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संत जसनाथ जी

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सत्यापित: 02 October 2026
मुख्य बिंदु: संत जसनाथ जी राजस्थान के महान संत, समाज सुधारक, चमत्कारी पुरुष और जसनाथी संप्रदाय के संस्थापक थे। उनका संपूर्ण जीवन लोक-कल्याण, ईश्वरीय भक्ति और प्राणी मात्र की सेवा को समर्पित था। संत जसनाथ जी के जीवन, जसनाथी संप्रदाय, उनके 36 नियमों और प्रसिद्ध अग्नि नृत्य का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है: 1. जीवन परिचय […]
संत जसनाथ जी राजस्थान के महान संत, समाज सुधारक, चमत्कारी पुरुष और जसनाथी संप्रदाय के संस्थापक थे। उनका संपूर्ण जीवन लोक-कल्याण, ईश्वरीय भक्ति और प्राणी मात्र की सेवा को समर्पित था।
संत जसनाथ जी के जीवन, जसनाथी संप्रदाय, उनके 36 नियमों और प्रसिद्ध अग्नि नृत्य का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है:

1. जीवन परिचय एवं जन्म

  • जन्म: विक्रम संवत 1539 (ईस्वी सन 1482) की माघ शुक्ल सप्तमी को रविवार के दिन हुआ था।
  • जन्म स्थान: कतरियासर (वर्तमान बीकानेर जिला, राजस्थान)।
  • माता-पिता: लोकमान्य मान्यताओं के अनुसार, वे बाल्यकाल में एक तालाब के किनारे झाड़ियों में लावारिस अवस्था में मिले थे। उन्हें हमीरजी ज्याणी (या रोहिला जाट) और उनकी पत्नी रूढ़ी जी ने पाला-पोसा था। इसलिए उनका शुरुआती जीवन एक साधारण कृषक परिवार के रूप में बीता।
  • बचपन का नाम: उनका प्रारंभिक नाम जसनाथ जी (या जस्सा जी) ही था। कम उम्र से ही उनके भीतर अलौकिक चमत्कार और संतई गुण दिखाई देने लगे थे।

2. जसनाथी संप्रदाय की स्थापना

  • संत जसनाथ जी ने मात्र 24 वर्ष की अल्प आयु में संवत 1563 (ईस्वी सन 1506) में कार्तिक शुक्ल सप्तमी के दिन कतरियासर में ही ‘जसनाथी संप्रदाय’ की स्थापना की थी।
  • उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज में फैली कुप्रथाओं, पाखंडों और अंधविश्वासों को दूर करने में लगाया।
  • उन्होंने सिकंदर लोदी सहित कई समकालीन शासकों और प्रतिष्ठित व्यक्तियों को प्रभावित किया था। सिकंदर लोदी ने भी उनका सम्मान किया था और कतरियासर के आसपास की भूमि उन्हें दी थी।

