1857 की महान क्रांति भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में जानी जाती है। उस समय राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) में 6 प्रमुख ब्रिटिश छावनियाँ थीं और यहाँ कुल 20 रियासतें थीं (19 रियासतें + 3 ठिकाने – कुशलगढ़, नीमराणा, लावा)।
इस समय राजस्थान के एजीजी (Agent to the Governor-General / AGG) जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस (George Patrick Lawrence) थे, जिनका मुख्य कार्यालय अजमेर (माउण्ट आबू) में था।
1. राजस्थान में क्रांति के समय 6 प्रमुख छावनियाँ
क्रांति की शुरुआत से पहले राजपूताना में निम्नलिखित छह सैन्य छावनियाँ थीं, जहाँ लगभग 5,000 भारतीय सैनिक थे और एक भी ब्रिटिश सैनिक सीधे तौर पर तैनात नहीं था:
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नसीराबाद (अजमेर) – बंगाल नेटिव इन्फैंट्री
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नीमच (वर्तमान मध्य प्रदेश में, उस समय मेवाड़ के अधीन) – ग्वालियर कंटिंजेंट
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एरिनपुरा (पाली) – जोधपुर लीजियन
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ब्यावर (अजमेर) – मेरवाड़ा बटालियन
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खेरवाड़ा (उदयपुर) – मेवाड़ भीम कार्प्स
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देवगढ़ / देवली (टोंक) – कोटा कंटिंजेंट
(नोट: ब्यावर और खेरवाड़ा छावनियों के सैनिकों ने प्रत्यक्ष रूप से इस क्रांति में भाग नहीं लिया था।)
2. राजस्थान के विभिन्न छावनियों और क्षेत्रों में क्रांति की घटनाएं
I. नसीराबाद छावनी (प्रथम विद्रोह: 28 मई 1857)
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तारीख: 28 मई 1857
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विद्रोह का कारण: मेरठ की क्रांति की खबर मिलने पर अजमेर स्थित मैगजीन किले और राजपूताना की सुरक्षा को लेकर अंग्रेजों ने 15वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री (BNI) पर अविश्वास जताया और उसे नसीराबाद भेज दिया। साथ ही बाहर से तोपखाना बुला लिया गया, जिससे सैनिकों में आक्रोश फैल गया।
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प्रमुख घटना: 15वीं बटालियन के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया और बाद में 30वीं बटालियन के सैनिक भी मिल गए। सैनिकों ने ब्रिटिश अधिकारियों (न्यूबे और स्पॉटिसवुड) की हत्या कर दी और खजाने पर कब्जा करके दिल्ली की ओर कूच कर गए।
II. नीमच छावनी (3 जून 1857)
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तारीख: 3 जून 1857
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प्रमुख घटना: यहाँ के सैनिकों ने रात को कर्नल एबॉट के समक्ष कुरान और गीता की कसम खाकर विद्रोह कर दिया। सैनिकों ने छावनी में आग लगा दी और नीमच से भागकर शाहपुरा पहुँचे, जहाँ शाहपुरा के शासक ने उनकी मदद की।
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विशेष तथ्य: नीमच में छिपे लगभग 40-45 अंग्रेज परिवारों को क्रांतिकारियों (हीरासिंह आदि) ने घेरा लिया था, जिन्हें बाद में मेवाड़ी अधिकारी सावन्त सिंह की मदद से सुरक्षित पिछोला झील (उदयपुर) के जगमंदिर पैलेस में ठहराया गया था। उदयपुर के महाराणा स्वरूप सिंह ने इनकी पूरी मेहमाननवाजी की थी।
III. एरिनपुरा छावनी (21 अगस्त 1857)
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तारीख: 21 अगस्त 1857
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प्रमुख घटना: यहाँ ‘जोधपुर लीजियन’ के सैनिकों ने विद्रोह किया। सैनिकों ने नारा दिया—“चलो दिल्ली, मारो फिरंगी”।
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आउवा का युद्ध और कुशाल सिंह चंपावत:
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एरिनपुरा के विद्रोही सैनिक जब पाली के रास्ते मारवाड़ की ओर बढ़ रहे थे, तब पाली के आउवा ठिकाने के ठाकुर कुशाल सिंह चंपावत ने इन क्रांतिकारियों को अपने यहाँ शरण दी। कुशाल सिंह चंपावत मारवाड़ के राजा तख्त सिंह और अंग्रेजों से नाराज थे।
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बिथोड़ा का युद्ध (8 सितंबर 1857): कुशाल सिंह चंपावत और पाली के विद्रोही सैनिकों की संयुक्त सेना ने जोधपुर के महाराजा तख्त सिंह और अंग्रेज अधिकारी हितकोट (Heathcoat) की संयुक्त सेना को बुरी तरह हराया। इस युद्ध में हितकोट मारा गया।
