मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य रणथंभौर (रणस्तंभपुर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के इतिहास में हम्मीरदेव चौहान (शासनकाल: 1282–1301 ईस्वी) का स्थान शौर्य, शरणागत वत्सलता और अपनी हठ (‘हम्मीर हठ’) के लिए भारतीय इतिहास में अमर है। इनके काल में रणथंभौर चौहान शक्ति का चरमोत्कर्ष स्थापित हुआ। समय काल: 1282–1301 ईस्वी (13वीं शताब्दी का अंतिम […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
रणथंभौर (रणस्तंभपुर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के इतिहास में हम्मीरदेव चौहान (शासनकाल: 1282–1301 ईस्वी) का स्थान शौर्य, शरणागत वत्सलता और अपनी हठ (‘हम्मीर हठ’) के लिए भारतीय इतिहास में अमर है। इनके काल में रणथंभौर चौहान शक्ति का चरमोत्कर्ष स्थापित हुआ।
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समय काल: 1282–1301 ईस्वी (13वीं शताब्दी का अंतिम चरण)।
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राज्यारोहण: 1282 ईस्वी में पिता जैत्रसिंह ने अपने जीवनकाल में ही इनका राज्याभिषेक किया।
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माता-पिता एवं परिवार:
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पिता: जैत्रसिंह (जयसिंह) | माता: हीरादेवी।
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महारानी: रानी रंगदेवी | पुत्री: पद्मला (देवलदे)।
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उपनाम एवं उपाधियाँ:
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‘हठी हम्मीर’ (वचन पालन और शरणागत रक्षा की अदम्य हठ के कारण)।
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‘शरणागत का रक्षक’ (मंगोल विद्रोही मीर मुहम्मद शाह और केहब्रू को प्राण रक्षा का वचन देने के कारण)।
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’16 युद्धों का विजेता’ (इन्होंने अपने जीवन में लड़े गए कुल 17 युद्धों में से 16 युद्धों में विजय प्राप्त की थी, अंतिम 17वाँ युद्ध 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध था)।
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2. हम्मीरदेव चौहान की दिग्विजय नीति (1282–1290 ई.)
राज्यारोहण के तुरंत बाद हम्मीरदेव ने अपने पूर्वजों की भांति साम्राज्य विस्तार हेतु चारों दिशाओं में ‘दिग्विजय अभियान’ प्रारंभ किया:
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भीमरस के अर्जुन को पराजय: दिग्विजय का आरंभ करते हुए सबसे पहले भीमरस (मालवा सीमांत) के राजा अर्जुन को पराजित कर करद बनाया।
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मांडलगढ़ एवं मेवाड़ अभियान: मेवाड़ के गुहिल शासक समरसिंह को पराजित कर मांडलगढ़ और मेवाड़ सीमांत से खिराज (कर) वसूला।
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मालवा (धार) अभियान: मालवा के परमार शासक भोज द्वितीय को पराजित किया।
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आबू एवं वर्धनपुर विजय: आबू के परमारों, वर्धनपुर (बड़ौदा के निकट) और काठियावाड़ तक सेना भेजकर विजय ध्वज फहराया।
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उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (चम्पा व पुष्कर): त्रिभुवनगिरि (तिमनगढ़/करौली), चम्पा, कांकरोली, पुष्कर और शाकंभरी (सांभर) होते हुए पुनः रणथंभौर लौटे। इस अभियान से संपूर्ण राजस्थान और मध्य भारत में हम्मीरदेव की धाक जम गई।
3. कोटियज्ञ (Kotiyajna) का आयोजन
दिग्विजय अभियान की अभूतपूर्व सफलता के उपरांत चक्रवर्ती सम्राटों की वैदिक परंपरा का पालन करते हुए हम्मीरदेव ने रणथंभौर में एक भव्य धार्मिक अनुष्ठान किया:
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यज्ञ का नाम: कोटियज्ञ (अश्वमेध यज्ञ के समतुल्य फलदायी वैदिक महायज्ञ)।
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राजपुरोहित / मुख्य यज्ञ आचार्य: प्रकांड वैदिक विद्वान आचार्य विश्वरूप।
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मुनि-सुव्रत नियम: यज्ञ की पूर्णाहुति तक हम्मीरदेव ने मुनि-व्रत धारण किया और ब्राह्मणों, तपस्वियों व प्रजा को विपुल दान-दक्षिणा दी।
4. जलालुद्दीन फिरोज खिलजी के असफल आक्रमण (1290–1292 ई.)
