मुख्य बिंदु: राजस्थान के भूगोल, इतिहास एवं साहित्यिक संदर्भों (राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी तथा RBSE के प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित) के अनुसार अरावली पर्वतमाला: सामान्य परिचय एवं भौगोलिक संरचना का व्यवस्थित संकलन नीचे दिया गया है: 1. परिचय / मुख्य तथ्य (Introduction & Core Facts) उत्पत्ति काल: प्री-कैम्ब्रियन (Pre-Cambrian) कल्प (लगभग 65 करोड़ वर्ष पूर्व)। यह विश्व […]
राजस्थान के भूगोल, इतिहास एवं साहित्यिक संदर्भों (राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी तथा RBSE के प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित) के अनुसार अरावली पर्वतमाला: सामान्य परिचय एवं भौगोलिक संरचना का व्यवस्थित संकलन नीचे दिया गया है:
1. परिचय / मुख्य तथ्य (Introduction & Core Facts)
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उत्पत्ति काल: प्री-कैम्ब्रियन (Pre-Cambrian) कल्प (लगभग 65 करोड़ वर्ष पूर्व)। यह विश्व की प्राचीनतम वलित (Folded) पर्वतमालाओं में से एक है।
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भू-गर्भीय संबंध: यह प्राचीन गोंडवाना लैंड का अवशिष्ट भू-भाग है। वर्तमान स्वरूप के आधार पर यह एक अवशिष्ट पर्वतमाला (Residual Mountains) है।
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विस्तार व लंबाई:
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कुल विस्तार: पालनपुर (गुजरात) से रायसीना हिल्स, दिल्ली (राष्ट्रपति भवन) तक कुल 692 किमी।
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राजस्थान में विस्तार: खेडब्रह्मा (सिरोही सीमा) से खेतड़ी (नीम का थाना/झुंझुनूं) तक कुल 550 किमी (कुल लंबाई का लगभग 80%)।
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दिशा: दक्षिण-पश्चिम (SW) से उत्तर-पूर्व (NE) की ओर।
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क्षेत्रफल व जनसंख्या: राजस्थान के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 9.3% भाग और राज्य की लगभग 10% जनसंख्या इस प्रदेश में निवास करती है।
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औसत ऊँचाई: समुद्र तल से औसत ऊँचाई 930 मीटर है।
2. प्रमुख साहित्यिक संदर्भ, रचनाएँ एवं स्थानीय नाम
राजस्थान के प्राचीन ग्रंथों, चारण साहित्य एवं अभिलेखों में अरावली का उल्लेख विशिष्ट नामों व संदर्भों में मिलता है:
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प्राचीन एवं पौराणिक नाम:
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विष्णु पुराण: अरावली को ‘परिपात्र’ या ‘पारियात्र’ कहा गया है।
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सिरोही क्षेत्र: स्थानीय भाषा में इसे ‘आबूगुलाब’ या ‘चंद्रावती क्षेत्र’ के संदर्भ में जाना गया।
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बूंदी की पहाड़ियाँ: ‘आड़ावाला पर्वत’ नाम से प्रसिद्ध।
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प्रमुख रचनाएँ व ऐतिहासिक उल्लेख:
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कर्नल जेम्स टॉड (Annals and Antiquities of Rajasthan): टॉड ने गुरुशिखर को ‘संतों का शिखर’ (Peaks of the Saints) तथा ‘हिन्दू ओलम्पस’ की संज्ञा दी।
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मुहणौत नैणसी री ख्यात (मुहणौत नैणसी): मेवाड़ और मारवाड़ की प्राकृतिक सीमा के रूप में अरावली की घाटियों (नाल) और दुर्गम दरों का विस्तृत वर्णन।
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कान्हड़दे प्रबन्ध (पद्मनाभ): जालौर व सिवाना के पर्वतीय क्षेत्रों (छप्पन की पहाड़ियाँ) की सामरिक स्थिति का उल्लेख।
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पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई): दिल्ली स्थित रायसीना व ढिल्लिका की अरावली श्रृंखलाओं का सामरिक उल्लेख।
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3. विशिष्ट भौगोलिक विशेषताएँ एवं वर्गीकरण
अरावली को अध्ययन की दृष्टि से तीन प्रमुख भागों में बाँटा जाता है:
| भाग | प्रमुख क्षेत्र | सर्वोच्च शिखर | मुख्य विशेषता |
| उत्तरी अरावली | जयपुर, दौसा, अलवर, सीकर, झुंझुनूं | रघुनाथगढ़ (1055 मी.) – सीकर | यहाँ पहाड़ियाँ कटी-फटी व दूर-दूर फैली हैं (उदा. बैराठ, खो, भानगढ़)। |
| मध्य अरावली | अजमेर, ब्यावर | टॉडगढ़/मोरम जी (933/934 मी.), तारागढ़ (873 मी.) | सर्वाधिक संकीर्ण भाग; प्रमुख दर्रे: बर, परवेरिया, शिवपुरा। |
| दक्षिणी अरावली | सिरोही, उदयपुर, राजसमंद | गुरुशिखर (1722 मी.), सेर (1597 मी.), दिलवाड़ा (1442 मी.) | सर्वाधिक विस्तृत, सघन व ऊँचा भू-भाग; आबू ब्लॉक (बाथोलिथ संरचना)। |
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प्रमुख पठार व स्थानीय भौगोलिक शब्दावली:
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उड़िया का पठार: 1360 मीटर (राजस्थान का सबसे ऊँचा पठार – सिरोही)।
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भोराठ का पठार: गोगुन्दा (उदयपुर) से कुंभलगढ़ (राजसमंद) के मध्य स्थित।
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लसाड़िया का पठार: जयसमंद झील के पूर्व में स्थित कटा-फटा व विच्छेदित पठार।
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भाकर: सिरोही क्षेत्र में तीव्र ढाल वाली ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियाँ।
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गिरवा: उदयपुर बेसिन के चारों ओर स्थित तश्तरीनुमा पहाड़ियों की श्रृंखला।
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देशहरो: जरगा और रागा पहाड़ियों के मध्य वर्षभर हरा-भरा रहने वाला क्षेत्र।
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4. परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु और संभावित प्रश्न
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जल विभाजक रेखा: अरावली राजस्थान में 50 सेमी समवर्षा रेखा का कार्य करती है तथा भारत के महान जल विभाजक (बंगाल की खाड़ी और अरब सागर अपवाह तंत्र) का मुख्य आधार है।
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खनिज भंडार: अरावली को ‘खनिजों का अजायबघर’ कहा जाता है; यहाँ धारवाड़ युगीन चट्टानों में तांबा, सीसा-जस्ता, चांदी, लोहा और संगमरमर प्रचुरता से पाए जाते हैं।