मुख्य बिंदु: मध्य पाषाण काल (Mesolithic Age) पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल के बीच का संक्रमण काल (Transition Period) था। इस काल में जलवायु में परिवर्तन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पशुओं की जगह छोटे जीवों का विकास हुआ और मानव जीवन शैली में क्रांतिकारी बदलाव आए। डिडवाना (नागौर) और राजस्थान के अन्य क्षेत्रों से मिले मध्य पाषाण […]
मध्य पाषाण काल (Mesolithic Age) पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल के बीच का संक्रमण काल (Transition Period) था। इस काल में जलवायु में परिवर्तन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पशुओं की जगह छोटे जीवों का विकास हुआ और मानव जीवन शैली में क्रांतिकारी बदलाव आए।
डिडवाना (नागौर) और राजस्थान के अन्य क्षेत्रों से मिले मध्य पाषाण कालीन साक्ष्यों की छोटी-से-छोटी और संपूर्ण डिटेल नीचे दी जा रही है:
1. काल अवधि एवं भौगोलिक पृष्ठभूमि (Time Period & Geography)
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काल: मध्य पाषाण काल सामान्यतः भारत में लगभग 10,000 ईसा पूर्व से 4,000 ईसा पूर्व के बीच माना जाता है।
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भौगोलिक स्थिति: राजस्थान में इस काल के अवशेष मुख्य रूप से लूनी बेसिन, मेवाड़ क्षेत्र (कोठारी घाटी) और नागौर के डिडवाना क्षेत्र से बहुतायत में मिले हैं। इस समय तक जलवायु शुष्क होने लगी थी, जिससे नदियाँ सूखने लगीं और मानव झीलों या जल स्रोतों के पास बसने लगा।
2. डिडवाना (नागौर): पूर्व पाषाण से मध्य पाषाण काल का संक्रमण
डिडवाना (वर्तमान में नागौर जिला) भारतीय पुरातात्विक मानचित्र पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है, क्योंकि यहाँ स्तरीकृत (Stratified) अनुक्रम मिलता है, यानी एक के ऊपर एक काल की परतें जमी हुई हैं:
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पूर्व पाषाण कालीन परतें: डिडवाना के सिंधी तालाब (Singi Talav) और आसपास के क्षेत्रों से निम्न पुरापाषाण काल के भारी कोर उपकरण, हस्तकुल्हाड़ियाँ (Handaxes) और विदर (Cleavers) मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यहाँ पाषाण काल के शुरुआती मानव भी सक्रिय थे।
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मध्य पाषाण कालीन परतें: समय के साथ जब जलवायु बदली और तकनीक उन्नत हुई, तो डिडवाना के इन्हीं क्षेत्रों में मध्य पाषाण कालीन संस्कृतियों का विकास हुआ। यहाँ की मिट्टी और बालू के टीलों (Sand Dunes) के नीचे इस काल के सूक्ष्म पाषाण उपकरण दबे मिले हैं।
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वैज्ञानिक अध्ययन: डिडवाना की पेलियो-क्लाइमैटिक (पुरातन जलवायु) और भूगर्भीय संरचना पर वी.एन. मिश्र (V.N. Misra) और अन्य पुरातत्वविदों ने व्यापक शोध किया है, जिससे यह पता चलता है कि यहाँ प्रागैतिहासिक काल में झीलें हुआ करती थीं जिनके किनारे मानव बस्तियाँ बसी थीं।
3. मध्य पाषाण काल की मुख्य विशेषता: माइक्रोलिथ्स (सूक्ष्म पाषाण उपकरण)
इस काल की सबसे बड़ी तकनीकी विशेषता थी—माइक्रोलिथ्स (Microliths / सूक्ष्म पाषाण उपकरण)।
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आकार: ये उपकरण बहुत छोटे होते थे (आमतौर पर 1 सेंटीमीटर से 5 सेंटीमीटर तक के)।
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सामग्री: इन्हें बनाने के लिए जैستر, क्वार्टजाइट, चर्ट, केल्सेडनी और एगेट जैसे सुंदर और कठोर पत्थरों का उपयोग किया जाता था।
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प्रकार: इसमें ब्लेड, ल्यूनेट (अर्धचंद्राकार), ट्रैपोज़, треугольник (त्रिकोणीय) और खुरचनी (Scrapers) शामिल थीं।
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प्रयोग: इन छोटे पत्थरों को लकड़ी या हड्डी के हत्थे में बांधकर तीर-धनुष (Bow and Arrow) या भाले के रूप में उपयोग किया जाता था, जिससे दूर से ही जानवरों का शिकार करना आसान हो गया था।
4. इस काल में मानव जीवन में आए बड़े बदलाव
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पशुपालन की शुरुआत: इस काल के अंत तक आते-आते मानव ने केवल शिकार करना ही नहीं छोड़ा, बल्कि पशुओं को पालतू बनाना भी शुरू कर दिया था। (राजस्थान में इसके सबसे स्पष्ट प्रमाण बागोर, भीलवाड़ा और तिलवाड़ा, बाड़मेर से मिलते हैं)।
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अस्थाई बस्तियाँ: पुरापाषाण काल के घुमक्कड़ जीवन की तुलना में मध्य पाषाण काल के मानव ने कुछ समय के लिए एक ही स्थान पर रुककर छोटी-छोटी बस्तियाँ (झोपड़ियाँ) बनानी शुरू कर दी थीं।
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अग्नि का प्रयोग और दफनाने की प्रथा: इस काल के लोग आग जलाना अच्छी तरह सीख चुके थे और अपने मृतकों को आभूषणों या हथियारों के साथ जमीन में दफनाने की परंपरा भी इसी काल में आरंभ हुई।