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वाल्हण (कल्हण)

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सत्यापित: 01 September 2026
मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य रणथंभौर (रणस्तंभपुर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के इतिहास में वाल्हण (साहित्यिक ग्रंथों व फारसी वृत्तांतों में इन्हें ‘वल्हण’, ‘बल्हाण’ अथवा ‘कल्हण’ भी लिखा गया है) का स्थान इस नई शाखा के द्वितीय शासक के रूप में दर्ज है। समय काल: लगभग 13वीं शताब्दी का प्रारंभिक चरण (12वीं सदी के […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
रणथंभौर (रणस्तंभपुर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के इतिहास में वाल्हण (साहित्यिक ग्रंथों व फारसी वृत्तांतों में इन्हें ‘वल्हण’, ‘बल्हाण’ अथवा ‘कल्हण’ भी लिखा गया है) का स्थान इस नई शाखा के द्वितीय शासक के रूप में दर्ज है।
  • समय काल: लगभग 13वीं शताब्दी का प्रारंभिक चरण (12वीं सदी के अंत से 13वीं सदी के आरंभ तक)।
  • वंशावलीगत स्थिति:
    • ये रणथंभौर शाखा के संस्थापक गोविन्दराज चतुर्थ (सम्राट पृथ्वीराज तृतीय ‘राय पिथौरा’ के पुत्र) के पुत्र एवं उत्तराधिकारी थे।
    • वाल्हण के उपरांत इनके पुत्र प्रह्लादन (प्रह्लाद) रणथंभौर की गद्दी पर बैठे।
  • दिल्ली सल्तनत के साथ संबंध एवं संघर्ष:
    • वाल्हण ने अपने पिता गोविन्दराज द्वारा स्थापित रणथंभौर राज्य को संगठित किया।
    • आरंभ में इन्होंने दिल्ली के मामलूक/गुलाम सुल्तानों (कुतुबुद्दीन ऐबक एवं आरंभिक तुर्क सत्ता) के साथ रणनीतिक शांति बनाए रखी।
    • जैसे-जैसे दिल्ली में तुर्क सत्ता का विस्तार हुआ, रणथंभौर के सामरिक महत्व के कारण सल्तनत का दबाव बढ़ा।
    • वाल्हण ने दुर्गम अरावली और विंध्य के जंगलों में स्थित रणथंभौर दुर्ग की रक्षात्मक प्राचीरों को मजबूत कर चौहान शक्ति के पुनर्गठन पर बल दिया।
  • उत्तरवर्ती पीढ़ी:
    • वाल्हण के बाद प्रह्लादन, फिर वीरनारायण (जिन्होंने इल्तुतमिश से डटकर संघर्ष किया), फिर वाग्भट और अंततः जैत्रसिंह व हम्मीरदेव चौहान हुए।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
वाल्हण (वल्हण) और रणथंभौर के प्रारंभिक चाहमान शासकों के संदर्भ निम्नलिखित साहित्यिक व पुरालेखीय स्रोतों में मिलते हैं:
स्रोत / ग्रंथ रचनाकार / रचयिता भाषा / विधा मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण
हम्मीर महाकाव्य नयनचंद्र सूरि संस्कृत (महाकाव्य) सर्वप्रमुख स्रोत। गोविन्दराज के बाद वल्हण (वाल्हण), प्रह्लादन, वीरनारायण से लेकर हम्मीरदेव तक की विशद वंशावलीय एवं ऐतिहासिक जानकारी।
हम्मीरायण भांडव व्यास प्राकृत / प्राचीन राजस्थानी रणथंभौर के चौहानों के स्वाभिमान और वंशानुक्रम का ऐतिहासिक काव्य।
तबकात-ए-नासिरी मिनहाज-उस-सिराज फारसी (इतिहास) 13वीं सदी के पूर्वार्द्ध में दिल्ली सल्तनत और रणथंभौर के हिंदू शासकों के राजनीतिक संबंधों का समकालीन विवरण।
अर्ली चौहान डायनेस्टीज डॉ. दशरथ शर्मा शोध ग्रंथ (इतिहास) राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; गोविन्दराज के बाद वाल्हण (Balhana/Valhana) के कालक्रम और रणथंभौर शाखा की वंशावलीय पुष्टि।
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
  • नवनिर्मित राज्य का सुदृढ़ीकरण: अजमेर के पतन के बाद रणथंभौर एक नई और नाजुक जागीर/राज्य के रूप में स्थापित हुआ था। वाल्हण ने विपरीत परिस्थितियों में इस नवजात राज्य को टूटने से बचाया और सत्ता की निरंतरता सुनिश्चित की।
  • रणथंभौर का अभेद्य रक्षा ढाँचा: इस काल में चौहान शासकों ने रणथंभौर दुर्ग के चारों ओर प्राकृतिक वन-प्राचीर और घाटी मार्गों (घाटी नाकों) को सामरिक छावनियों के रूप में विकसित करना शुरू किया, जो आगे चलकर इल्तुतमिश, बलबन, जलालुद्दीन और अलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुआ।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
  • रणथंभौर के चौहान संस्थापक गोविन्दराज चतुर्थ के उत्तराधिकारी / पुत्र: वाल्हण (वल्हण / कल्हण)।
  • पिता: गोविन्दराज चतुर्थ | दादा: सम्राट पृथ्वीराज तृतीय (राय पिथौरा)।
  • पुत्र व उत्तराधिकारी: प्रह्लादन | पौत्र: वीरनारायण।
  • रणथंभौर वंशावली क्रम: गोविन्दराज चतुर्थ ➔ वाल्हण ➔ प्रह्लादन ➔ वीरनारायण ➔ वाग्भट ➔ जैत्रसिंह ➔ हम्मीरदेव चौहान।

प्रमाणित संदर्भ एवं ग्रंथ सूची

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