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चेलावास का युद्ध / गोरे-कालों का युद्ध (18 सितंबर 1857): इस युद्ध में स्वयं एजीजी जॉर्ज पैट्रिक लॉरेंस और मॉक मेसन (जोधपुर का पॉलिटिकल एजेंट) सेना लेकर आए। कुशाल सिंह चंपावत ने इन्हें फिर हरा दिया। इस युद्ध में मॉक मेसन का सिर काटकर आउवा के किले के मुख्य दरवाजे पर लटका दिया गया था।
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आउवा का पतन (जनवरी 1858): अंततः कर्नल होम्स के नेतृत्व में एक विशाल अंग्रेजी सेना ने आउवा पर आक्रमण किया। कुशाल सिंह चंपावत किले की जिम्मेदारी अपने भाई पृथ्वी सिंह को सौंपकर मेवाड़ (सूंभा गांव) चले गए। अंग्रेजों ने आउवा के किले को तहस-नहस कर दिया और वहाँ की प्रसिद्ध सुगाली माता (10 सिर और 54 हाथ वाली) की मूर्ति को अजमेर ले गए (वर्तमान में यह मूर्ति पाली के बांगड़ संग्रहालय में है)।
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IV. कोटा रियासत में जनक्रांति (15 अक्टूबर 1857)
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विशेषता: राजस्थान में कोटा की क्रांति सबसे भीषण और सुनियोजित थी, जहाँ सैनिकों के साथ-साथ आम जनता ने भी भाग लिया।
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नेतृत्व: यहाँ के मुख्य विद्रोही नेता जयदयाल और मेहराब खाँ थे।
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घटना: क्रांतिकारियों ने महाराव रामसिंह द्वितीय को उनके ही कोटा के महल में नजरबंद कर लिया और पॉलिटिकल एजेंट मेजर मेजर बर्टन, उसके दो पुत्रों तथा चिकित्सक (डॉ. सॉवर्ट) की हत्या कर दी। क्रांतिकारियों ने लगभग 6 महीने तक कोटा शहर पर पूरी तरह नियंत्रण रखा।
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दमन: मार्च 1858 में करौली के राजा मदनपाल की सेना की सहायता से जनरल रॉबर्ट्स ने कोटा पर पुनः अंग्रेजों का अधिकार स्थापित किया और जयदयाल तथा मेहराब खाँ को सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया गया।
3. राजस्थान के अन्य महत्वपूर्ण शासक और योगदान
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बीकानेर के महाराजा सरदार सिंह: अकेले ऐसे शासक थे जो अपनी सेना को लेकर राज्य की सीमा से बाहर (हिसार, भटवाड़ा आदि क्षेत्रों में) अंग्रेजों की मदद के लिए गए थे। अंग्रेजों ने खुश होकर उन्हें ‘ब्लोप’ (टिबड़ी) परगने के 41 गाँव इनाम में दिए थे।
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उदयपुर के महाराणा स्वरूप सिंह: इन्होंने नीमच के भागे हुए अंग्रेज अधिकारियों और परिवारों को अपने यहाँ शरण दी थी।
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करौली के महाराजा मदनपाल: इन्होंने कोटा के विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजी सेना की प्रत्यक्ष सहायता की थी, जिसके एवज में अंग्रेजों ने उनकी तोपों की सलामी 13 से बढ़ाकर 17 कर दी थी।
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अमरचंद बाठिया (बीकानेर के निवासी): इन्हें ‘राजस्थान का मंगल पांडे’ कहा जाता है। ग्वालियर में रहते हुए इन्होंने अपनी पूरी संपत्ति रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे को आर्थिक सहायता के रूप में दे दी थी, जिसके कारण अंग्रेजों ने इन्हें ग्वालियर में फांसी पर लटका दिया।
4. तात्या टोपे का राजस्थान आगमन
मध्य भारत के महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने दो बार राजस्थान में प्रवेश किया था:
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प्रथम प्रवेश (अगस्त 1858): भीलवाड़ा के पास मांडलगढ़ में प्रवेश किया, जहाँ कुवाड़ा के युद्ध में जनरल रॉबर्ट्स से उनका मुकाबला हुआ।
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द्वितीय प्रवेश (दिसंबर 1858): बाँसवाड़ा और झालावाड़ के रास्ते होते हुए वे टोंक, अलवर और सीकर तक पहुँचे। टोंक के नवाब के सैनिकों ने उनका साथ दिया था।
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मानसिंह नरूका (नवरिया के जागीरदार) के विश्वासघात के कारण तात्या टोपे को नरवर के जंगलों में सोते समय पकड़ लिया गया और 19 अप्रैल 1859 को शिवपुरी (म.प्र.) में उन्हें फांसी दे दी गई।
5. क्रांति की असफलता के कारण
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राजपूताना के अधिकांश राजाओं (जैसे जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, करौली, उदयपुर आदि) ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजों का साथ दिया।
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क्रांतिकारियों के बीच आपसी तालमेल, केंद्रीय नेतृत्व और आधुनिक हथियारों की कमी थी।
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अलग-अलग समय पर अलग-अलग जगहों पर विद्रोह होने से अंग्रेजों को एक-एक करके उन्हें कुचलने का मौका मिल गया।