मुख्य बिंदु: आहड़ सभ्यता (उदयपुर): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण प्रामाणिक स्रोतों (RBSE, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और RPSC पाठ्यक्रम) के अनुसार आहड़ सभ्यता राजस्थान की बनास घाटी (बनास संस्कृति) की सबसे प्रमुख, ग्रामीण और ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति है। आहड़ से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं: 1. सामान्य परिचय एवं […]
आहड़ सभ्यता (उदयपुर): संपूर्ण एवं विस्तृत विवरण
प्रामाणिक स्रोतों (RBSE, राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी और RPSC पाठ्यक्रम) के अनुसार आहड़ सभ्यता राजस्थान की बनास घाटी (बनास संस्कृति) की सबसे प्रमुख, ग्रामीण और ताम्रपाषाण कालीन संस्कृति है।
आहड़ से जुड़ी छोटी-से-छोटी, भौगोलिक, ऐतिहासिक और पुरातात्विक डिटेल्स नीचे बिंदुवार दी जा रही हैं:
1. सामान्य परिचय एवं भौगोलिक स्थिति
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जिला: उदयपुर (राजस्थान)।
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नदी: यह सभ्यता आड़ नदी (जिसे स्थानीय रूप से बेड़च नदी भी कहा जाता है) के तट पर विकसित हुई थी। यह बनास नदी बेसिन का हिस्सा है।
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प्राचीन एवं स्थानीय नाम:
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प्राचीन काल में इसे ‘तांबवती पुरी’ (तांबे की नगरी) कहा जाता था, क्योंकि यहाँ तांबे के औजार प्रचुर मात्रा में बनते थे।
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10वीं-11वीं शताब्दी में इसे ‘आघाटपुर’ या ‘आघाट दुर्ग’ के नाम से जाना जाता था।
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वर्तमान में इसके टीले को स्थानीय लोग ‘धूलकोट’ (धूल का टीला) कहते हैं।
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2. खोज एवं उत्खनन (Discovery & Excavation)
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खोज: इस स्थल की खोज वर्ष 1953 में अक्षयकीर्तन व्यास (A.K. Vyas) द्वारा की गई थी।
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उत्खनन:
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सबसे पहले वर्ष 1956 में रतन चंद्र अग्रवाल (R.C. Agarwal) द्वारा इसका उत्खनन किया गया।
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इसके बाद वर्ष 1961-62 में पुणे के डेक्कन कॉलेज के प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. एच.डी. सांकलिया (धीरजलाल रामचंद्र सांकलिया) के निर्देशन में बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक उत्खनन किया गया। इसमें उनके साथ गोपीनाथ शर्मा और विजय कुमार ने भी सहयोग किया था।
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3. काल निर्धारण (Time Period)
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कार्बन-14 (C-14) डेटिंग पद्धति के अनुसार आहड़ संस्कृति का मुख्य काल लगभग 1900 ईसा पूर्व से 1200 ईसा पूर्व (ताम्रपाषाण काल) माना जाता है।
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यहाँ उत्खनन में संस्कृति के कुल आठ स्तर (Phases) मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यह सभ्यता लंबे समय तक विकसित होती रही।
4. आहड़ सभ्यता की मुख्य विशेषताएँ (बिंदुवार संपूर्ण विवरण)
A. एक ग्रामीण संस्कृति (Rural Civilization)
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जहाँ सिंधु घाटी सभ्यता (जैसे कालीबंगा) एक शहरी सभ्यता थी, वहीं आहड़ एक पूरी तरह से विकसित ग्रामीण संस्कृति थी। यहाँ के लोग कृषि, पशुपालन और धातु उद्योग पर निर्भर थे।
B. पक्के मकान और वास्तुकला (Stone-built Houses)
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यहाँ के मकान मुख्य रूप से पक्के पत्थरों और मिट्टी से बनाए जाते थे (साथ ही कुछ दीवारों में धूप में सुखाई गई ईंटों का भी प्रयोग मिलता है)।
