मुख्य बिंदु: तिलवाड़ा (ऐतिहासिक संदर्भ): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार तिलवाड़ा केवल मध्य पाषाण काल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके ऊपरी स्तरों से ऐतिहासिक काल (लौह काल और उसके बाद के चरण) के भी महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलते हैं। इसी कारण इसे ऐतिहासिक और उत्तर-पाषाण […]
तिलवाड़ा (ऐतिहासिक संदर्भ): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण
मानक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार तिलवाड़ा केवल मध्य पाषाण काल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसके ऊपरी स्तरों से ऐतिहासिक काल (लौह काल और उसके बाद के चरण) के भी महत्वपूर्ण साक्ष्य मिलते हैं। इसी कारण इसे ऐतिहासिक और उत्तर-पाषाण संक्रमण कालीन सभ्यता के रूप में भी पढ़ा जाता है।
तिलवाड़ा के ऐतिहासिक और उत्तर-कालीन संदर्भ से जुड़ी छोटी-से-छोटी और सभी महत्वपूर्ण डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं:
1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक स्थिति
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जिला: बाड़मेर (वर्तमान प्रशासनिक सुधार के बाद यह बालोतरा जिले के अंतर्गत आता है)।
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नदी: यह ऐतिहासिक स्थल लूनी नदी के बाएं तट पर एक बड़े बालू के टीले (धोरे) पर स्थित है।
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उत्खनन वर्ष: यहाँ ऐतिहासिक व पुरातात्विक स्तरों की खोज व उत्खनन का कार्य वर्ष 1966-67 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. वी.एन. मिश्र (V.N. Misra), राजस्थान राज्य पुरातत्व विभाग तथा जर्मनी के हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय के सहयोग से किया गया था।
2. काल निर्धारण (Time Period)
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इतिहासकार और पुरातत्वविद् डॉ. वी.एन. मिश्र के अनुसार तिलवाड़ा की इस उत्तर-कालीन/ऐतिहासिक संस्कृति का काल मुख्य रूप से लगभग 500 ईसा पूर्व से 200 ईस्वी (यानी पूर्व-मध्यकाल एवं प्रारंभिक ऐतिहासिक काल) के बीच का माना जाता है।
3. तिलवाड़ा के ऐतिहासिक चरण की मुख्य विशेषताएँ (बिंदुवार विवरण)
A. तीन स्पष्ट सांस्कृतिक स्तर (Stratigraphical Phases)
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उत्खनन के दौरान तिलवाड़ा में सभ्यता के तीन स्पष्ट स्तर एक के ऊपर एक जमे हुए मिले हैं।
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शुरुआती स्तर मध्य पाषाण काल (माइक्रोलिथ्स) के हैं, जबकि इसके ऊपरी स्तर (तृतीय चरण) में ऐतिहासिक काल और लोहे के प्रयोग के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
B. लोहे और कांच की चूड़ियों के अवशेष (Iron & Glass Age Evidence)
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तिलवाड़ा की सबसे ऊपरी सतह और परतों से लोहे के टुकड़े, लोहे के उपकरण तथा कांच की चूड़ियों के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
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यह इस बात का प्रमाण है कि समय के साथ यह स्थल पाषाण युग से आगे बढ़कर लौह युगीन एवं प्रारंभिक ऐतिहासिक संस्कृति के संपर्क में आ गया था।
C. चाक पर बने उन्नत मृदभांड (Wheel-made Pottery)
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इस काल के लोग हाथ के बजाय कुम्हार के चाक पर बने हुए पक्के मृदभांडों (बर्तनों) का उपयोग करते थे।
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यहाँ से सलेटी और लाल रंग के बर्तन मिले हैं, जिनमें हांडियाँ, थाली, लोटे और कटोरे शामिल हैं। कई सलेटी बर्तनों के तले नीचे से जले हुए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि इनका उपयोग भोजन पकाने के लिए किया जाता था।
D. आवास व्यवस्था (वृत्ताकार झोपड़ियाँ)
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ऐतिहासिक और उत्तर पाषाण काल के लोग जमीन से कुछ नीचे या समतल चौरस पत्थरों के फर्श पर गोलाकार झोपड़ियाँ बनाकर रहते थे।
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इन झोपड़ियों की दीवारें मिट्टी की और छतें घास-फूस या तिनकों की होती थीं, जिनके प्रमाण यहाँ की बस्तियों के अवशेषों से मिलते हैं।
E. अंतिम संस्कार और अग्नि कुंड की परंपरा
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यहाँ से ऐसे अग्निकुंड मिले हैं जिनमें मानव अस्थि की भस्म (राख) और जली हुई हड्डियाँ प्राप्त हुई हैं।
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इससे यह अनुमान लगाया जाता है कि इस काल में शवों के अग्नि-संस्कार की प्रथा प्रचलित थी। इसके साथ ही कुछ स्थानों पर मृतकों के साथ दैनिक उपयोग के बर्तन या सामग्रियाँ दफनाने के भी संकेत मिले हैं।
F. अर्थव्यवस्था और जीविका
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यद्यपि यह मरुस्थलीय क्षेत्र था, लेकिन इस काल तक यहाँ के निवासी पशुपालन (गाय, बकरी, सूअर आदि पालना) और कृषि के प्रारंभिक रूपों से अच्छी तरह परिचित हो चुके थे। इसके साथ ही शिकार करना इनकी अर्थव्यवस्था का एक अन्य सहायक हिस्सा था।
आरपीएससी (RPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से तिलवाड़ा से जुड़े इन बिंदुओं—बालोतरा/बाड़मेर जिला, लूनी नदी, डॉ. वी.एन. मिश्र (1966-67), और इसकी ऊपरी सतह से मिलने वाले लौह उपकरण व चाक निर्मित मृदभांड—को प्रमुखता से पूछा जाता है।