैव अनुयायी होते हुए भी पुष्कर में वैष्णव वराह मंदिर का निर्माण तथा जैन आचार्यों को भूमि/आश्रय देना इनके उदार दृष्टिकोण का परिचायक है।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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आनासागर झील (अजमेर) के निर्माता: अर्णोराज (1137 ई.) (नदी: बांडी/चंद्रा)।
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पुष्कर स्थित वराह मंदिर के निर्माता: अर्णोराज।
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अर्णोराज के दरबारी विद्वान: देवबोध (शैव) एवं धर्मघोष सूरि (जैन)।
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चालुक्य राजकुमारी जिनसे विवाह हुआ: कांचनदेवी (जयसिंह सिद्धराज की पुत्री, सोमेश्वर की माता)।
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अपनी पुत्री जल्हणा का विवाह किससे किया: कुमारपाल चालुक्य से।
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चौहान वंश का प्रथम पितृहंता: जगद्देव (जिसने अर्णोराज की हत्या की)।
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वंशावली क्रम: अजयराज द्वितीय ➔ अर्णोराज ➔ जगद्देव / विग्रहराज चतुर्थ ➔ सोमेश्वर ➔ पृथ्वीराज तृतीय।