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घरों की छतें बांस और घास-फूस की होती थीं जिन पर मिट्टी का लेप किया जाता था। मकानों की नींव मजबूत होती थी।
C. संयुक्त परिवार या सामूहिक भोज के प्रमाण (2 से 6 चूल्हे)
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आहड़ के घरों की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यहाँ के एक ही मकान में 2 से लेकर 6 तक चूल्हे मिले हैं।
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इतिहासकार मानते हैं कि यह इस बात का प्रमाण है कि यहाँ संयुक्त परिवार प्रणाली (Joint Family System) या सामूहिक भोज (Community Kitchen) की प्रथा प्रचलित थी, क्योंकि एक साथ बड़े परिवार के लिए खाना बनाने के लिए कई चूल्हों की आवश्यकता होती थी।
D. विशिष्ट मृदभांड: “बनास संस्कृति” (Red-Black Ware)
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आहड़ से मिलने वाले मिट्टी के बर्तनों (मृदभांडों) को ‘लाल और काले रंग के मृदभांड’ (Red and Black Ware) कहा जाता है।
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इन बर्तनों पर उल्टी तपाई (Inverse-firing technique) का प्रयोग किया जाता था, जिससे अंदर का हिस्सा काला और बाहर का हिस्सा लाल दिखाई देता था। इन बर्तनों पर सफेद रंग से ज्यामितीय (Geometric) डिजाइन बनाई जाती थी। इसी विशेषता के कारण आहड़ संस्कृति को ‘बनास संस्कृति’ (Banas Culture) भी कहा जाता है।
E. तांबे गलाने की भट्ठियाँ (Copper Smelting Furnaces)
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‘तांबवती पुरी’ कहे जाने वाले इस स्थल से घरों में तांबा गलाने की ताम्र-गलाने की भट्ठियाँ (Smelting Furnaces) मिली हैं।
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इससे यह स्पष्ट होता है कि यहाँ के निवासी तांबे की वस्तुएँ (जैसे कुल्हाड़ियाँ, चूड़ियाँ, अंगूठियाँ और छल्ले) खुद अपने घरों या कार्यशालाओं में तैयार करते थे।
F. विदेशी व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क (अनूठी मुहरें)
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आहड़ से प्राप्त वस्तुओं से इसके विदेशी व्यापार के संकेत मिलते हैं।
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यहाँ से एक ऐसा मृदभांड मिला है जिस पर यूनानी देवता ‘अपोलो’ (Apollo) का चित्र अंकित है (हाथ में तीर लिए हुए)।
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इसके अलावा यहाँ से बिना हत्थे के तांबे की मुद्राएँ और ऐसी 6 मुहरें (Seals) तथा 21 तांबे की मुद्राएँ मिली हैं, जिन पर त्रिशूल और यूनानी आलेख अंकित हैं। इससे यह साबित होता है कि आहड़ के व्यापारियों के संबंध ईरान, यूनान और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं से थे।
G. अन्य महत्वपूर्ण अवशेष
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अन्न रखने के मृद्भांड (गोरे / कोठे): अनाज या खाद्य सामग्री सुरक्षित रखने के लिए बड़े-बड़े मिट्टी के मटके या कोठे बनाए जाते थे, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘गोरे’ या ‘बोहक’ कहा जाता था।
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यहाँ से रंगाई-छपाई के ठप्पे (Stamps) मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि वस्त्रों पर छपाई का कार्य भी होता था।
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यहाँ के लोग चावल, ज्वार और गेहूँ की खेती से परिचित थे।
आरपीएससी (RPSC) और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से आहड़ से मुख्य रूप से बेड़च/आड़ नदी, अक्षयकीर्तन व्यास, एच.डी. सांकलिया, तांबवती पुरी, धूलकोट, एक ही घर में 6 चूल्हे, और रेड-ब्लैक वेयर (लाल-काले मृदभांड) से जुड़े प्रश्न सबसे अधिक बार पूछे जाते हैं।