मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश में राणा क्षेत्रसिंह (जिन्हें जनसाधारण व ख्यातों में ‘राणा खेता’ के नाम से जाना जाता है) राणा हम्मीर देव सिसोदिया के सुपुत्र एवं उत्तराधिकारी थे (शासनकाल: लगभग 1364–1382 ई.)। इनके शासनकाल ने मेवाड़ की साम्राज्यवादी सीमाओं के विस्तार और आगामी शताब्दियों के प्रमुख संघर्षों की […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश में राणा क्षेत्रसिंह (जिन्हें जनसाधारण व ख्यातों में ‘राणा खेता’ के नाम से जाना जाता है) राणा हम्मीर देव सिसोदिया के सुपुत्र एवं उत्तराधिकारी थे (शासनकाल: लगभग 1364–1382 ई.)। इनके शासनकाल ने मेवाड़ की साम्राज्यवादी सीमाओं के विस्तार और आगामी शताब्दियों के प्रमुख संघर्षों की नींव रखी।
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शासनकाल एवं उत्तराधिकार: 1364 ई. में अपने पिता राणा हम्मीर की मृत्यु के उपरांत मेवाड़ के शासक बने। इनके बाद इनके पुत्र राणा लाखा (लक्ष्यसिंह) मेवाड़ के शासक बने।
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मेवाड़-मालवा संघर्ष का सूत्रपात: क्षेत्रसिंह के काल की सबसे युगांतरकारी घटना मेवाड़ और मालवा सल्तनत के मध्य दीर्घकालिक संघर्ष की शुरुआत है। इन्होंने मालवा के सुल्तान दिलावर खाँ गोरी को युद्ध में पराजित किया।
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साम्राज्य विस्तार एवं अभियान:
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हाड़ौती (बूंदी) विजय: बूंदी के हाड़ा शासक लालसिंह हाड़ा को पराजित कर बूंदी को मेवाड़ के अधीन किया और उनसे कर (खिराज) वसूल किया।
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मांडलगढ़ व मांडलगढ़ दुर्ग पर अधिकार: इन्होंने मांडलगढ़ दुर्ग जीतकर मेवाड़ राज्य में मिलाया।
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छप्पन (कांठल) विजय: अरावली के दक्षिणी भाग (छप्पन के मैदान) पर अधिकार स्थापित किया।
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निधन: 1382 ई. में बूंदी के हाड़ा शासकों के साथ हुए संघर्ष के दौरान राणा क्षेत्रसिंह वीरगति को प्राप्त हुए।
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वंशानुगत संदर्भ (चाचा-मेरा): राणा क्षेत्रसिंह की एक खातिन (खाती जाति की) उपपत्नी/दासी से दो पुत्र उत्पन्न हुए थे—चाचा और मेरा, जिन्होंने आगे चलकर महाराणा मोकल की हत्या में प्रमुख भूमिका निभाई।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
राणा क्षेत्रसिंह (खेता) के सैन्य अभियानों, विजयों तथा तत्कालीन राजनीतिक स्थिति का विवरण देने वाले प्रमुख साहित्यिक व पुरालेखीय स्रोत निम्न हैं:
| ग्रंथ / स्रोत | रचनाकार / रचयिता | भाषा / प्रकार | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| कुंभलगढ़ प्रशस्ति (1460 ई.) | कवि कान्हा व्यास / महेश भट्ट | संस्कृत (शिलालेख) | राणा क्षेत्रसिंह द्वारा मालवा के सुल्तान दिलावर खाँ को पराजित करने, मांडलगढ़ विजय और हाड़ौती को अधीन करने का प्रामाणिक उल्लेख। |
| एकलिंग महात्म्य | कान्हा व्यास (महाराणा कुंभा के वेतनभोगी) | संस्कृत | गुहिल-सिसोदिया वंशावली में क्षेत्रसिंह के पराक्रम और सीमाओं के विस्तार का वर्णन। |
| वीर विनोद | महामहोपाध्याय कविराजा श्यामलदास | आधुनिक डिंगल मिश्रित हिंदी | राणा खेता द्वारा बूंदी के हाड़ाओं से संघर्ष, मालवा विजय और चाचा-मेरा की उत्पत्ति का ऐतिहासिक विवरण। |
| कीर्ति स्तम्भ प्रशस्ति (1460 ई.) | कवि अत्रि एवं महेश | संस्कृत (शिलालेख) | क्षेत्रसिंह द्वारा हाड़ौती और अरावली के दुर्गम क्षेत्रों को मेवाड़ साम्राज्य में मिलाने की पुष्टि। |
| नैणसी री ख्यात | मुहणौत नैणसी | मध्यकालीन डिंगल/राजस्थानी | राणा खेता और बूंदी के हाड़ा राजपूतों के मध्य संबंधों व युद्धों का विस्तृत विवरण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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मेवाड़ के साम्राज्यवादी विस्तार का आरंभ: हम्मीर ने जहाँ मेवाड़ का केवल उद्धार (रक्षा) किया, वहीं क्षेत्रसिंह ने मेवाड़ की सीमाओं को बाहर निकालकर हाड़ौती, मालवा सीमांत और वागड़-छप्पन तक विस्तृत किया।
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सुलगाता मेवाड़-मालवा बैर: मालवा के दिलावर खाँ गोरी की पराजय ने उस स्थायी कटुता को जन्म दिया जो आगे चलकर महाराणा कुंभा और महमूद खिलजी के बीच के प्रसिद्ध युद्धों में परिणत हुई।
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सामंती द्वंद्व एवं हाड़ा प्रतिरोध: बूंदी के हाड़ा चौहानों को मेवाड़ का करद राज्य बनाया गया, जिससे मेवाड़-बूंदी के बीच एक दीर्घकालिक सामंती संघर्ष की परंपरा आरंभ हुई।
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दरबारी साहित्य व प्रशस्ति शैली: इस काल से मेवाड़ के शासकों के पराक्रम को संस्कृत महाकाव्य परंपरा और चारणी डिंगल काव्य में ‘तुर्क-विजेता’ और ‘भूमि-विस्तारक’ के रूप में चित्रित करने की प्रवृत्ति बढ़ी।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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मेवाड़-मालवा संघर्ष की शुरुआत करने वाले शासक: राणा क्षेत्रसिंह (खेता)।
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मालवा का पराजित समकालीन शासक: दिलावर खाँ गोरी।
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मांडलगढ़ और बूंदी पर मेवाड़ का प्रभुत्व स्थापित करने वाले: राणा क्षेत्रसिंह।
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इतिहास प्रसिद्ध चाचा और मेरा किसके पुत्र थे: राणा क्षेत्रसिंह (दासी पुत्र)।
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राणा क्षेत्रसिंह के उत्तराधिकारी: राणा लाखा (लक्ष्यसिंह)।