मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य मेवाड़ के गुहिल राजवंश की ‘रावल शाखा’ के अंतिम शासक रावल रतनसिंह (शासनकाल: 1302–1303 ई.) रावल समरसिंह के पुत्र थे। इनका अल्पकालिक शासनकाल मध्यकालीन भारतीय इतिहास एवं राजस्थान के शौर्य-साहित्य का एक अत्यंत निर्णायक मोड़ है। चित्तौड़ आक्रमण की तिथि: 28 जनवरी, 1303 ई. को दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
मेवाड़ के गुहिल राजवंश की ‘रावल शाखा’ के अंतिम शासक रावल रतनसिंह (शासनकाल: 1302–1303 ई.) रावल समरसिंह के पुत्र थे। इनका अल्पकालिक शासनकाल मध्यकालीन भारतीय इतिहास एवं राजस्थान के शौर्य-साहित्य का एक अत्यंत निर्णायक मोड़ है।
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चित्तौड़ आक्रमण की तिथि: 28 जनवरी, 1303 ई. को दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ दुर्ग के घेरे की शुरुआत की। लगभग 8 माह के घेराबंदी के बाद 26 अगस्त, 1303 ई. को दुर्ग पर खिलजी का अधिकार हुआ।
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आक्रमण के मुख्य कारण:
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खिलजी की साम्राज्यवादी एवं सामरिक महत्वाकांक्षा (गुजरात व मालवा व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण)।
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चित्तौड़ दुर्ग की अभेद्य भौगोलिक स्थिति।
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मलिक मुहम्मद जायसी के अनुसार रानी पद्मिनी (पद्मावती) को प्राप्त करने की लालसा।
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चित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.):
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केसरिया: रावल रतनसिंह के नेतृत्व में तथा उनके प्रसिद्ध सेनापतियों गोरा और बादल के अद्भुत शौर्य के साथ राजपूत वीरों ने केसरिया किया।
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जौहर: रानी पद्मिनी के नेतृत्व में लगभग 1600 (कुछ स्रोतों में 16,000) वीरांगनाओं ने अग्निकुंड में ऐतिहासिक जौहर किया। यह चित्तौड़ दुर्ग का प्रथम तथा राजस्थान का दूसरा ऐतिहासिक साका (प्रथम साका: 1301 ई. रणथंभौर) माना जाता है।
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रावल शाखा का अंत: रावल रतनसिंह के वीरगति को प्राप्त होने के साथ ही मेवाड़ के गुहिल वंश की ‘रावल शाखा’ का अंत हो गया।
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प्रशासनिक परिवर्तन: खिलजी ने चित्तौड़ का नाम बदलकर अपने पुत्र खिज्र खाँ के नाम पर ‘खिज्राबाद’ रखा और दुर्ग का भार खिज्र खाँ को सौंपा। बाद में यह दुर्ग जालौर के कान्हड़देव के भाई मालदेव सोनगरा (मूछाला मालदेव) को सौंपा गया।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी तथा आरबीएसई के प्रमाणिक संदर्भों के आधार पर इस घटना से संबंधित प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ:
| रचना (Work) | रचनाकार (Author) | भाषा / काल | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| खज़ाइन-उल-फ़ुतुह (तारीख-ए-अलाई) | अमीर खुसरो | फारसी (समकालीन) | खुसरो इस युद्ध में खिलजी के साथ उपस्थित था। इसमें चित्तौड़ घेराबंदी और 30,000 हिंदुओं के कत्लेआम का आँखों देखा वर्णन है (पद्मिनी कथा का सीधा उल्लेख नहीं)। |
| पद्मावत | मलिक मुहम्मद जायसी | अवधी (1540 ई., शेरशाह सूरी काल) | सूफी प्रेमाख्यानक काव्य; रतनसिंह, पद्मिनी, राघव चेतन (विश्वासघाती ब्राह्मण), और खिलजी के प्रसंग का विस्तृत काव्यात्मक व रूपकीय वर्णन। |
| गोरा बादल री बात | हेमरतन सूरी | राजस्थानी (डिंगल) (1589 ई.) | गोरा-बादल के अप्रतिम शौर्य और पालकियों में बैठकर खिलजी की कैद से रतनसिंह को मुक्त कराने का वीर रस प्रधान आख्यान। |
| गोरा बादल री कवित्त / चौपाई | कवि लब्धोदय / हेमरतन | राजस्थानी | गोरा-बादल के बलिदान का चारणी व जैन काव्य परंपरा में चित्रण। |
| तारीख-ए-फ़रिश्ता | फ़रिश्ता (मुहम्मद कासिम) | फारसी (17वीं सदी) | 1303 के आक्रमण और पद्मिनी आख्यान का ऐतिहासिक संदर्भों में समर्थन। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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इतिहास और साहित्य का समन्वय: समकालीन फारसी वृत्तांत (अमीर खुसरो) सामरिक व राजनीतिक दृष्टि प्रस्तुत करते हैं, जबकि 16वीं शती का अवधी व राजस्थानी साहित्य (जायसी, हेमरतन) इसे शौर्य, प्रेम, त्याग और आध्यात्मिक रूपक के रूप में प्रस्तुत करता है।
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जायसी का आध्यात्मिक रूपक (पद्मावत):
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चित्तौड़ = तन (शरीर)
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राजा रतनसिंह = मन (आत्मा)
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सिंहल द्वीप = हृदय
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रानी पद्मिनी = बुद्धि (परम सत्ता / सात्विक बुद्धि)
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राघव चेतन = शैतान
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अलाउद्दीन खिलजी = माया
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चारण एवं लोक काव्य परंपरा: गोरा और बादल (काका-भतीजा) के शौर्य को राजस्थानी डिंगल काव्य में राष्ट्रीय प्रतिरोध और स्वामीभक्ति के आदर्श प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली।
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सांस्कृतिक प्रभाव: मेवाड़ में जौहर की परंपरा ने भारतीय वीरांगनाओं के स्वाभिमान एवं सतीत्व की रक्षा का सर्वोच्च मानक स्थापित किया।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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रावल शाखा के अंतिम शासक: रावल रतनसिंह।
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चित्तौड़ आक्रमण का प्रत्यक्षदर्शी इतिहासकार: अमीर खुसरो।
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1303 ई. के पश्चात मेवाड़ की पुनर्स्थापना: 1326 ई. में राणा हम्मीर (सिसोदिया शाखा) ने मालदेव के पुत्र जैसा (जयसिंह) को हराकर मेवाड़ में ‘सिसोदिया वंश’ की नींव रखी।
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राघव चेतन: रावल रतनसिंह का दरबारी पंडित, जिसे देश निकाला मिलने पर उसने खिलजी को पद्मिनी के सौंदर्य का वर्णन कर उकसाया।