मुख्य बिंदु: 1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य मेवाड़ के गुहिल राजवंश की ‘रावल शाखा’ के शासक रावल समरसिंह (शासनकाल: लगभग 1273–1302 ई.) रावल तेजसिंह के पुत्र तथा रावल रत्नसिंह के पिता थे। इनके शासनकाल की सबसे प्रमुख ऐतिहासिक घटना अलाउद्दीन खिलजी की गुजरात अभियान पर जाती हुई सेना से कर (दंड/मार्ग-कर) वसूलना है। घटना का वर्ष: […]
1. परिचय एवं मुख्य ऐतिहासिक तथ्य
मेवाड़ के गुहिल राजवंश की ‘रावल शाखा’ के शासक रावल समरसिंह (शासनकाल: लगभग 1273–1302 ई.) रावल तेजसिंह के पुत्र तथा रावल रत्नसिंह के पिता थे। इनके शासनकाल की सबसे प्रमुख ऐतिहासिक घटना अलाउद्दीन खिलजी की गुजरात अभियान पर जाती हुई सेना से कर (दंड/मार्ग-कर) वसूलना है।
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घटना का वर्ष: 1299 ई.
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परिदृश्य: 1299 ई. में दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने गुजरात (बघेल राजपूत कर्णदेव) पर आक्रमण करने के लिए अपने दो प्रमुख सेनापतियों—उलूग खाँ और नुसरत खाँ को भेजा।
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मार्ग व कर वसूली: जब शाही सेना मेवाड़ के रास्ते से होकर गुजरात जा रही थी, तब रावल समरसिंह ने मेवाड़ की सीमा से गुजरने के बदले शाही सेना को रोककर उनसे दंड (Tax/Toll/मार्ग-कर) वसूल किया और उसके बाद ही उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति दी।
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सामरिक प्रभाव: इस अपमान और कर वसूली ने खिलजी के चित्तौड़ पर आक्रमण (1303 ई.) की पृष्ठभूमि तैयार करने में उत्प्रेरक का कार्य किया।
2. प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत, रचनाएँ एवं रचनाकार
राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी तथा प्रामाणिक ऐतिहासिक ग्रंथों के अनुसार इस घटना और समरसिंह के शासनकाल के प्रमुख साहित्यिक व अभिलेखीय स्रोत निम्न हैं:
| ग्रंथ / स्रोत | रचनाकार / रचयिता | मुख्य विवरण |
| विविध तीर्थ कल्प (कल्पप्रदीप) | जैन आचार्य जिनप्रभ सूरि (14वीं शताब्दी) | इसमें स्पष्ट उल्लेख है कि समरसिंह ने उलूग खाँ से मेवाड़ से गुजरने के बदले ‘दंड’ वसूल कर तीर्थों की रक्षा की थी। |
| तीर्थमाला | जैन मुनि जयसिंह सूरि | समरसिंह के धार्मिक कार्यों एवं मेवाड़ की सुरक्षा का विवरण। |
| आबू का अचलेश्वर शिलालेख (1285 ई.) | उत्कीर्णक: शुभचंद्र (प्रशस्तिकार: वेदशर्मा) | समरसिंह द्वारा मेवाड़ को सुदृढ़ करने तथा विभिन्न धार्मिक दानों का उल्लेख। |
| चीरवा का शिलालेख (1273 ई.) | रत्नप्रभ सूरि के शिष्य भुवनसिंह | मेवाड़ के गुहिल शासकों की वंशावली तथा तत्कालीन सामरिक स्थिति की जानकारी। |
| तारीख-ए-अलाई (खज़ाइन-उल-फ़ुतुह) | अमीर खुसरो | 1299 ई. के गुजरात अभियान और बाद में 1303 ई. के चित्तौड़ अभियान का समकालीन फारसी विवरण। |
3. विशिष्ट विशेषताएँ एवं प्रवृत्तियाँ
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सांस्कृतिक एवं धार्मिक सहिष्णुता: रावल समरसिंह शैव धर्मावलंबी होते हुए भी जैन धर्म के बड़े संरक्षक थे। उनके दरबार में जैन विद्वान रत्नप्रभ सूरि, पार्श्वचंद्र, देवभद्र और अमितसिंह सूरी जैसे आचार्य सम्मानित थे।
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जीव हिंसा पर रोक: समरसिंह ने अपने राज्य में जैन मुनियों के प्रभाव से जीव हिंसा पर प्रतिबंध (अमारि घोषणा) लागू किया था।
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सामरिक नीति: खिलजी की विशाल सेना से सीधे टकराव की बजाय भौगोलिक स्थिति का रणनीतिक लाभ उठाकर कर वसूलना उनकी व्यावहारिक कूटनीति को दर्शाता है।
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साहित्यिक प्रवृत्तियाँ: इस काल का साहित्य मुख्यतः संस्कृत, अपभ्रंश और प्रारंभिक डिंगल/राजस्थानी में रचित प्रशस्तियों और जैन साहित्य (रास, कल्प, चरित) के रूप में मिलता है।
4. परीक्षा उपयोगी स्मरणीय बिंदु एवं संभावित प्रश्न
त्वरित स्मरणीय बिंदु:
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रावल समरसिंह रावल तेजसिंह के उत्तराधिकारी थे।
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रावल समरसिंह के दो प्रसिद्ध पुत्र थे: रावल रत्नसिंह (मेवाड़ के अगले शासक) और कुंभकरण (जिन्होंने नेपाल जाकर नेपाल के शाही वंश की नींव रखी)।
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अलाउद्दीन खिलजी की सेना से दंड वसूलने का प्रामाणिक समकालीन विवरण जिनप्रभ सूरि के ग्रंथ ‘विविध तीर्थ कल्प’ में मिलता है।