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पजवन देव (पजून)

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सत्यापित: 09 September 2026
मुख्य बिंदु: पजवन देव (पजुन / प्रजून राय) आमेर के कछवाहा राजवंश के सबसे पराक्रमी और प्रसिद्ध प्रारंभिक शासकों में गिने जाते हैं। वे अजमेर और दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के प्रमुख सेनापति, विश्वस्त मित्र तथा बहनोई थे। सामान्य परिचय व वंश राजवंश: कछवाहा (कुशवाहा) राजपूत वंश। उपनाम/अन्य नाम: पजवन देव, राजा पजून, प्रजून राय। […]
पजवन देव (पजुन / प्रजून राय) आमेर के कछवाहा राजवंश के सबसे पराक्रमी और प्रसिद्ध प्रारंभिक शासकों में गिने जाते हैं। वे अजमेर और दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के प्रमुख सेनापति, विश्वस्त मित्र तथा बहनोई थे।

सामान्य परिचय व वंश

  • राजवंश: कछवाहा (कुशवाहा) राजपूत वंश।
  • उपनाम/अन्य नाम: पजवन देव, राजा पजून, प्रजून राय।
  • राजधानी: आमेर।
  • शासनकाल: 12वीं शताब्दी का उत्तरार्ध (लगभग 1170 – 1194 ई. के मध्य; विभिन्न ख्यातों व शिलालेखों में काल-विभाजन का सूक्ष्म अंतर मिलता है)।

पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं वैवाहिक गठबंधन

  • पिता: जान्हड़ देव (जाण्हड़देव)।
  • वैवाहिक संबंध: सम्राट पृथ्वीराज चौहान की बहन/चचेरी बहन से इनका विवाह हुआ था। इस वैवाहिक संबंध ने चौहान-कछवाहा गठबंधन को अत्यंत सुदृढ़ बनाया।
  • उत्तराधिकारी (संतान): मलयसी (मलेसी) कछवाहा।

प्रमुख युद्ध एवं सैन्य उपलब्धियां

पजवन देव ने अपने जीवनकाल में 64 युद्धों में भाग लिया और अपनी अद्वितीय रणकौशलता का परिचय दिया:
  1. महोबा का युद्ध / तुमुल युद्ध (1182 ई.):
    • सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने जब चंदेल शासक परमर्दिदेव (परमाल) पर आक्रमण किया, तो पजवन देव इस अभियान के मुख्य सेनापति थे।
    • आल्हा-ऊदल के विरुद्ध हुए इस भीषण युद्ध में विजय के बाद पृथ्वीराज चौहान ने पजवन देव को महोबा का गवर्नर/प्रशासक नियुक्त किया।
  2. हांसी और नागौर का संघर्ष:
    • हांसी दुर्ग की सुरक्षा और उत्तर-पश्चिमी सीमा पर शहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी की प्रारंभिक घुसपैठ को रोकने में पजवन देव का मुख्य योगदान रहा। हांसी के 1168 ई. के शिलालेख में भी इनका उल्लेख मिलता है।
  3. गुजरात के चालुक्यों (सोलंकियों) के विरुद्ध युद्ध:
    • गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय के विरुद्ध चौहान सेना का सफल नेतृत्व किया।
  4. कन्नौज का संघर्ष (संयोगिता हरण):
    • जब पृथ्वीराज चौहान कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता को लेकर निकले, तो जयचंद की विशाल सेना का मार्ग रोकने और पीछे से हो रहे आक्रमणों को थामने की कमान पजवन देव ने संभाली।
    • इस भीषण युद्ध में पजवन देव और उनके परिजनों ने अद्भुत शौर्य दिखाया।

वीरगति

पजवन देव की वीरगति को लेकर दो मुख्य ऐतिहासिक मत मिलते हैं:
  • रासो परंपरा के अनुसार: कन्नौज के राजा जयचंद की सेना से लड़ते हुए वे संयोगिता हरण के पश्चात हुए भीषण युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
  • अन्य इतिहासकारों के अनुसार: उन्होंने 1191 ई. के तराइन के प्रथम युद्ध में भाग लिया, जहाँ गोरी की सेना के विरुद्ध लड़ते हुए वीरगति पाई।
  • चंदबरदाई का प्रसिद्ध कथन: उनकी मृत्यु पर महाकवि चंदबरदाई ने अत्यंत भावुक पंक्तियां कही थीं:
    “कुरम पज्जुन मरत थकन, मानु चाप गुन तूट्टिया।”
    (अर्थात कछवाहा पजवन के वीरगति पाने से ऐसा लगा मानो पृथ्वीराज के धनुष की प्रत्यंचा ही टूट गई हो)।

प्रशासनिक एवं सांस्कृतिक योगदान

  • कछवाहा शक्ति का चरमोत्कर्ष: पजवन देव के समय आमेर राज्य उत्तर भारत की प्रमुख राजनीति और सामरिक शक्ति के रूप में स्थापित हुआ।
  • सामरिक दुर्ग निर्माण: आमेर और आसपास की पहाड़ियों पर निगरानी चौकियां व रक्षा प्राचीरें निर्मित करवाईं, जिससे बाहरी आक्रमणकारियों से घाटी की सुरक्षा सुनिश्चित हुई।

ऐतिहासिक संदर्भ (Sources)

  • कवि चन्दबरदाई: पृथ्वीराज रासो (पजवन देव के 64 युद्धों, महोबा विजय और कन्नौज युद्ध का विस्तृत वर्णन)।
  • जयानक भट्ट: पृथ्वीराज विजय (संस्कृत महाकाव्य)।
  • हांसी का शिलालेख (1168 ई.): हांसी दुर्ग की रक्षा व्यवस्था के संदर्भ में उल्लेख।
  • मुंहता नैणसी: मुंहता नैणसी री ख्यात।
  • सर जदुनाथ सरकार: A History of Jaipur (C. 1503–1938)।
  • कर्नल जेम्स टॉड: एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

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