3. जसनाथी संप्रदाय के 36 नियम

विश्नोई संप्रदाय की तरह ही जसनाथी संप्रदाय के अनुयायियों के लिए भी नैतिक और आध्यात्मिक जीवन जीने के लिए 36 नियम निर्धारित किए गए हैं। इन नियमों का पालन करना हर जसनाथी सिद्ध के लिए अनिवार्य होता है:
  1. ईश्वर की एकनिष्ठा: केवल एक निराकार ईश्वर (निर्गुण ब्रह्म) की उपासना करना।
  2. सत्य बोलना: जीवन में हमेशा सच का आचरण करना और झूठ न बोलना।
  3. अहिंसा: किसी भी जीव-जंतु की अनावश्यक हिंसा न करना और उनकी रक्षा करना।
  4. जीव दया: पृथ्वी के सभी जीवों पर दया भाव रखना (विशेषकर मोर और काले हिरणों की रक्षा करना)।
  5. वृक्ष संरक्षण: हरे पेड़ों की कटाई न करना और पर्यावरण (विशेषकर जाल और खेजड़ी के वृक्ष) की रक्षा करना।
  6. शाकाहार: पूर्ण रूप से शाकाहारी रहना और मांसाहार का सेवन न करना।
  7. नशा निषेध: किसी भी प्रकार के मादक पदार्थों, मदिरा, तंबाकू या अफीम का सेवन न करना।
  8. चोरी निषेध: कभी भी चोरी न करना और पराई संपत्ति पर बुरी नजर न रखना।
  9. परस्त्री/परपुरुष गमन निषेध: चरित्र की पवित्रता बनाए रखना और व्यभिचार न करना।
  10. नित्य स्नान: प्रातःकाल उठकर स्नान करना और शरीर व वस्त्रों की शुद्धि रखना।
  11. संध्या वंदना: सुबह और शाम नियमित रूप से ईश्वर का स्मरण और प्रार्थना करना।
  12. दया और क्षमा: मन में हमेशा क्षमा भाव रखना और गरीबों की मदद करना।
  13. संत सेवा: साधु-संतों, मेहमानों और जरूरतमंदों की सेवा करना।
  14. गुरु निष्ठा: अपने गुरु और उनके वचनों में अटूट विश्वास रखना।
  15. सादा जीवन: आडंबरों से दूर रहकर सादा और उच्च विचार वाला जीवन जीना।
  16. अमावस्या का व्रत: हर महीने अमावस्या के दिन विशेष उपवास और आराधना करना।
  17. से लेकर 36 तक के शेष नियम: मुख्य रूप से आंतरिक शुद्धि, संयम, परोपकार, क्रोध का त्याग, अंहकार मुक्ति, नित्य दान, और समाज में अनुशासन बनाए रखने से संबंधित आचार-संहिताएं हैं।

4. प्रसिद्ध ‘अग्नि नृत्य’ (धधकते अंगारों पर नृत्य)

  • जसनाथी संप्रदाय की सबसे बड़ी और अनोखी सांस्कृतिक पहचान उनका ‘अग्नि नृत्य’ है।
  • यह नृत्य केवल कतरियासर और जसनाथी सिद्ध पुरुषों द्वारा ही किया जाता है।
  • कैसे किया जाता है: धधकते हुए अंगारों के ढेर (जिसे ‘मिरिया’ कहा जाता है) पर रात के समय जसनाथी सिद्ध पुरुष ‘फतेह-फतेह’ का उच्च स्वर में उद्घोष करते हुए नंगे पैरों से नृत्य करते हैं।
  • इस नृत्य के दौरान वे धधकते अंगारों को अपने हाथों में लेकर मुंह पर लगाते हैं और अंगारों से खेलते हैं, जिसे देखकर दर्शक दंग रह जाते हैं। इस नृत्य को देखने देश-विदेश से लोग कतरियासर आते हैं।

5. प्रमुख पीठ एवं मेले

  • प्रधान पीठ: संत जसनाथ जी की मुख्य पीठ कतरियासर (बीकानेर) में स्थित है। इसके अलावा लखासर, पुनरासर और बाकानेर में भी इनकी सिद्ध पीठें हैं।
  • प्रमुख मेले: कतरियासर में वर्ष में तीन बार बड़े मेलों का आयोजन होता है:
    1. आश्विन शुक्ल सप्तमी को।
    2. माघ शुक्ल सप्तमी को (यह इनकी मुख्य जयंती/उत्सव है)।
    3. चैत्र शुक्ल सप्तमी को।
संत जसनाथ जी ने संवत 1563 (ईस्वी सन 1506) में कतरियासर में ही जीवित समाधि ले ली थी। आज भी जसनाथी सिद्ध अपने गले में ऊन का काला धागा (जिसे ‘जन्ति’ या धागा कहते हैं) धारण करते हैं और उनके उपदेशों का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं।

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