हम्मीरदेव की बढ़ती शक्ति से भयभीत होकर खिलजी वंश के संस्थापक दिल्ली सुल्तान जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने रणथंभौर को नष्ट करने के लिए दो बार विशाल सैन्य अभियान किए:
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‘झाईं दुर्ग’ (रणथंभौर की कुंजी) पर आक्रमण (1290 ई.):
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रणथंभौर की रक्षात्मक चौकी के रूप में स्थित ‘झाईं दुर्ग’ को “रणथंभौर दुर्ग की कुंजी” (Key to Ranthambore Fort) कहा जाता है।
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जलालुद्दीन खिलजी ने पहले झाईं पर आक्रमण किया।
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हम्मीरदेव के वीर सेनापति गुरुदास सैनी ने सुल्तान की सेना का डटकर मुकाबला किया और लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
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सुल्तान ने झाईं के मंदिरों और नौशहरी को लूटा तथा झाईं का नाम बदलकर ‘शहर-ए-नौ’ (नया शहर) रख दिया।
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रणथंभौर दुर्ग का असफल घेरा (1291–1292 ई.):
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झाईं जीतने के बाद जलालुद्दीन ने रणथंभौर दुर्ग का घेरा डाला और कई महीनों तक मंजनीक व मगरबी (पत्थर फेंकने वाले यंत्र) से दुर्ग की दीवारों पर गोले बरसाए।
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हम्मीरदेव की सेना ने दुर्ग से ऐसे भीषण जवाबी प्रहार किए कि सुल्तान की सेना के पैर उखड़ गए और दुर्ग को जीतना असंभव हो गया।
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जलालुद्दीन खिलजी का प्रसिद्ध ऐतिहासिक कथन:
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जब सुल्तान को अपनी पराजय और असफलता स्पष्ट दिखने लगी, तो उसने अपनी सेना को घेरा उठाने का आदेश दिया।
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जब उसके वजीर (मलिक अहमद चप) ने इसका विरोध किया, तो अपनी खीझ मिटाते हुए जलालुद्दीन खिलजी ने अमीर खुसरो के सम्मुख प्रसिद्ध वाक्य कहा:“मैं ऐसे दस (या सौ) किलों को भी मुसलमान के एक बाल के बराबर (मूल्यवान) नहीं समझता।”
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5. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं साहित्यकार
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| हम्मीर महाकाव्य | नयनचंद्र सूरि | संस्कृत (महाकाव्य) | सर्वप्रमुख स्रोत। दिग्विजय नीति, भीमरस-मालवा विजय, कोटियज्ञ (आचार्य विश्वरूप) और जलालुद्दीन के हमलों की विफलता का प्रामाणिक विवरण। |
| मिफ्ताह-उल-फुतुह | अमीर खुसरो (समकालीन दरबारी) | फारसी (तवारीख) | जलालुद्दीन खिलजी के झाईं व रणथंभौर अभियानों (1290–92 ई.), गुरुदास सैनी के युद्ध और सुल्तान के घेरा उठाने का आंखों देखा हाल। |
| हम्मीर रासो | जोधराज (18वीं सदी) / सारंगधर (14वीं सदी) | पिंगल / डिंगल | हम्मीर के शौर्य, दिग्विजय और युद्धों का विशद काव्य। |
| हम्मीर हठ | कवि चन्दशेखर | ब्रजभाषा (डिंगल मिश्रित) | हम्मीरदेव के शरणागत वत्सल स्वभाव और हठ का प्रसिद्ध ऐतिहासिक आख्यान। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; हम्मीर की दिग्विजय, कोटियज्ञ और जलालुद्दीन के आक्रमणों का आलोचनात्मक विश्लेषण। |
6. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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हम्मीरदेव चौहान का शासनकाल: 1282–1301 ईस्वी।
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कोटियज्ञ के मुख्य आचार्य/पुरोहित: आचार्य विश्वरूप।
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“रणथंभौर की कुंजी”: झाईं दुर्ग (सुल्तान द्वारा दिया गया नाम: शहर-ए-नौ)।
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झाईं की रक्षा करते हुए वीरगति पाने वाले हम्मीर के सेनापति: गुरुदास सैनी।
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“मैं ऐसे दस किलों को मुसलमान के एक बाल के बराबर नहीं समझता” — कथन: जलालुद्दीन खिलजी (1291–92 ई.)।
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कुल लड़े गए युद्ध: 17 (16 में विजयी)।