मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के आरंभिक शासकों में गोविन्दराज तृतीय का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। यह कालखंड उत्तर-पश्चिमी भारत पर गजनवी आक्रांताओं के हमलों और क्षेत्रीय राजपूत शक्तियों के मध्य शक्ति-संतुलन का दौर था। समय काल: लगभग 11वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध (अनुमानित […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
सपादलक्ष (शाकंभरी / सांभर) के चाहमान (चौहान) राजवंश के 11वीं शताब्दी के आरंभिक शासकों में गोविन्दराज तृतीय का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। यह कालखंड उत्तर-पश्चिमी भारत पर गजनवी आक्रांताओं के हमलों और क्षेत्रीय राजपूत शक्तियों के मध्य शक्ति-संतुलन का दौर था।
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समय काल: लगभग 11वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध (अनुमानित 1012–1026 ईस्वी)।
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वंशावलीगत स्थिति:
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बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) और पृथ्वीराज विजय महाकाव्य के अनुसार, ये ‘दुर्लंघ्यमेरु’ दुर्लभराज द्वितीय के उत्तराधिकारी (भाई/पुत्र) थे।
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गोविन्दराज तृतीय के उपरांत क्रमशः इनके पुत्र वाक्पतिराज द्वितीय, वीर्यराम और चामुण्डराज शासक बने।
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‘वेरीघरट’ (वैरीघट्ट) की उपाधि:
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महाकवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय में गोविन्दराज तृतीय को ‘वेरीघरट’ (Vairigharatta) की उपाधि से विभूषित किया गया है।
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इसका शाब्दिक अर्थ है— “शत्रुओं को पीसने वाला चक्की का पाट” अर्थात् अत्यंत शक्तिशाली शत्रु-संहारक।
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विद्वानों व कवियों के आश्रयदाता:
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जयानक भट्ट के अनुसार, गोविन्दराज तृतीय न केवल एक पराक्रमी योद्धा थे, अपितु वे कवियों, विद्वानों और शास्त्रों के ज्ञाताओं के परम आश्रयदाता थे।
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महमूद गजनवी के सोमनाथ अभियान के समकालीन संदर्भ (1024–1025 ईस्वी):
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1024–1025 ई. में जब गजनी का सुल्तान महमूद गजनवी गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण करने निकला, तब सपादलक्ष (शाकंभरी/अजमेर क्षेत्र) के चौहानों ने प्रबल रक्षात्मक मोर्चा तैयार कर रखा था।
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मुस्लिम इतिहासकार फरिश्ता (तारीख-ए-फरिश्ता) के अनुसार, अजमेर/सपादलक्ष के चौहान शासक की प्रबल सेना और युद्ध की भारी तैयारियों के भय से महमूद गजनवी ने सीधा मार्ग छोड़कर थार के रेगिस्तानी मार्ग (मुलतान-जैसलमेर होकर) से जाना उचित समझा।
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2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
गोविन्दराज तृतीय और उनके शासनकाल के प्रामाणिक संदर्भ निम्नलिखित पुरालेखीय व साहित्यिक स्रोतों में प्राप्त होते हैं:
| स्रोत / ग्रंथ | रचनाकार / रचयिता | भाषा / विधा | मुख्य परीक्षा उपयोगी विवरण |
| पृथ्वीराज विजय | जयानक भट्ट (कश्मीरी महाकवि) | संस्कृत (महाकाव्य) | सर्वप्रमुख स्रोत। गोविन्दराज तृतीय को ‘वेरीघरट’ उपाधि दिए जाने, उनकी दानशीलता और विद्यानुराग का विस्तृत विवरण। |
| बिजौलिया शिलालेख (1170 ई.) | गुणभद्र (उत्कीर्णक: कायस्थ केशव) | संस्कृत (शिलालेख) | दुर्लभराज द्वितीय के पश्चात गोविन्दराज तृतीय और उनके पुत्र वाक्पतिराज द्वितीय की क्रमिक वंशावलीय पुष्टि। |
| तारीख-ए-फरिश्ता | मुहम्मद कासिम फरिश्ता | फारसी (इतिहास) | सोमनाथ अभियान (1024-25 ई.) के समय चौहानों की सैन्य तैयारी और गजनवी द्वारा मार्ग बदले जाने का विवरण। |
| अर्ली चौहान डायनेस्टीज | डॉ. दशरथ शर्मा | शोध ग्रंथ (इतिहास) | राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी द्वारा समर्थित; गोविन्दराज तृतीय के शासनकाल, उपाधियों और गजनवी समकालीनता का शोधपरक विश्लेषण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं ऐतिहासिक प्रवृत्तियाँ
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आक्रामक प्रतिरोध की नीति: ‘वेरीघरट’ जैसी उपाधि यह दर्शाती है कि इस काल में चौहान शासकों ने विदेशी आक्रांताओं और सीमांत विरोधियों के विरुद्ध आक्रामक व दृढ़ नीति अपनाई।
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साहित्य एवं संस्कृति का पोषण: इस संक्रमण काल में भी चौहान दरबार में कवियों और विद्वानों को उच्च राज्याश्रय प्राप्त था।
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क्षेत्रीय रक्षा कवच: गजनवी काल में उत्तर भारत के कई राज्य छिन्न-भिन्न हो गए, किंतु सपादलक्ष की सुदृढ़ सैन्य व्यवस्था ने मध्य राजस्थान को भारी विध्वंस से सुरक्षित रखा।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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‘वेरीघरट’ (वैरीघट्ट – शत्रुओं को पीसने वाला) उपाधि धारक शासक: गोविन्दराज तृतीय।
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प्राथमिक साहित्यिक स्रोत: पृथ्वीराज विजय (जयानक)।
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महमूद गजनवी के सोमनाथ अभियान (1024–25 ई.) के समकालीन चौहान शासक: गोविन्दराज तृतीय।
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वंशावली क्रम: दुर्लभराज द्वितीय ➔ गोविन्दराज तृतीय ➔ वाक्पतिराज द्वितीय ➔ वीर्यराम ➔ चामुण्डराज।