मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 10वीं शताब्दी के आरंभिक शासकों में चन्दनराज (जिन्हें कुछ ग्रंथों में ‘चन्द्रराज’ भी कहा गया है) का स्थान अत्यधिक विशिष्ट एवं परीक्षा-दृष्टि से महत्वपूर्ण है। समय काल: लगभग 10वीं शताब्दी का आरंभ (अनुमानित 890–917 ईस्वी के आसपास)। वंशावलीगत स्थिति: हर्षनाथ […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 10वीं शताब्दी के आरंभिक शासकों में चन्दनराज (जिन्हें कुछ ग्रंथों में ‘चन्द्रराज’ भी कहा गया है) का स्थान अत्यधिक विशिष्ट एवं परीक्षा-दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
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समय काल: लगभग 10वीं शताब्दी का आरंभ (अनुमानित 890–917 ईस्वी के आसपास)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) तथा बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) के अनुसार, ये गूवक द्वितीय (गोविन्दराज द्वितीय) के पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे।
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चन्दनराज के उपरांत इनके पुत्र वाक्पतिराज प्रथम (जिन्होंने ‘महाराज’ की उपाधि धारण की) गद्दी पर बैठे।
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तोमर (तंवर) शासक रूद्रन (रूद्रपाल) का वध:
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महाकवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय के अनुसार, चन्दनराज ने दिल्ली/हरियाणा क्षेत्र के तोमर शासक रूद्रन (रूद्रपाल) को युद्ध में पराजित कर उसका वध किया था।
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रानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) एवं पुष्कर दीपदान प्रसंग (सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य):
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चन्दनराज की महारानी का नाम रुद्राणी था, जिन्हें यौगिक क्रियाओं में पारंगत होने के कारण ‘आत्मप्रभा’ भी कहा जाता था।
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रानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) भगवान शिव की अनन्य भक्त एवं योगिनी थीं।
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वे प्रतिदिन पवित्र पुष्कर सरोवर में भगवान महादेव के सम्मुख 1,000 दीपक प्रज्वलित कर कालसर्प/ग्रह-दोष निवारण एवं शिव आराधना करती थीं।
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विशेष नोट (परीक्षा भ्रम निवारण):
चन्द्रराज प्रथम: 8वीं सदी (विग्रहराज प्रथम के बाद)। चन्द्रराज द्वितीय: 9वीं सदी (गूवक प्रथम के पुत्र)। चन्दनराज (10वीं सदी): गूवक द्वितीय के पुत्र, जिनकी रानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) का संबंध पुष्कर के प्रसिद्ध दीपदान अनुष्ठान से है।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
चन्दनराज और उनकी महारानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) के ऐतिहासिक संदर्भ निम्नलिखित अभिलेखीय व साहित्यिक ग्रंथों में मिलते हैं:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | सर्वप्रमुख स्रोत। चन्दनराज द्वारा तोमर शासक रूद्रन के वध तथा महारानी रुद्राणी (आत्मप्रभा) द्वारा पुष्कर में 1,000 दीपक प्रज्वलित करने का प्रामाणिक काव्यात्मक वर्णन। |
| हर्षनाथ प्रशस्ति (973 ई.) | कवि धीर (विग्रहराज द्वितीय के काल की) | संस्कृत (शिलालेख) | गूवक द्वितीय के पुत्र के रूप में चन्दनराज और उनके पुत्र वाक्पतिराज प्रथम का वंशावलीय उल्लेख। |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) | संस्कृत (शिलालेख) | शाकंभरी चाहमान वंशावली में चन्दनराज की ऐतिहासिक स्थिति की पुष्टि। |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि | संस्कृत (महाकाव्य) | प्रारंभिक चौहान शासकों के शौर्य एवं धार्मिक आख्यानों का निरूपण। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; चन्दनराज के तोमर अभियान और रानी आत्मप्रभा के योग-साधना प्रसंग का ऐतिहासिक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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हठयोग एवं शैव साधना का चरमोत्कर्ष: महारानी रुद्राणी का पुष्कर में 1,000 दीपकों द्वारा नित्य पूजन मध्यकालीन राजस्थान में शैव मत, योग विद्या और नारी साधना के सर्वोच्च उदाहरणों में गिना जाता है।
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तोमरों के साथ सीमांत संघर्ष: चन्दनराज द्वारा तोमर नरेश रूद्रन के वध से यह स्पष्ट होता है कि इस काल में चौहानों का राजनीतिक प्रभाव सांभर से आगे बढ़कर दिल्ली/हरियाणा के सीमांत क्षेत्रों तक फैलने लगा था।
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पुष्कर तीर्थ का संरक्षण: इस काल में शाकंभरी के साथ-साथ पुष्कर क्षेत्र चौहानों की धार्मिक व आध्यात्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बन गया।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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तोमर शासक रूद्रन (रूद्रपाल) का वध करने वाले शासक: चन्दनराज।
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पुष्कर में प्रतिदिन 1,000 दीपक जलाने वाली योगिनी रानी: रुद्राणी (आत्मप्रभा) — चन्दनराज की पत्नी।
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पिता: गूवक द्वितीय | पुत्र: वाक्पतिराज प्रथम।
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प्राथमिक साहित्यिक स्रोत: पृथ्वीराज विजय (जयानक)।
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वंशावली क्रम: गूवक द्वितीय ➔ चन्दनराज ➔ वाक्पतिराज प्रथम ➔ सिंहराज।