मुख्य बिंदु: गिल्लूंड सभ्यता (राजसमंद): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण प्रामाणिक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार गिल्लूंड सभ्यता आहड़-बनास संस्कृति (Ahar-Banas Culture) का ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण, विकसित और समकालीन ताम्रपाषाण कालीन स्थल है। गिल्लूंड से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं: 1. सामान्य परिचय […]
गिल्लूंड सभ्यता (राजसमंद): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण
प्रामाणिक स्रोतों (आरबीएसई, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और आरपीएससी पाठ्यक्रम) के अनुसार गिल्लूंड सभ्यता आहड़-बनास संस्कृति (Ahar-Banas Culture) का ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण, विकसित और समकालीन ताम्रपाषाण कालीन स्थल है।
गिल्लूंड से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं:
1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक स्थिति
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जिला: राजसमंद (राजस्थान)।
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नदी: यह सभ्यता बनास नदी के तट पर (मेवाड़ के मैदान के मध्य भाग में) विकसित हुई थी।
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स्थानीय नाम: गिल्लूंड के पुरातात्विक टीले को स्थानीय भाषा में ‘मोडिया मगरी’ (Modiya Magari) कहा जाता है, जिसका अर्थ गंजा या टीलेनुमा स्थान होता है।
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विस्तार: यह आहड़-बनास कॉम्प्लेक्स के तहत खोजी गई 111 साइटों में से सबसे बड़ी साइट (Largest site) मानी जाती है। यहाँ मुख्य रूप से दो बड़े टीले हैं, जिन्हें पूर्वी टीला और पश्चिमी टीला कहा जाता है।
2. खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation)
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प्रथम चरण: वर्ष 1957-58 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद् बी.बी. लाल (ब्रजवासी लाल) के निर्देशन में यहाँ सबसे पहले आंशिक उत्खनन किया गया।
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द्वितीय चरण: इसके बाद वर्ष 1998 से 2003 के दौरान पुणे के डेक्कन कॉलेज के डॉ. वी.एस. शिंदे (V.S. Shinde) और अमेरिका की पेनसिल्वेनिया विश्वविद्यालय के प्रो. ग्रेगरी पोशेल (Gregory Possehl) के संयुक्त निर्देशन में यहाँ व्यापक स्तर पर आधुनिक वैज्ञानिक खुदई की गई।
3. काल निर्धारण (Time Period)
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रेडियो-कार्बन डेटिंग (C-14) और स्तर-विज्ञान (Stratigraphy) के आधार पर गिल्लूंड सभ्यता का मुख्य काल लगभग 1900 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व (ताम्रपाषाण काल) माना जाता है। हालांकि इसके शुरुआती चरण 3000 ईसा पूर्व तक भी जाते हैं।
4. गिल्लूंड सभ्यता की मुख्य विशेषताएँ (बिंदुवार संपूर्ण विवरण)
A. पक्की ईंटों के प्रयोग के साक्ष्य (विशेष अंतर)
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आहड़ सभ्यता में मुख्य रूप से पत्थरों और कच्ची मिट्टी का प्रयोग होता था, पक्की ईंटें बहुत कम थीं। इसके विपरीत, गिल्लूंड की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ प्रचुर मात्रा में पक्की ईंटों (Burnt Bricks) का उपयोग मिलना है। यहाँ ईंटों के भट्टे और निर्माण के उन्नत साक्ष्य मिले हैं।
B. विशाल संरचनाएँ और दीवारें (Massive Structures)
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उत्खनन के दौरान यहाँ लंबी समानांतर दीवारों और बड़ी इमारतों के अवशेष मिले हैं।
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यहाँ से लगभग 100 × 30 फीट या उससे बड़ी पक्की ईंटों और पत्थरों से बनी विशाल दीवारें/संरचनाएँ मिली हैं। कुछ इतिहासकार इन्हें बड़े भंडार गृह (Storage complexes) या कार्यशालाएँ मानते हैं।
C. मृदभांड (Pottery) के प्रकार
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गिल्लूंड से पाँच प्रमुख प्रकार के मिट्टी के बर्तन (मृदभांड) मिले हैं:
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लाल और काले रंग के मृदभांड (Black-and-Red Ware) जिन पर सफेद रंग से ज्यामितीय और रेखीय डिजाइन (Geometric & Linear designs) बनाई जाती थी।
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सादे मृदभांड, पॉलिशदार बर्तन, स्लेटी रंग (Grey ware) की तश्तरियाँ और कटोरे।
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D. अर्थव्यवस्था: कृषि और पशुपालन (Agro-Pastoralism)
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यहाँ के लोग कृषि और पशुपालन दोनों करते थे। उत्खनन में ज्यों, गेहूँ आदि के दानों के साथ-साथ भेड़, बकरी, गाय और बैलों जैसी पालतू तथा जंगली जानवरों की हड्डियाँ मिली हैं, जो इनके मांसाहारी होने और पशुपालन का प्रमाण देती हैं।
E. अन्य महत्वपूर्ण अवशेष एवं वस्तुएँ
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टेराकोटा की मूर्तियाँ: यहाँ से पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) के सुंदर खिलौने, हाथी, ऊंट, कुत्ते और विशेष रूप से उबड़-खाबड़ कूबड़ वाले बैल (Bull figurines) की मूर्तियाँ मिली हैं।
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हाथी दाँत की चूड़ियाँ: यहाँ से हाथी दाँत से बनी चूड़ियों के अवशेष मिले हैं, जो उच्च कारीगरी और समृद्धि को दर्शाते हैं।
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तांबे के उपकरण: ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति होने के कारण यहाँ से तांबे के बाण, अंगूठियाँ और अन्य छोटे अस्त्र-शस्त्र प्राप्त हुए हैं।
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मुहरों की छाप (Seal Impressions): यहाँ से कुछ ऐसी मिट्टी की गोलियाँ मिली हैं जिन पर प्राचीन मुहरों की छाप (Seal impressions) बनी हुई हैं, जो दूर-दराज के व्यापारिक संपर्कों की ओर इशारा करती हैं।
आरपीएससी (RPSC) और आरएएस (RAS) परीक्षाओं में गिल्लूंड से मुख्य रूप से राजसमंद जिला, बनास नदी, ‘मोडिया मगरी’ टीला, बी.बी. लाल व ग्रेगरी पोशेल, और पक्की ईंटों के प्रयोग से जुड़े प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं।