मुख्य बिंदु: टोंक जिले के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है: 1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य उपनाम: राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत, नवाबों की नगरी (City of Nawabs), राजस्थान का लखनऊ, अदब और तहजीब का शहर। स्थापना: 1643 ई. में जयपुर के राजा मानसिंह के भाई भोला ब्राह्मण द्वारा टोंक […]
टोंक जिले के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य का संपूर्ण परीक्षा-उपयोगी संकलन नीचे दिया गया है:
1. सामान्य एवं भौगोलिक परिदृश्य
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उपनाम: राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत, नवाबों की नगरी (City of Nawabs), राजस्थान का लखनऊ, अदब और तहजीब का शहर।
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स्थापना:
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1643 ई. में जयपुर के राजा मानसिंह के भाई भोला ब्राह्मण द्वारा टोंक गाँव बसाया गया।
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1817 ई. में पिंडारी नेता नवाब अमीर खां पिंडारी ने अंग्रेजों (लॉर्ड हेस्टिंग्स) से संधि कर टोंक की स्वतंत्र नवाबी रियासत स्थापित की।
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भौगोलिक स्थिति व नदियाँ:
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नदियाँ: बनास (वन की आशा – टोंक को दो भागों में विभाजित करती है), डाई, खारी, माशी, बांडी, सहोदरा।
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त्रिवेणी संगम (राजमहल): बनास, डाई और खारी नदियों का प्रसिद्ध संगम।
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बीसलपुर बांध (टोडा Town): बनास नदी पर स्थित राजस्थान की सबसे बड़ी पेयजल परियोजना (जयपुर, अजमेर, टोंक व दौसा को जलापूर्ति)।
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टोरडी सागर बांध: इसकी सभी मोरियाँ (गेट) खोलने पर इसमें एक बूंद भी पानी नहीं बचता।
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खनिज संपदा:
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तामड़ा / गार्नेट (रक्तमणि): राजमहल, कल्याणपुरा, कुशालपुरा (भारत में तामड़े का एकाधिकार क्षेत्र)।
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फेल्डस्पार व क्वार्ट्ज: टोंक क्षेत्र।
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2. राजवंश एवं प्रमुख नवाब
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रियासती स्वरूप: राजस्थान की एकमात्र मुस्लिम रियासत (पठान/अफगान राजवंश)।
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प्रमुख नवाब व योगदान:
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नवाब अमीर खां पिंडारी (1817–1834 ई.): टोंक रियासत के संस्थापक।
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नवाब वजीरूद्दौला (1834–1864 ई.): 1857 की क्रांति के समय टोंक के नवाब; इन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया, जबकि इनके मामा मीर आलम खां और सेना ने क्रांतिकारियों (तांत्या टोपे) का साथ दिया।
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नवाब इब्राहिम खां (1867–1930 ई.): इनके काल में प्रसिद्ध ‘सुनहरी कोठी’ (शीश महल) का निर्माण पूरा हुआ और ऊंट की कुर्बानी की परंपरा शुरू हुई।
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नवाब सआदत अली खां: अरबी-फारसी साहित्य और शिक्षा को व्यापक संरक्षण दिया।
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नवाब इस्माइल अली खां: राजस्थान एकीकरण (1948) के समय टोंक के अंतिम शासक।
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3. प्रमुख प्राचीन सभ्यताएँ एवं पुरातात्विक स्थल
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रेढ़ सभ्यता (निवाई):
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ढील नदी के किनारे स्थित।
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इसे ‘प्राचीन भारत का टाटानगर’ कहा जाता है (विशाल मात्रा में लोहे के औजार, सिक्के व लोहे की ढलाई की भट्ठियां मिलने के कारण)।
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एशिया का सबसे बड़ा सिक्कों का भंडार (3,075 पंचमार्क/चांदी के सिक्के) प्राप्त हुआ।
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बंदर के आकार के खिलौने और ‘मातृदेवी की मृण्मूर्तियां’ प्राप्त।
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नगर सभ्यता (उनियारा):
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प्राचीन नाम: मालव नगर (मालव जनपद का प्रमुख सिक्का ढलाई केंद्र)।
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महिषासुरमर्दिनी की प्राचीनतम मृण्मूर्ति और ‘कमल धारण किए हुए लक्ष्मी’ की मूर्ति प्राप्त।
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4. प्रमुख महल, दुर्ग एवं स्थापत्य
| स्मारक / स्थल | निर्माता | प्रमुख विशेषता |
| सुनहरी कोठी (शीश महल) | नवाब वजीरूद्दौला (प्रारंभ: 1834), नवाब इब्राहिम खां (पूर्ण: 1870) | इसे ‘जरनिगार’ भी कहा जाता है; 24 कैरेट सोने की मीनाकारी, कांच की पच्चीकारी और हीरे-जवाहरात जड़ित भव्य आंतरिक कक्ष। |
| बीसलदेव (गोकर्णेश्वर) मंदिर | चौहान राजा विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) | बीसलपुर बांध के जलभराव क्षेत्र में स्थित 12वीं सदी का ऐतिहासिक शिव मंदिर (पुरातत्व संरक्षित)। |
| मुबारक महल | नवाब अमीर खां/इब्राहिम खां | टोंक शहर में स्थित महल, जहाँ पूर्व में बकरीद के अवसर पर ऊंट की कुर्बानी दी जाती थी (अब प्रतिबंध)। |
| ककोड़ का किला | सामंतकालीन दुर्ग | ऐतिहासिक सामरिक महत्व का पहाड़ी दुर्ग। |
| अमीरगढ़ दुर्ग (टोंक का किला) | नवाब अमीर खां | नवाबों का प्रारंभिक प्रशासनिक किला। |
| हाड़ी रानी की बावड़ी (टोडा रायसिंह) | हाड़ी रानी (17वीं सदी) | 3 मंजिला कलात्मक सीढ़ीदार बावड़ी; सुंदर स्थापत्य व नक्काशी युक्त। |
5. प्रमुख ऐतिहासिक युद्ध एवं घटनाएँ
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राजमहल का युद्ध (मार्च 1747 ई.):
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जयपुर के उत्तराधिकार हेतु सवाई ईश्वरी सिंह और माधोसिंह प्रथम (मेवाड़-बूंदी संयुक्त सेना) के बीच।
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ईश्वरी सिंह विजयी रहे और इस विजय की स्मृति में जयपुर में ‘ईसरलाट’ (सरगासूली) का निर्माण कराया।
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1857 की क्रांति में टोंक का विद्रोह:
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नवाब वजीरूद्दौला अंग्रेजों के वफादार रहे, परंतु टोंक की जनता और जागीरदारों ने मीर आलम खां के नेतृत्व में तांत्या टोपे का खुला समर्थन किया।
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टोंक की महिलाओं ने भी हथियारों के साथ युद्ध में भाग लिया (इसका उल्लेख मोहम्मद मुजीब के नाटक ‘आजमाइश’ में मिलता है)।
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6. मंदिर, लोकदेवता, संत एवं सूफी परंपरा
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श्री देवनारायण जी (जोधपुरिया धाम, निवाई):
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माशी और बांडी नदी के संगम पर स्थित गुर्जर समाज का प्रमुख तीर्थ धाम (कच्ची ईंटों व नीम की पत्तियों से पूजा)।
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संत पीपा जी की गुफा (टोडा रायसिंह):
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भक्ति आंदोलन के प्रणेता संत पीपा ने टोडा के जंगलों में रहकर तपस्या की थी और ज्ञान प्राप्त किया था।
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संत धन्ना भगत (धुंवा कलां, टोंक):
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जन्म: धुंवा गाँव (1415 ई.) में जाट परिवार में; रामानंद जी के शिष्य; राजस्थान में ‘भक्ति आंदोलन के प्रारंभिक संत’। मान्यता है कि इन्होंने ईश्वर को हठपूर्वक भोजन कराया था और बिना बीज के खेत में फसल उगाई थी।
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कल्याण जी महाराज मंदिर (डिग्गी कल्याण जी, मालपुरा):
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भगवान विष्णु (कलह प्रिय/कल्याणकारी रूप) को समर्पित; राजा डिगवा द्वारा निर्मित।
