मुख्य बिंदु: डूंगरपुर प्रजामंडल राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलनों में आदिवासियों के अधिकारों और सामाजिक सुधार के लिए सबसे अधिक संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक संगठनों में से एक था। इसके बारे में सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ विस्तार से निम्नलिखित हैं: 1. स्थापना वर्ष (Establishment Year) स्थापना वर्ष: 1944 ई. में डूंगरपुर प्रजामंडल की स्थापना की गई थी। 2. संस्थापक एवं […]
डूंगरपुर प्रजामंडल राजस्थान के प्रजामंडल आंदोलनों में आदिवासियों के अधिकारों और सामाजिक सुधार के लिए सबसे अधिक संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक संगठनों में से एक था। इसके बारे में सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ विस्तार से निम्नलिखित हैं:
1. स्थापना वर्ष (Establishment Year)
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स्थापना वर्ष: 1944 ई. में डूंगरपुर प्रजामंडल की स्थापना की गई थी।
2. संस्थापक एवं प्रमुख नेता (Founder & Key Leaders)
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संस्थापक एवं प्रमुख नेता: भोगीलाल पांड्या (इन्हें ‘वागड़ का गांधी’ कहा जाता है)।
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अन्य सहयोगी नेता: हरदेव जोशी, गौरीशंकर उपाध्याय और शिवलाल कोटड़िया ने भी इस आंदोलन को मजबूती प्रदान की।
3. मुख्य गतिविधियाँ एवं उपलब्धियाँ (Activities & Achievements)
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‘हरिजन सेवा संघ’ और ‘वागड़ सेवा मंदिर’ की स्थापना: भोगीलाल पांड्या ने 1935 में ही ‘वागड़ सेवा मंदिर’ की स्थापना कर दी थी, जिसके माध्यम से आदिवासियों, भीलों और दलितों के उत्थान, शिक्षा और समाज सुधार के कार्य किए गए।
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रक्ताभिसार/दमन और रास्तापाल कांड (1947): डूंगरपुर रियासत में प्रजामंडल और पाठशालाओं के संचालन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। 19 जून 1947 को नानाभाई खाट और सेंगारभाई भील ने अपनी पाठशाला बंद करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद पुलिस ने उन पर भीषण अत्याचार किए और कानाबाई व विद्यार्थी भील्नी कालीबाई शहीद हो गईं। यह घटना राजस्थान के इतिहास में ‘रास्तापाल कांड’ के रूप में अमर हो गई।
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बेगार और करों का विरोध: रियासत में आदिवासियों से जबरन बेगार करवाने, भारी लगान वसूलने और उनके उत्पीड़न के खिलाफ इस प्रजामंडल ने कड़ा संघर्ष किया।
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उत्तरदायी शासन की मांग: डूंगरपुर रियासत में भी अन्य क्षेत्रों की तरह उत्तरदायी शासन की स्थापना और नागरिकों के मौलिक अधिकारों की मांग पुरज़ोर तरीके से उठाई गई।
4. कमियाँ एवं सीमाएँ (Limitations & Challenges)
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रियासत और पुलिस का क्रूर दमन: डूंगरपुर के महाराजा और उनके प्रशासनिक अधिकारियों ने प्रजामंडल की गतिविधियों को कुचलने के लिए बेहद कठोर कदम उठाए। कार्यकर्ताओं को जेलों में डाला गया और विद्यालयों को जबरन बंद करवाया गया।
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शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ापन: वागड़ अंचल भौगोलिक रूप से अत्यंत दुर्गम और आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ था, जिसके कारण शुरुआती समय में जन-जागृति फैलाने और संस्थाओं को चलाने के लिए भारी वित्तीय व संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ा।
5. मुख्य विशेषता / विवरण (Key Features / Summary)
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भोगीलाल पांड्या (‘वागड़ का गांधी’) का नेतृत्व: डूंगरपुर प्रजामंडल की सबसे बड़ी पहचान भोगीलाल पांड्या का समर्पित और निष्कलंक नेतृत्व है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन आदिवासियों और पिछड़ों की सेवा में लगा दिया।
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आदिवासी महिलाओं और युवाओं का बलिदान: रास्तापाल कांड जैसी ऐतिहासिक घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि डूंगरपुर प्रजामंडल का आंदोलन केवल शहरी शिक्षित वर्ग तक सीमित नहीं था, बल्कि यह समाज के सबसे निचले और अंतिम व्यक्ति तक जुड़ा हुआ एक सच्चा जन-आंदोलन था।