मुख्य बिंदु: भारतीय संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालयों के गठन, शक्तियों, न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनकी सेवा शर्तों से संबंधित विस्तृत प्रावधान दिए गए हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के प्रशासनिक एवं संवैधानिक पद से जुड़ी संपूर्ण जानकारी नीचे दी गई है: 1. राजस्थान उच्च […]
भारतीय संविधान के भाग 6 में अनुच्छेद 214 से 231 तक उच्च न्यायालयों के गठन, शक्तियों, न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनकी सेवा शर्तों से संबंधित विस्तृत प्रावधान दिए गए हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों के प्रशासनिक एवं संवैधानिक पद से जुड़ी संपूर्ण जानकारी नीचे दी गई है:
1. राजस्थान उच्च न्यायालय: न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment)
उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार भारत के राष्ट्रपति को प्राप्त है।
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मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति: संविधान के अनुच्छेद 217(1) के तहत राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित राज्य के राज्यपाल (राजस्थान के संदर्भ में राज्यपाल) के परामर्श से राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं।
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अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति: अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल के साथ-साथ राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से भी परामर्श लेते हैं।
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कोलेजियम प्रणाली (Collegium System): व्यावहारिक रूप से, उच्चतम न्यायालय का कोलेजियम (CJI और वरिष्ठतम न्यायाधीशों का समूह) नामों की सिफारिश करता है, जिसके आधार पर राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति पत्र/अधिसूचना जारी की जाती है।
2. उच्च न्यायालय न्यायाधीश की योग्यताएँ (Eligibility / Qualifications)
संविधान के अनुच्छेद 217(2) के अनुसार, राजस्थान उच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनने के लिए किसी व्यक्ति में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी आवश्यक हैं:
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नागरिकता: वह भारत का नागरिक हो।
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न्यायिक पद का अनुभव: भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम 10 वर्षों तक न्यायिक पद (Subordinate Judiciary/Judicial Office) पर कार्य कर चुका हो।अथवा
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वकालत का अनुभव: किसी उच्च न्यायालय या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों में लगातार कम से कम 10 वर्षों तक अधिवक्ता (Advocate) के रूप में कार्य किया हो।
विशेष नोट: उच्च न्यायालय के संदर्भ में राष्ट्रपति की राय में “प्रख्यात विधिबेत्ता” (Distinguished Jurist) होने का कोई अलग संवैधानिक प्रावधान नहीं है (यह केवल उच्चतम न्यायालय के लिए लागू होता है)।
3. पद की शपथ (Oath or Affirmation)
संविधान के अनुच्छेद 219 के तहत, उच्च न्यायालय का कोई भी व्यक्ति न्यायाधीश के रूप में अपना पद ग्रहण करने से पूर्व शपथ लेता है।
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शपथ दिलाने वाला अधिकारी: राजस्थान के राज्यपाल या उनके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त कोई व्यक्ति (सामान्यतः निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश या वरिष्ठ न्यायाधीश)।
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शपथ का प्रारूप: भारतीय संविधान की तीसरी अनुसूची में दिए गए प्रारूप के अनुसार भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखने तथा देश की प्रभुता व अखंडता को अक्षुण्ण रखने की शपथ ली जाती है।
4. कार्यकाल एवं पदमुक्ति (Tenure & Resignation)
संविधान में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का कोई निश्चित न्यूनतम कार्यकाल तय नहीं है, लेकिन सेवानिवृत्ति की अधिकतम आयु सीमा निर्धारित है:
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आयु सीमा: उच्च न्यायालय का न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु पूर्ण करने तक अपने पद पर बना रहता है। (15वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1963 द्वारा सेवानिवृत्ति आयु 60 से बढ़ाकर 62 वर्ष की गई थी)।
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त्यागपत्र: न्यायाधीश किसी भी समय अपना त्यागपत्र भारत के राष्ट्रपति को संबोधित करके सौंप सकते हैं।
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पद की रिक्ति: यदि किसी न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त कर दिया जाता है या किसी अन्य उच्च न्यायालय में स्थानांतरित (Transfer) कर दिया जाता है, तो पद रिक्त हो जाता है।
5. न्यायाधीशों को हटाने/निष्कासन की प्रक्रिया (Removal Procedure)
उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है और इसे महाभियोग जैसी प्रक्रिया (Impeachment-like procedure) कहा जाता है।
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संवैधानिक आधार (Grounds): केवल दो आधारों पर ही हटाया जा सकता है—
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सिद्ध कदाचार (Proved Misbehaviour)
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असमर्थता (Incapacity)
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निष्कासन प्रक्रिया के प्रमुख चरण (Judges Inquiry Act, 1968):
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प्रस्ताव प्रस्तुत करना:
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लोकसभा में प्रस्तुत करने के लिए कम से कम 100 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं।
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राज्यसभा में प्रस्तुत करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर आवश्यक हैं।
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सदन के अध्यक्ष/सभापति की स्वीकृति: लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार कर सकते हैं।
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जांच समिति का गठन: प्रस्ताव स्वीकार होने पर 3-सदस्यीय समिति बनाई जाती है, जिसमें:
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उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश/CJI
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किसी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश
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एक प्रख्यात कानूनविद शामिल होते हैं।
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संसद में विशेष बहुमत (Special Majority): यदि समिति आरोपी न्यायाधीश को दोषी पाती है, तो संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में अलग-अलग विशेष बहुमत (सदन की कुल सदस्यता का बहुमत + उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम 2/3 बहुमत) से प्रस्ताव पारित होना अनिवार्य है।
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राष्ट्रपति का आदेश: संसद के दोनों सदनों द्वारा प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति न्यायाधीश को पद से हटाने का अंतिम आदेश जारी करते हैं।