मुख्य बिंदु: भारतीय संविधान के भाग 6 के अध्याय 6 (अनुच्छेद 233 से 237) के तहत राज्यों में अधीनस्थ न्यायपालिका (Subordinate Judiciary) का प्रावधान किया गया है। राजस्थान में अधीनस्थ न्यायपालिका का शीर्ष निकाय जिला एवं सत्र न्यायालय (District & Sessions Court) होता है, जो राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रशासनिक एवं न्यायिक अधीक्षण (अनुच्छेद 227 और 235) […]
भारतीय संविधान के भाग 6 के अध्याय 6 (अनुच्छेद 233 से 237) के तहत राज्यों में अधीनस्थ न्यायपालिका (Subordinate Judiciary) का प्रावधान किया गया है। राजस्थान में अधीनस्थ न्यायपालिका का शीर्ष निकाय जिला एवं सत्र न्यायालय (District & Sessions Court) होता है, जो राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रशासनिक एवं न्यायिक अधीक्षण (अनुच्छेद 227 और 235) के अंतर्गत कार्य करता है।
1. राजस्थान अधीनस्थ न्यायपालिका का संरचनात्मक ढाँचा (Hierarchical Structure)
राजस्थान में जिला स्तर पर न्यायपालिका को मुख्य रूप से दो प्रमुख शाखाओं में विभाजित किया जाता है: दीवानी/सिविल (Civil) और फौजदारी/आपराधिक (Criminal)।
2. जिला एवं सत्र न्यायाधीश: दोहरी भूमिका (Dual Role)
जिला स्तर का सर्वोच्च न्यायिक अधिकारी एक ही व्यक्ति होता है, जिसे उसके द्वारा सुने जाने वाले मामलों के आधार पर दो अलग-अलग नामों से जाना जाता है:
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जिला न्यायाधीश (District Judge): जब यह अधिकारी दीवानी (Civil) मुकदमों (जैसे संपत्ति विवाद, पारिवारिक विवाद, अनुबंध, वसीयत आदि) की सुनवाई करता है।
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सत्र न्यायाधीश (Sessions Judge): जब यही अधिकारी आपराधिक/फौजदारी (Criminal) मुकदमों (जैसे हत्या, डकैती, चोरी, मारपीट आदि) की सुनवाई करता है।
3. दीवानी एवं आपराधिक शाखाओं की कार्यप्रणाली व शक्तियाँ
(A) दीवानी शाखा (Civil Side)
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जिला न्यायालय (District Court):
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यह जिले की सबसे बड़ी दीवानी अदालत होती है। इसे असीमित आर्थिक क्षेत्राधिकार (Unlimited Pecuniary Jurisdiction) वाले दीवानी मामलों की सुनवाई का अधिकार होता है।
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यह अधीनस्थ दीवानी अदालतों के फैसलों के खिलाफ प्रथम अपील सुनता है।
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वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश (Senior Civil Judge Division):
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निर्धारित आर्थिक सीमा से अधिक मूल्य वाले संपत्ति एवं अनुबंध संबंधी मुकदमों की सुनवाई करता है।
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कनिष्ठ सिविल न्यायाधीश (Junior Civil Judge / Munsif):
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दीवानी मुकदमों के लिए सबसे निचले स्तर की अदालत होती है, जहाँ कम राशि या छोटी संपत्तियों से जुड़े विवाद दायर किए जाते हैं।
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(B) आपराधिक/फौजदारी शाखा (Criminal Side)
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सत्र न्यायालय (Sessions Court):
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सत्र न्यायाधीश को कानून द्वारा परिभाषित कोई भी सजा देने की शक्ति प्राप्त है, जिसमें आजीवन कारावास और मृत्युदंड (Capital Punishment) शामिल हैं।
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विशेष नियम: सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए मृत्युदंड के फैसले को तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा उसकी पुष्टि (Confirmation) न कर दी जाए।
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मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM / ACJM):
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सी.जे.एम. को 7 वर्ष तक के कारावास और अर्थदंड (Fine) की सजा देने का अधिकार होता है।
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न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JM Class I):
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इन्हें 3 वर्ष तक के कारावास और नियमानुसार जुर्माना लगाने की शक्ति होती है।
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न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वितीय श्रेणी (JM Class II):
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इन्हें 1 वर्ष तक के कारावास की सजा देने का अधिकार होता है।
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4. अधीनस्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं सेवा शर्तें
संविधान के तहत अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायाधीशों की भर्ती और पदोन्नति की प्रक्रिया निर्धारित है:
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जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति (अनुच्छेद 233):
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जिला न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदस्थापना और पदोन्नति राजस्थान के राज्यपाल द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय के परामर्श से की जाती है।
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योग्यता: वह व्यक्ति संघ या राज्य की सेवा में पहले से कार्यरत हो, या कम से कम 7 वर्षों तक अधिवक्ता (Advocate) के रूप में कार्य कर चुका हो और उच्च न्यायालय द्वारा उसके नाम की सिफारिश की गई हो।
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अन्य न्यायिक अधिकारियों की भर्ती (अनुच्छेद 234):
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कनिष्ठ स्तर के न्यायिक अधिकारियों (RJS – Rajasthan Judicial Service) की भर्ती राज्यपाल द्वारा राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) और राजस्थान उच्च न्यायालय के परामर्श से आयोजित प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से की जाती है।
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5. राजस्थान में विशेष एवं अधीनस्थ अदालतें (Special Courts & Forums)
आम नागरिक को त्वरित और सुलभ न्याय देने के लिए सामान्य अदालतों के अलावा राजस्थान के प्रत्येक जिले में विशेष अदालतें भी गठित की गई हैं:
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पारिवारिक न्यायालय (Family Courts): विवाह, तलाक, भरण-पोषण (Maintenance) और बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों के सौहार्दपूर्ण निपटारे के लिए।
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पोक्सो कोर्ट (POCSO Courts): बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों के त्वरित विचारण के लिए गठित विशेष अदालतें।
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अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) अत्याचार निवारण विशेष न्यायालय: जातिगत अपराधों एवं अत्याचार निवारण अधिनियम से संबंधित मामलों की सुनवाई हेतु।
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मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT): सड़क हादसों में मुआवजा दिलाने के लिए विशेष ट्रिब्यूनल।
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लोक अदालतें और स्थायी लोक अदालतें (Lok Adalats): ‘विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987’ के तहत आपसी सहमति और मध्यस्थता से मुकदमों का तुरंत निपटारा करने के लिए। लोक अदालत के फैसले के खिलाफ कोई अपील नहीं होती।
संक्षेप तालिका: क्षेत्राधिकार व सजा देने की क्षमता
| पद / न्यायालय | शाखा | मुख्य अधिकार / सजा देने की शक्ति |
| जिला एवं सत्र न्यायाधीश | दीवानी एवं आपराधिक | असीमित दीवानी अधिकार; मृत्युदंड (HC की पुष्टि अनिवार्य) व आजीवन कारावास |
| अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ) | दीवानी एवं आपराधिक | सत्र न्यायाधीश के समान शक्तियाँ (स्थानांतरित मामलों हेतु) |
| मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) | आपराधिक | 7 वर्ष तक का कारावास व जुर्माना |
| वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश | दीवानी | मध्यम आर्थिक सीमा के दीवानी मामले |
| न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) | आपराधिक | 3 वर्ष तक का कारावास व जुर्माना |
| कनिष्ठ सिविल न्यायाधीश (Munsif) | दीवानी | प्रारम्भिक स्तर के दीवानी मामले |