मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के मध्य के शासकों में चामुण्डराज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मालवा के परमार राजा भोज के आक्रमण और वीर्यराम के वीरगति पाने के बाद, चामुण्डराज ने शाकंभरी राज्य की संप्रभुता को पुनर्स्थापित किया और साम्राज्य को संकट […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के मध्य के शासकों में चामुण्डराज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। मालवा के परमार राजा भोज के आक्रमण और वीर्यराम के वीरगति पाने के बाद, चामुण्डराज ने शाकंभरी राज्य की संप्रभुता को पुनर्स्थापित किया और साम्राज्य को संकट से उबारा।
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समय काल: लगभग 11वीं शताब्दी का मध्य (अनुमानित 1040–1065 ईस्वी)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) और महाकवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय के अनुसार, ये वाक्पतिराज द्वितीय के छोटे भाई तथा गोविन्दराज तृतीय (‘वेरीघरट’) के पुत्र थे।
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वीर्यराम के असामयिक निधन के उपरांत चामुण्डराज शाकंभरी की गद्दी पर बैठे।
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इनके उपरांत क्रमशः इनके दो प्रतापी पुत्र दुर्लभराज तृतीय (दुआला) और विग्रहराज तृतीय (बीसलदेव) शासक बने।
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सामरिक उपलब्धियाँ व गजनवी/मुस्लिम आक्रांताओं का दमन:
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पृथ्वीराज विजय के अनुसार, चामुण्डराज ने एक मुस्लिम/गजनवी सेनापति (सुल्तान के मातहत नायक) को पराजित कर उसका वध किया, जिसने सपादलक्ष की सीमाओं पर उपद्रव मचा रखा था।
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इन्होंने मालवा के परमारों के प्रभाव को समाप्त कर शाकंभरी राज्य की सीमाओं की रक्षा की और आंतरिक प्रशासन को सुदृढ़ किया।
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धार्मिक व स्थापत्य निर्माण (विष्णु मंदिर):
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चामुण्डराज ने नरपुरा (नरवर / सांभर क्षेत्र) में भगवान विष्णु के एक भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
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यद्यपि चौहान शासक परंपरागत रूप से शैव (हर्षनाथ के उपासक) थे, परंतु चामुण्डराज द्वारा विष्णु मंदिर बनवाना उनके धार्मिक समन्वय और वैष्णव मत के प्रति उदार दृष्टिकोण को प्रमाणित करता है।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
चामुण्डराज और 11वीं सदी के शाकंभरी चाहमान इतिहास के प्रामाणिक संदर्भ निम्नलिखित पुरालेखीय व साहित्यिक स्रोतों में प्राप्त होते हैं:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | सर्वप्रमुख स्रोत। चामुण्डराज द्वारा राज्य की पुनर्स्थापना, मुस्लिम सेनापति के वध और नरपुरा में विष्णु मंदिर निर्माण का विशद काव्यात्मक वर्णन। |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) | संस्कृत (शिलालेख) | वीर्यराम के बाद चामुण्डराज, दुर्लभराज तृतीय और विग्रहराज तृतीय की क्रमिक वंशावलीय पुष्टि। |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि | संस्कृत (महाकाव्य) | 11वीं सदी के चाहमान शासकों के शौर्य एवं सूर्यवंशी परंपरा का ऐतिहासिक निरूपण। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; चामुण्डराज के शासनकाल, साम्राज्य पुनरुद्धार और पुत्रों के कालक्रम का शोधपरक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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साम्राज्य का पुनरुद्धार: वीर्यराम की पराजय और मालवा के परमार राजा भोज के आक्रमण के पश्चात उत्पन्न अराजकता को समाप्त कर चामुण्डराज ने शाकंभरी की स्वतंत्र सत्ता को पुनः प्रतिष्ठित किया।
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धार्मिक सहिष्णुता (वैष्णव मत का पोषण): कुलदेवता हर्षनाथ (शैव) के साथ-साथ नरपुरा में भगवान विष्णु के मंदिर का निर्माण करवाकर इन्होंने धार्मिक समन्वय की मिसाल पेश की।
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उत्तरवर्ती प्रतापी पीढ़ी की पृष्ठभूमि: चामुण्डराज के दोनों पुत्र—दुर्लभराज तृतीय और विग्रहराज तृतीय—ने आगे चलकर गुजरात के चालुक्यों और मालवा की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाई।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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वीर्यराम के उपरांत शाकंभरी के शासक: चामुण्डराज (वाक्पतिराज द्वितीय के भाई)।
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नरपुरा में विष्णु मंदिर का निर्माण कराने वाले चौहान शासक: चामुण्डराज।
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पुत्र: दुर्लभराज तृतीय (दुआला) एवं विग्रहराज तृतीय।
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प्राथमिक साहित्यिक स्रोत: पृथ्वीराज विजय (जयानक)।
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वंशावली क्रम: वीर्यराम ➔ चामुण्डराज ➔ दुर्लभराज तृतीय ➔ विग्रहराज तृतीय ➔ पृथ्वीराज प्रथम।