मुख्य बिंदु: मारवाड़ प्रजामंडल राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण, संघर्षपूर्ण और सक्रिय प्रजामंडल आंदोलनों में से एक था। मारवाड़ (विशेषकर जोधपुर) रियासत में राजनीतिक चेतना और उत्तरदायी शासन की मांग को लेकर यह आंदोलन बहुत व्यापक रहा था। इसके बारे में सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ विस्तार से नीचे दी गई हैं: 1. स्थापना वर्ष (Establishment Year) प्रथम बार स्थापना: […]
मारवाड़ प्रजामंडल राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण, संघर्षपूर्ण और सक्रिय प्रजामंडल आंदोलनों में से एक था। मारवाड़ (विशेषकर जोधपुर) रियासत में राजनीतिक चेतना और उत्तरदायी शासन की मांग को लेकर यह आंदोलन बहुत व्यापक रहा था। इसके बारे में सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ विस्तार से नीचे दी गई हैं:
1. स्थापना वर्ष (Establishment Year)
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प्रथम बार स्थापना: 1934 ई. में जयनारायण व्यास और उनके साथियों द्वारा जोधपुर में ‘मारवाड़ प्रजामंडल’ की स्थापना की गई थी।
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पुनर्गठन / सक्रियता: बाद में 1938 ईस्वी में इसे और अधिक सुदृढ़ किया गया।
2. संस्थापक एवं प्रमुख नेता (Founder & Key Leaders)
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संस्थापक एवं मुख्य नेता: जयनारायण व्यास (इन्हें ‘मारवाड़ प्रजामंडल का मसीहा’, ‘शेर-ए-राजस्थान’ और ‘लोकनायक’ कहा जाता है)।
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अन्य प्रमुख नेता: भंवरलाल सर्राफ, अभयमल जैन, छगनराज चौपासनीवाला, आनंदराज सुराणा, मथुरादास माथुर, और अचलेश्वर प्रसाद शर्मा।
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प्रमुख महिला नेत्री: महात्मा गांधी की शिष्या आर्या कुमारी, द्रोपदी देवी, और गोमती देवी जैसी महिलाओं ने यहाँ के आंदोलनों में बढ़-चढ़कर भाग लिया।
3. मुख्य गतिविधियाँ एवं उपलब्धियाँ (Activities & Achievements)
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उत्तरदायी शासन की मांग: मारवाड़ रियासत में राजा के संरक्षण में जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा शासन चलाने (उत्तरदायी शासन) की मांग पुरज़ोर तरीके से उठाई गई।
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‘मारवाड़ लोक परिषद’ का गठन (1938): मारवाड़ प्रजामंडल को जब जोधपुर रियासत ने अवैध घोषित कर दिया, तब जयनारायण व्यास और उनके साथियों ने 1938 में ‘मारवाड़ लोक परिषद’ की स्थापना की। इसी परिषद के नेतृत्व में आगे के सभी बड़े राजनीतिक आंदोलन संचालित हुए।
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डाबड़ा कांड (1947): 13 मार्च 1947 को डीडवाना (नागौर) के डाबड़ा गाँव में किसानों पर जागीरदारों और प्रशासन द्वारा भीषण अत्याचार किए गए, जिसमें कई किसान शहीद हुए। प्रजामंडल ने इस अन्याय के खिलाफ जोरदार आवाज़ उठाई।
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शिक्षा और जनजागृति: जयनारायण व्यास ने ‘अखंड भारत’ (मुंबई से), ‘पीपल’ (अंग्रेजी साप्ताहिक) और ‘तरुण राजस्थान’ जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से मारवाड़ की जनता में राजनीतिक चेतना जगाई और अंग्रेजों तथा रियासती दमन की पोल खोली।
4. कमियाँ एवं सीमाएँ (Limitations & Challenges)
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रियासत प्रशासन का भारी दमन: मारवाड़ रियासत और वहाँ के तानाशाह प्रशासनिक अधिकारियों (जैसे सम्स और जैनुलाब्दीन) द्वारा प्रजामंडल के नेताओं पर भीषण अत्याचार किए गए। नेताओं को देश-निकाल (तड़ीपार) दिया गया और उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई।
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आंतरिक मतभेद: कुछ समय के लिए स्थानीय राजनीति और नेतृत्व को लेकर आंतरिक स्तर पर रणनीतिक मतभेद भी सामने आए, लेकिन कुल मिलाकर संकट के समय सभी नेता एक साथ खड़े रहे।
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सांप्रदायिक व जागीरदारी ताकतों का विरोध: सामंतवादी व्यवस्था (जागीरदारों) ने प्रजामंडल के सुधार कार्यों और किसानों के अधिकारों का कड़ा विरोध किया, जिससे आंदोलन को लंबा संघर्ष करना पड़ा।
5. मुख्य विशेषता / विवरण (Key Features / Summary)
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जयनारायण व्यास का नेतृत्व: इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता जयनारायण व्यास का ओजस्वी नेतृत्व था, जिन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और नजरबंद रखा गया, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
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किसान आंदोलनों से जुड़ाव: मारवाड़ प्रजामंडल केवल शहरी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने मारवाड़ के विभिन्न किसान आंदोलनों (जैसे मारवाड़ किसान आंदोलन) को भी अपने साथ जोड़ा और जन-जन का आंदोलन बना।