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प्रतिवर्ष सावन एकादशी पर जयपुर के ताड़केश्वर मंदिर से डिग्गी तक विशाल लक्खी पदयात्रा आयोजित होती है।
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सूफी संत दरगाहें:
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ख्वाजा कमालुद्दीन चिश्ती की दरगाह: टोंक।
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हजरत शाह इस्माइल की दरगाह: अमीरगंज।
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7. कला, संस्कृति, हस्तशिल्प एवं संगीत
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चारबैंत लोकनाट्य (Charbait):
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टोंक का सबसे विशिष्ट व एकमात्र केंद्र; यह मूलतः अफगानिस्तान के पठानों की पश्तो/उर्दू काव्य लोक गायन शैली है।
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नवाब फैजुल्ला खां के समय प्रारंभ; प्रवर्तक: अब्दुल करीम खां व खलीफा करीम खां निहंग।
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इसमें कलाकार घुटनों के बल बैठकर ‘डफ’ (Daf) बजाते हुए ओजपूर्ण दोहे/कव्वाली शैली में संवाद करते हैं।
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उनियारा चित्रकला शैली:
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ढूंढाड़ (जयपुर) और बूंदी शैली का सुंदर समन्वय।
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स्वर्णकाल: राजा सरदार सिंह का काल।
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प्रमुख चित्रकार: धीमा, मीरबख्श, काशी, रामलखन (धार्मिक व शिकार के दृश्य)।
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नमदा उद्योग (Namda Craft):
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भेड़ की ऊन को कूटकर (बिना बुनाई के) जमाकर कलात्मक कालीन/आसन बनाना (टोंक का नमदा उद्योग भारत प्रसिद्ध है)।
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बीड़ी व चमड़ा उद्योग: ‘मयूर बीड़ी’ का प्रमुख निर्माण केंद्र।
8. प्रमुख साहित्यकार, विद्वान एवं शोध संस्थान
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मौलाना अबुल कलाम आजाद अरबी-फारसी शोध संस्थान (APRI – 1978 ई.):
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अरबी, फारसी और उर्दू की दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियों का भारत का सबसे समृद्ध संग्रह।
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आकर्षण: विश्व की सबसे बड़ी हस्तलिखित कुरान शरीफ और सोने की स्याही से लिखी गई अनमोल किताबें।
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अख्तर शीरानी: ‘उर्दू शायरी के रोमानवी शायर’ (शायर-ए-रोमान) के रूप में प्रसिद्ध टोंक के महान रचनाकार।
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कवि बीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ): संस्कृत के विद्वान, जिन्होंने बीसलपुर नगर बसाया।
9. स्वतंत्रता संग्राम एवं प्रजामंडल आंदोलन
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टोंक प्रजामंडल / जनजागृति:
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टोंक में राजनीतिक चेतना का प्रसार मुख्य रूप से जयपुर और अजमेर के प्रजामंडल नेताओं के माध्यम से हुआ।
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वनस्थली विद्यापीठ (निवाई, टोंक):
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1935 ई. में पंडित हीरालाल शास्त्री एवं उनकी पत्नी रतन शास्त्री द्वारा अपनी पुत्री शांताबाई की स्मृति में ‘जीवन कुटीर’ के रूप में स्थापित।
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यह भारत का प्रतिष्ठित डीम्ड विश्वविद्यालय और महिला शिक्षा का राष्ट्रीय केंद्र है (यहाँ ‘पंचमुखी शिक्षा’ दी जाती है)।
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राजस्थान एकीकरण में विलय (25 मार्च 1948):
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एकीकरण के द्वितीय चरण (पूर्व राजस्थान संघ) में टोंक रियासत का राजस्थान में विलय हुआ।
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