मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश में महाराणा लाखा (पूरा नाम: महाराणा लक्ष्यसिंह, शासनकाल: 1382–1421 ई.) राणा क्षेत्रसिंह (खेता) के ज्येष्ठ पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे। इनका शासनकाल मेवाड़ की आर्थिक समृद्धि, स्थापत्य के विकास और कई ऐतिहासिक प्रतिज्ञाओं एवं घटनाओं के लिए प्रसिद्ध है। आर्थिक समृद्धि (जावर की खानें): इनके शासनकाल […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश में महाराणा लाखा (पूरा नाम: महाराणा लक्ष्यसिंह, शासनकाल: 1382–1421 ई.) राणा क्षेत्रसिंह (खेता) के ज्येष्ठ पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे। इनका शासनकाल मेवाड़ की आर्थिक समृद्धि, स्थापत्य के विकास और कई ऐतिहासिक प्रतिज्ञाओं एवं घटनाओं के लिए प्रसिद्ध है।
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आर्थिक समृद्धि (जावर की खानें): इनके शासनकाल में उदयपुर के निकट जावर में सीसा, जस्ता और चाँदी की प्रचुर खानें निकलीं। इससे मेवाड़ राज्य की आर्थिक स्थिति अभूतपूर्व रूप से सुदृढ़ हुई और व्यापारिक गतिविधियों को बल मिला।
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पिछोला झील का निर्माण: राणा लाखा के समय उदयपुर में ‘पिछोला झील’ का निर्माण ‘पिच्छू’ (छितर) नामक एक बंजारे द्वारा अपने बैल की स्मृति में करवाया गया था। इस झील के किनारे प्रसिद्ध ‘नटनी का चबूतरा’ बना हुआ है।
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हंसाबाई से विवाह व कुँवर चूड़ा की भीष्म प्रतिज्ञा:
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मारवाड़ (मंडोर) के राव चूड़ा की पुत्री तथा रणमल की बहन हंसाबाई का नारियल (विवाह प्रस्ताव) मूलतः लाखा के ज्येष्ठ पुत्र कुँवर चूड़ा के लिए आया था, परंतु एक परिहास के कारण यह विवाह वृद्ध अवस्था में राणा लाखा के साथ तय हुआ।
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शर्त यह थी कि हंसाबाई से उत्पन्न पुत्र ही मेवाड़ का अगला महाराणा बनेगा।
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कुँवर चूड़ा ने राज्य का अधिकार स्वेच्छा से त्याग दिया और आजीवन राज्य की रक्षा का संकल्प लिया। इस सर्वोच्च त्याग के कारण कुँवर चूड़ा को ‘मेवाड़ का भीष्म पितामह’ कहा जाता है।
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हंसाबाई से उत्पन्न पुत्र महाराणा मोकल आगे चलकर मेवाड़ के शासक बने।
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बूंदी का मिट्टी का नकली दुर्ग (कुंभा हाड़ा का बलिदान):
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बूंदी के तारागढ़ दुर्ग को जीतने की प्रतिज्ञा पूरी न होने पर राणा लाखा ने मिट्टी का नकली दुर्ग बनाकर उसे ध्वस्त करने का प्रयास किया।
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इस नकली दुर्ग की रक्षा के लिए बूंदी के वीर राजपूत कुंभा हाड़ा ने अपने प्राणों का बलिदान दिया।
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धार्मिक व सांस्कृतिक कार्य: गया, काशी और प्रयागराज की यात्रा करने वाले हिंदुओं के तीर्थ कर (जजिया/यात्री कर) को दिल्ली के सुल्तान से वार्ता कर समाप्त कराने का प्रयास किया।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
राणा लाखा के शासनकाल, उनके निर्माण कार्यों और कुँवर चूड़ा के त्याग का प्रामाणिक विवरण देने वाले प्रमुख साहित्यिक व पुरालेखीय स्रोत निम्न हैं:
| ग्रंथ / स्रोत | रचनाकार / रचयिता | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) | कवि कान्हा व्यास / महेश भट्ट | राणा लाखा द्वारा किए गए विभिन्न अभियानों, गया तीर्थ यात्रा और जावर खानों से राज्य की समृद्धि का उल्लेख। |
| एकलिंग महात्म्य | कान्हा व्यास | गुहिल-सिसोदिया वंशावली में लाखा के शासन, धार्मिक दानों और जावर समृद्धि का वर्णन। |
| वीर विनोद | कविराजा श्यामलदास | हंसाबाई विवाह, जावर की चांदी की खानें, पिछोला झील निर्माण तथा कुँवर चूड़ा के त्याग का सविस्तार ऐतिहासिक विवरण। |
| नैणसी री ख्यात | मुहणौत नैणसी | मारवाड़-मेवाड़ वैवाहिक संबंध (रणमल-हंसाबाई प्रसंग) और बूंदी के कुंभा हाड़ा के बलिदान की कथा। |
| दरबारी विद्वान | धनेश्वर भट्ट एवं झोटिंग भट्ट | राणा लाखा के आश्रित प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान एवं शास्त्रज्ञ। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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आर्थिक स्वावलंबन का युग: जावर से खनिज संपदा की प्राप्ति ने मेवाड़ को स्थायी सैन्य और स्थापत्य निर्माणों के लिए आवश्यक वित्तीय आधार प्रदान किया, जिसका भरपूर लाभ आगे चलकर महाराणा कुंभा को मिला।
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त्याग एवं स्वामीभक्ति का आदर्श: कुँवर चूड़ा के राज्याधिकार त्याग के बदले उन्हें मेवाड़ के प्रथम श्रेणी के ठिकाने ‘सलूँबर’ की जागीर दी गई। सलूँबर के रावत को मेवाड़ राज्य के प्रमुख अधिकार (पट्टा-परवाना पर हस्ताक्षर, महाराणा का राजतिलक करना, हरावल दस्ते का नेतृत्व आदि) प्रदान किए गए।
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चारणी व डिंगल साहित्य में स्वाभिमान: मिट्टी के नकली दुर्ग की रक्षा में कुंभा हाड़ा का बलिदान राजस्थानी चारण साहित्य में मातृभूमि के प्रति अनन्य निष्ठा और आन-बान-शान के स्थायी प्रतीक के रूप में वर्णित हुआ।
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सांस्कृतिक सहिष्णुता एवं विद्वत संरक्षण: धनेश्वर भट्ट और झोटिंग भट्ट जैसे आचार्यों को राजाश्रय देकर संस्कृत पांडित्य परंपरा को आगे बढ़ाया।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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जावर (उदयपुर) में चाँदी/सीसा/जस्ता की खानें: राणा लाखा के काल में निकलीं।
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पिछोला झील का निर्माण: एक बंजारे द्वारा राणा लाखा के काल में।
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मेवाड़ का भीष्म पितामह: कुँवर चूड़ा (राणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र)।
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सलूँबर ठिकाने के संस्थापक: कुँवर चूड़ा।
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दरबारी विद्वान: धनेश्वर भट्ट और झोटिंग भट्ट।
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उत्तराधिकारी: महाराणा मोकल (माता: हंसाबाई)।